बंगाल की खाड़ी, जो कभी समुद्री जैव विविधता, प्राकृतिक संपदा और जीवनदायिनी मानसूनी हवाओं का विशाल केंद्र मानी जाती थी, आज चक्रवातों, समुद्री तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का गवाह बन रही है। प्रकृति की यह प्रयोगशाला आखिर तबाही के कारखाने में कैसे बदलती जा रही है? क्या इसके पीछे बदलता जलवायु चक्र और मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार हैं?प्रकृति का पलटवार या हमारी विकास-दृष्टि की विफलता?

आसमान की रंगत बदल रही है, समुद्र का मिजाज बिगड़ रहा है और तटों पर खतरे की आहट लगातार तेज हो रही है। बंगाल की खाड़ी में एक सप्ताह के भीतर चक्रवात अर्णब और मुरासु का आना महज दो मौसमी घटनाएँ नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलते तेवर का गंभीर संकेत है। 28 अक्टूबर को अर्णब ने आंध्र प्रदेश के तट को प्रभावित किया और 3 नवंबर की सुबह मुरासु ने फिर उसी तटीय क्षेत्र को संकट के घेरे में ला खड़ा किया। दो तूफानों के बीच इतना कम अंतराल बताता है कि बंगाल की खाड़ी अब केवल समुद्री हलचल का क्षेत्र नहीं रह गई है; वह मानो तूफानों की जन्मस्थली बनती जा रही है। समुद्र की बढ़ती तपिश और ग्लोबल वार्मिंग ने इस खतरे को और धार दी है। अब चिंता केवल अगले चक्रवात की नहीं, बल्कि उस भविष्य की है जहाँ तटीय आबादी को हर तूफान के बाद अगले तूफान का इंतजार करना पड़ सकता है।
चक्रवातों की ताकत का राज अब समुद्र की गहराती तपिश में छिपा है। समुद्र का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण तेज होता है और वातावरण में नमी व ऊर्जा का भंडार बढ़ता है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही यही ऊर्जा चक्रवातों को अधिक प्रचंड बना सकती है। बंगाल की खाड़ी पर हुए एक शोध (साइंटिफिक रिपोर्ट्स, 2023) में 1982 से 2021 के बीच समुद्री उष्ण लहरों की 107 घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनकी आवृत्ति में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति सामने आई। यह आँकड़ा महज वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं, समुद्र के बदलते स्वभाव की गंभीर चेतावनी है। बेशक, हर चक्रवात के लिए ग्लोबल वार्मिंग को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उसकी उत्पत्ति और तीव्रता अनेक मौसमी परिस्थितियों से तय होती हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि लगातार गर्म होती जलवायु चक्रवातों के विनाशकारी प्रभावों को और बढ़ा सकती है।
मौसम अब अपने पुराने मिजाज से बगावत कर रहा है। जलवायु परिवर्तन का संकट धीरे-धीरे पनपता है, लेकिन तबाही पलभर में मचा देता है। समुद्र का बढ़ता तापमान, वायुमंडलीय नमी, हवाओं की दिशा और अल नीनो जैसी परिस्थितियाँ चक्रवातों की तीव्रता व वर्षा को प्रभावित करती हैं। चक्रवातों की संख्या हर साल बढ़े, यह जरूरी नहीं; लेकिन गर्म जलवायु में शक्तिशाली तूफानों और भारी वर्षा का खतरा बढ़ सकता है। अर्णब और मुरासु ने दिखा दिया कि एक आपदा से उबरने से पहले दूसरी आ सकती है। इसलिए प्रशासन को तूफानों की गति, उनके बीच का अंतराल, संभावित वर्षा, समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तटीय आबादी की संवेदनशीलता पर एक साथ ध्यान देना होगा।
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चक्रवात जब तट से टकराता है, तो सबसे पहले गरीब की थाली, किसान की फसल और मछुआरे की रोजी-रोटी उजड़ती है। जिनका जीवन समुद्र और मौसम के भरोसे चलता है, उनके लिए हर तूफान एक नई मुसीबत लेकर आता है। मछुआरे का आजीविका-सहारा समुद्र चेतावनी जारी होते ही जानलेवा खतरा बन जाता है। किसान की महीनों की मेहनत कुछ घंटों की मूसलाधार बारिश में बह जाती है, तो कमजोर मकानों में रहने वाले परिवारों पर बेघर होने का भय मंडराने लगता है। पेड़ उखड़ते हैं, बिजली के खंभे गिरते हैं, सड़कें जलमग्न हो जाती हैं और संचार व्यवस्था ठप पड़ने से राहत कार्य भी प्रभावित होते हैं। सरकारी सहायता, राशन और अस्थायी आश्रय तात्कालिक राहत तो देते हैं, लेकिन स्थायी सुरक्षा के लिए आजीविका की बहाली, सुरक्षित आवास, बीमा और आपदा के बाद शीघ्र आर्थिक सहायता भी उतनी ही जरूरी है।
तरक्की की इमारतें यदि प्रकृति की नींव खोखली करके खड़ी की जाएँ, तो उनका टिकना भी मुश्किल है। बंदरगाहों, सड़कों, उद्योगों और शहरी बस्तियों का विस्तार अर्थव्यवस्था को गति देता है, लेकिन तटीय पारिस्थितिकी की अनदेखी इस विकास को विनाश में बदल सकती है। मैंग्रोव वन समुद्री लहरों और तूफानी पानी के सामने प्राकृतिक ढाल बनकर तटों की रक्षा करते हैं। इनका विनाश इस सुरक्षा-कवच को कमजोर करता है। इसलिए विकास रोकना नहीं, उसे प्रकृति के अनुकूल बनाना जरूरी है। तटीय निर्माण से पहले जोखिम का आकलन हो, प्राकृतिक जलनिकासी के रास्ते सुरक्षित रहें और संवेदनशील क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण पर रोक लगे। स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार भी तभी सार्थक होगा, जब ऊर्जा की बचत, कार्बन उत्सर्जन में कटौती और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी साथ-साथ चले।
समुद्र का बढ़ता जलस्तर आने वाले समय में तटीय आबादी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। तटीय इलाकों में बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ेगा, वहीं खारा पानी खेतों और भूजल में घुसकर फसलों तथा पीने के पानी के स्रोतों को प्रभावित कर सकता है। तूफान थमने के बाद भी स्कूलों की बंदी, अस्पतालों पर दबाव और रोजगार का संकट लंबे समय तक बना रहता है। बच्चों और युवाओं के लिए जलवायु परिवर्तन अब किताबों का विषय नहीं, उनके भविष्य और जीवन से जुड़ी हकीकत है। ऐसे में हर तटीय जिले को पहले से तय करना होगा कि बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों से लोगों को कब और कहाँ पहुँचाना है, आश्रय की व्यवस्था कैसे होगी और बिजली-पानी जैसी जरूरी सेवाएँ कितनी जल्दी बहाल की जाएँगी।
तूफान के बाद मलबा समेटना मजबूरी है, लेकिन उससे पहले तैयारी करना हमारी जिम्मेदारी। इसके लिए मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी, स्थानीय भाषाओं में चेतावनी, समय पर निकासी, प्रशिक्षित राहत दल और चक्रवात-रोधी आश्रय जरूरी हैं। मछुआरों को समुद्र की विश्वसनीय सूचना, किसानों को मौसम के अनुकूल सलाह और तटीय समुदायों को आपदा से बचाव का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। साथ ही, मैंग्रोव वनों की बहाली, तटीय निर्माण पर नियंत्रण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती अनिवार्य है। बंगाल की खाड़ी केवल तूफानों का रास्ता नहीं, करोड़ों लोगों की आजीविका और देश की पारिस्थितिक सुरक्षा की जीवनरेखा है। अर्णब और मुरासु ने जता दिया है कि प्रकृति के संकेतों की अनदेखी भारी पड़ सकती है। समुद्र की अगली गर्जना से पहले हमें अपनी तैयारी की आवाज बुलंद करनी होगी, क्योंकि अगली चेतावनी शायद संभलने का अवसर न दे।



