जलते पुतले, बढ़ते रावण

जलते पुतले देखकर, खुश होता संसार। मन के रावण पल रहे, कौन करे संहार॥

पुतला जलकर राख है, मन में भरा विकार। कैसे होगा अंत फिर, झूठ-कपट- अहँकार॥

रावण के दस शीश थे, दस अवगुण की खान। आज हजारों रूप में, घूम रहे शैतान॥

राम नाम मुख पर सजा, मन में छल का वास। कैसे मिट पाएँ भला, रावण के संत्रास॥

ऊँचा पुतला देखकर, मत कर इतना गर्व। ऊँचा कर अपना चरित, तभी सफल हो पर्व॥

लोभ, मोह, मद, क्रोध से, मन होता बीमार। इनका दहन किए बिना, कैसे हो उद्धार॥

नारी की अस्मत लुटे, मानवता लाचार। किस मुँह से उत्सव मने, बोलो करो विचार॥

मंदिर में कर आरती, सँग करें अनाचार। यूँ धर्म-कर्म से भला, कैसे हो उद्धार॥

पुतले पर अब तीर की, होती बस बौछार। अन्यायों के सामने, चुप क्यों है संसार॥

बाहर रावण जल रहा, भीतर पलता लोभ। मन की मैल मिटे बिना, व्यर्थ धर्म का क्षोभ॥

सत्य खड़ा है मौन क्यों, झूठ करे हुंकार। जब तक सच निर्भय न हो, कैसे हो उद्धार॥

रिश्तों में विश्वास का, टूट रहा आधार। स्वार्थ बना जब देवता, प्रेम हुआ लाचार॥

शिक्षा पाकर भी अगर, मन में रहे विकार। डिग्री केवल कागजों, चरित्र असल आधार॥

एक बुराई छोड़कर, लो संकल्प महान। विजयादशमी तब बने, जीवन का अभियान॥

राम बनो आचरण से, छोड़ो झूठ-विकार। कर्म तुम्हारे बोल उठें, सच्चा हो त्योहार॥

पुतले जलते रह गए, बदले नहीं विचार। मन का रावण मारिए, तभी जीत साकार॥

…… डॉ. प्रियंका सौरभ

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