प्रदूषण की बारात निकल रही है, प्रशासन बैंड बजा रहा है!

शहरों की हवा जहरीली होती जा रही है, लोगों की सांसों पर संकट गहराता जा रहा है, लेकिन प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है, उनकी कार्रवाई जमीनी कम और कागजों पर ज्यादा नजर आ रही है। सवाल यह है कि जब प्रदूषण पर पहरा ही कागजी होगा, तो हवा साफ कैसे होगी? जनता साफ हवा के लिए तरस रही है और प्रशासन दावों की धुन बजा रहा है। आखिर जहरीली हवा से जनता को राहत कब मिलेगी और इस लापरवाही की जवाबदेही कौन तय करेगा?

राजू यादव
राजू यादव

कागजों पर हमारे नियम इतने कड़े हैं कि प्रदूषण करने वाले की साँस रुक जाए। जुर्माने भारी हैं, धाराएँ डरावनी हैं, आयोग बने हुए हैं। लेकिन जमीन पर जाइए तो वही नियम ऐसे लड़खड़ाते नजर आते हैं जैसे बीमार आदमी। सर्दी आते ही दिल्ली-एनसीआर की हवा जहरीली हो जाती है, अदालतें फटकारती हैं, अधिकारी बैठकें करते हैं और फिर सब कुछ वैसा ही चलता रहता है। लगता है प्रदूषण को रोकने से अधिक उसे लेकर चिंता जताने की व्यवस्था विकसित हो गई है। असली सवाल यही है कि नियम इतने सख्त होने के बावजूद उनका पालन इतना कमजोर क्यों है?

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम पर सात वर्षों में लगभग 12,087 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन परिणाम उम्मीदों के अनुरूप नहीं मिले। 130 शहरों में से 117 शहर अब भी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से ऊपर प्रदूषण झेल रहे हैं। केवल 13 शहर ही निर्धारित मानकों तक पहुँच पाए। कई शहरों में तो खर्च के बावजूद प्रदूषण बढ़ गया। आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी हवा साफ क्यों नहीं हुई? क्या प्रदूषण नियंत्रण का अर्थ केवल योजनाएँ बनाना, बैठकें करना और रिपोर्ट तैयार करना रह गया है? जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहाँ खर्च हुआ और उससे कितना सुधार आया। सरकारी खर्च की बड़ी रकम अपने आप सफलता का प्रमाण नहीं बन जाती। जब परिणाम हवा में दिखाई न दें, तो योजनाओं की समीक्षा भी उतनी ही कठोर होनी चाहिए जितने कठोर उनके नियम हैं।

प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी जिन बोर्डों पर है, उनकी स्थिति भी चिंताजनक है। इन बोर्डों में लगभग 45 प्रतिशत पद खाली हैं। वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और निरीक्षकों की कमी से कारखानों तथा प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों की नियमित जाँच प्रभावित होती है। यह वैसा ही है जैसे चौकीदार के बिना घर की सुरक्षा की उम्मीद करना। जब निरीक्षक ही नहीं होंगे, तो कारखानों के धुएँ और औद्योगिक कचरे पर निगरानी कौन रखेगा? नियम बनाने वाली व्यवस्था मौजूद है, लेकिन उन्हें लागू करने वाले पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं। खाली पद प्रदूषण फैलाने वालों को खुली छूट देते हैं। जब तक संस्थाओं को पर्याप्त कर्मचारी, आधुनिक उपकरण और स्वतंत्र कार्यक्षमता नहीं मिलेगी, तब तक कागजी सख्ती का कोई अर्थ नहीं होगा।

व्यवस्था की असली कमजोरी कार्रवाई के नाम पर होने वाली खानापूर्ति में दिखाई देती है। कई निगरानी केंद्र बंद रहते हैं और निर्माण स्थलों पर नियमों का उल्लंघन जारी रहता है। दिल्ली में निर्माण संबंधी उल्लंघनों पर करोड़ों रुपये के जुर्माने लगाए गए, लेकिन वसूली मुश्किल से छह-सात प्रतिशत ही हो सकी। जुर्माना लगाने में तेजी और वसूली में सुस्ती कैसी सख्ती है? सर्वोच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2026 में भी स्पष्ट किया कि केवल आदेश जारी करने से समस्या हल नहीं होगी, उनका जमीन पर पालन होना चाहिए। मगर अधिकारी निर्देश जारी करके ही अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। फाइल में कार्रवाई पूरी हो जाती है, लेकिन सड़क पर धूल उड़ती रहती है। जब उल्लंघन करने वालों को दंड का भय ही नहीं होगा, तो वे नियमों का पालन क्यों करेंगे?

प्रदूषण किसी एक शहर या राज्य की समस्या नहीं है, लेकिन इसे रोकने की जिम्मेदारी आते ही सभी अपने-अपने दायरे में सिमट जाते हैं। दिल्ली-एनसीआर के राज्यों ने इस वर्ष निर्धारित कार्ययोजनाओं का केवल 40 से 60 प्रतिशत काम पूरा किया। राजस्थान की प्रगति सबसे पीछे रही, जबकि उत्तर प्रदेश अपेक्षाकृत आगे रहा। एक राज्य पराली जलाने का आरोप लगाता है, दूसरा वाहनों और निर्माण की धूल को जिम्मेदार ठहराता है। दिल्ली अपनी समस्याएँ गिनाती है और पड़ोसी राज्य अपनी मजबूरियाँ। इस आरोप-प्रत्यारोप में प्रदूषण बढ़ता रहता है। आयोगों और बैठकों का कोई विशेष अर्थ नहीं, जब तक साझा कार्ययोजना और जिम्मेदारी तय न हो। हवा राज्य की सीमाएँ नहीं पहचानती, इसलिए उसे साफ रखने की जिम्मेदारी भी सीमाओं में नहीं बँट सकती।

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नियमों के कमजोर पड़ने का एक बड़ा कारण कार्रवाई में असमानता भी है। छोटे ठेकेदार या दुकानदार पर कार्रवाई आसान है, लेकिन बड़ी औद्योगिक इकाइयों के मामलों में प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है। कहीं कानूनी अपील, कहीं तकनीकी जाँच और कहीं विभागीय अनुमति के नाम पर कार्रवाई टलती रहती है। इस बीच प्रदूषण जारी रहता है। कानून का प्रभाव तभी होगा, जब वह छोटे-बड़े सभी पर समान रूप से लागू होगा। साथ ही, प्रदूषण के लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराकर बाकी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पराली के साथ वाहनों का धुआँ, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण की धूल, कचरा जलाना और सड़कों की खराब सफाई भी प्रदूषण बढ़ाते हैं। समस्या अनेक कारणों से पैदा होती है, इसलिए समाधान भी व्यापक और निरंतर होना चाहिए।

अब आवश्यकता नए आदेशों से अधिक पुराने आदेशों के पालन की है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के खाली पद भरे जाएँ और निगरानी केंद्र सक्रिय रहें। जुर्मानों की पूरी वसूली हो तथा बार-बार नियम तोड़ने वाली इकाइयों पर कठोर कार्रवाई हो। प्रत्येक विभाग और अधिकारी की जिम्मेदारी तय हो। योजनाओं पर खर्च और उनके परिणाम सार्वजनिक किए जाएँ। राज्यों के बीच समन्वय बढ़े और प्रदूषण के स्रोतों की नियमित निगरानी हो। अधिकारियों से केवल आदेश नहीं, ठोस परिणाम भी माँगे जाएँ। प्रदूषण नियंत्रण की सफलता बैठकों और रिपोर्टों से नहीं, बल्कि हवा की गुणवत्ता में सुधार से मापी जानी चाहिए।

विडंबना यह है कि जिस हवा पर सबका समान अधिकार है, उसे साफ रखने की जिम्मेदारी निभाने में ही सबसे अधिक लापरवाही दिखाई देती है। जनता को स्वच्छ हवा का आश्वासन मिलता है, लेकिन बदले में उसे मास्क, दवाइयाँ और बीमारियों का खर्च उठाना पड़ता है। सरकार की सफलता नियमों की संख्या या खर्च किए गए बजट से नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन में आए सुधार से तय होनी चाहिए। जब तक नियम तोड़ने वालों को दंड और जिम्मेदारी से बचने वाले अधिकारियों को जवाबदेही का सामना नहीं करना पड़ेगा, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। आखिर कानून का उद्देश्य फाइलों में सख्ती दिखाना नहीं, लोगों का जीवन सुरक्षित करना है। वरना नियम कागजों पर शेर बने रहेंगे, अधिकारी उनकी दहाड़ सुनाते रहेंगे और जनता जहरीली हवा में साँस लेने को मजबूर रहेगी।

साफ हवा कोई एहसान नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है। प्रदूषण रोकने के दावे नहीं, धरातल पर ठोस कार्रवाई चाहिए। सवाल सिर्फ जहरीली हवा का नहीं, लाखों लोगों की जिंदगी का है। अब वक्त आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और कागजी पहरेदारी की जगह वास्तविक कार्रवाई दिखाई दे।

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