
लखनऊ। लोकतांत्रिक समाज में सूचना की सत्यता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन हमेशा से एक जटिल समस्या रही है। कानूनी विशेषज्ञों, राजनीतिक विश्लेषकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार, हाल के वर्षों में सार्वजनिक विमर्श में भ्रामक सूचनाओं (फेक न्यूज) और भड़काऊ बयानों की भूमिका ने देश से प्रेम करने वालों की चिंताएँ बढ़ाई हैं। सार्वजनिक जीवन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों जैसे राजनेताओं, अभिनेताओं, छात्र नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अक्सर राजनीतिक लाभ या एजेंडे के तहत समाज को गुमराह करने या अशांति फैलाने वाले दावे करने के आरोप लगते रहे हैं। जहाँ समाज का एक बड़ा वर्ग इसे देश की शांति और आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानता है, वहीं कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञ इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के चश्मे से भी देखते हैं। इस विरोधाभास के बीच यह सवाल अक्सर उठता है कि आखिर ऐसे प्रभावशाली लोग कानून के शिकंजे में आसानी से क्यों नहीं आ पाते और हमारे कानूनी ढाँचे में ऐसी कौन-सी खामियाँ हैं जिनका लाभ इन्हें मिलता है।
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(अ) प्रत्येक नागरिक को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है और अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और उकसावे जैसे आधारों पर इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसके बावजूद, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आती है कि भारत के कानूनी ढाँचे में फेक न्यूज या घृणास्पद भाषण (हेट स्पीच) की कोई एक स्पष्ट और सर्वमान्य वैधानिक परिभाषा मौजूद नहीं है। किसी विशिष्ट कानून के अभाव में, ऐसी गतिविधियों से निपटने के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), जो पहले भारतीय दंड संहिता या आईपीसी थी, की विभिन्न धाराओं जैसे 153 (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295 (धार्मिक भावनाओं को आहत करना) और 505 (सार्वजनिक शरारत के लिए दिए गए बयान) का सहारा लिया जाता है।
इन सामान्य धाराओं की वजह से कानूनी प्रक्रिया में कठिनाई आ जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों, जैसे कि श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में, यह स्पष्ट किया है कि केवल अप्रिय या विवादास्पद बयान देना अपराध नहीं है, जब तक कि वह सीधे तौर पर हिंसा भड़काने या सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर रूप से बाधित करने का कारण न बने। इस विधिक व्याख्या के कारण, जब कोई नेता या बुद्धिजीवी किसी भ्रामक तथ्य को घुमा-फिराकर पेश करता है, तो वह अक्सर कानून की इस सूक्ष्म सीमा का लाभ उठा लेता है। उनके बयानों को तथ्यों की अपनी व्याख्या या आलोचनात्मक दृष्टिकोण का नाम दे दिया जाता है, जिससे अदालत में उनके खिलाफ अपराध सिद्ध करना बेहद कठिन हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, डिजिटल युग और सोशल मीडिया के प्रसार ने इस समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है। आज कोई भी बयान या भ्रामक जानकारी व्हाट्सएप, एक्स (ट्विटर) या फेसबुक के जरिए पलक झपकते ही लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मध्यस्थ का दर्जा प्राप्त है, जिससे उन्हें शुरुआती तौर पर सामग्री के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। यद्यपि आईटी नियम 2021 और हालिया संशोधनों के माध्यम से भ्रामक सामग्री को हटाने के नियम सख्त किए गए हैं, लेकिन गुमनाम खातों और एन्क्रिप्टेड संदेशों के कारण सूचना के मूल स्रोत या असली साजिशकर्ता तक पहुँचना पुलिस के लिए एक तकनीकी और कानूनी भूलभुलैया साबित होता है।
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प्रभावशाली लोगों के कानूनी शिकंजे से बच निकलने का एक और व्यावहारिक कारण प्रक्रियात्मक देरी और राजनीतिक प्रभाव भी है। कई बार ऐसे मामलों में दर्ज की गई प्राथमिकियों (एफआईआर) की जाँच राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर प्रभावित होती है। इसके अलावा, अदालतों में मुकदमों के भारी बोझ के कारण अंतिम फैसला आने में सालों लग जाते हैं, जिससे कानून का डर कम हो जाता है। जब तक कोई मामला तार्किक परिणति तक पहुंचता है, तब तक उस भ्रामक बयान का राजनीतिक या सामाजिक प्रभाव खत्म हो चुका होता है और जनता का ध्यान नए मुद्दों की ओर आकर्षित हो जाता है। इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए विधि आयोग और विभिन्न विशेषज्ञ समितियों ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह माना जाता है कि कानून में फेक न्यूज और हेट स्पीच को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए, जैसा कि हाल ही में कुछ राज्य सरकारों ने अपने विशिष्ट विधेयकों के माध्यम से करने का प्रयास किया है। इसके तहत केवल सामान्य धाराओं के बजाय भ्रामक सूचनाओं के जरिए सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने के लिए विशेष दंड प्रावधान होने चाहिए। दूसरा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही को और अधिक कड़ा किया जाना आवश्यक है ताकि वे अपने एल्गोरिदम के माध्यम से ऐसी सामग्री को प्रवर्धित न होने दें। साथ ही, फास्ट कोर्ट का गठन कर सार्वजनिक हस्तियों द्वारा समाज को भड़काने वाले मामलों की सुनवाई एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए। अंततः, कानूनी उपायों के साथ-साथ समाज में डिजिटल साक्षरता और तथ्य-जांच (फैक्ट-चेकिंग) की संस्कृति को बढ़ावा देना भी उतना ही जरूरी है, ताकि देश की जनता स्वयं जागरूक होकर किसी भी एजेंडे या झूठ का शिकार होने से बच सके।



