लोकतंत्र की खूबसूरती असहमति में है, लेकिन असहमति का सम्मानजनक संवाद में बदलना उसकी मजबूती है। सत्ता और विपक्ष के बीच स्वस्थ बहस, तर्क और मर्यादा ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत आधार देते हैं।

लोकतंत्र संवाद से चलता है। सहमति और असहमति परस्पर संवाद करते हैं। सभी राजनैतिक दल वर्ग आधारित समूह बहस करते हैं। बहस में कुछ दीर्घकालिक तथ्य और सत्य होते हैं और कुछ अल्पकालिक। रोजमर्रा के जीवन में लगातार बहस चला करती है। संसदीय जनतंत्र में इसीलिए सरकार और प्रतिपक्ष मिलकर परस्पर संवाद करते हैं। विपक्ष के नेता को सम्मान की परंपरा भी इसी विचार का विस्तार है। देश ने अटल बिहारी जैसे वरिष्ठ नेताओं को नेता प्रतिपक्ष के रूप में देखा है। अटल जी को भारत के प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस ने ही संयुक्त राष्ट्र भेजा था। अटल जी ने भारत और भारत सरकार की प्रशंसा की थी। सारी दुनिया हतप्रभ थी कि आखिरकार सत्ता और विपक्ष में ऐसा अंतर्संगीत क्यों है? एक नेता प्रतिपक्ष अटल जी थे एक नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हैं। राहुल गांधी सभी अवसरों पर निराश करते हैं। वे जनता को विद्रोह के लिए उत्तेजित करते हैं। जंतर मंतर वाली घटना में राहुल गांधी का व्यवहार गैरजिम्मेदाराना था।
ताजा मसला देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का है। राहुल गांधी ने उनसे तत्काल त्यागपत्र की मांग की है। वैसे त्यागपत्र का मांगा जाना कोई अपराध नहीं है। लेकिन पूरी निर्वाचन व्यवस्था को वोट चोरी कहना देश के साथ अपराध है। भारत के निर्वाचन आयोग की प्रशंसा सारी दुनिया में रही है। राहुल गांधी ने अपने बयान से पूरी निर्वाचन व्यवस्था को भ्रष्ट बताया है और पीछे के तमाम निर्वाचनों को रद्द करने की हास्यास्पद मांग की है। राहुल गांधी की कठिनाई यह है कि वे अध्ययन नहीं करते। चुनाव को रद्द करने का अधिकार संविधान ने किसी को नहीं दिया। न देश में इसके लिए कोई कानून है न ऐसी कोई व्यवस्था। संविधान प्रेमी आहत हैं। राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग लाने की तैयारी की घोषणा की है। वे मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध हमलावर हैं और 2 चुनाव आयुक्तों के प्रशंसक हैं। उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों की सार्वजानिक प्रशंसा की है और उनसे अपील की है कि वे प्रस्तावित कथित मुकदमे में सरकारी गवाह बन जाएं।
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जनादेश प्राप्त सरकार के विरुद्ध आंदोलन करना बेशक विपक्ष का अधिकार है, लेकिन देश के करोड़ों लोगों में संविधान और उसकी संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना भारतीय राष्ट्र राज्य के विरुद्ध अपराध है। राहुल के इस आचरण की चारों ओर निंदा हो रही है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा है कि इन मुख्य चुनाव आयुक्त के द्वारा कराए गए मतदान से उनका भरोसा खत्म हो गया है। उन्होंने पूरा जोर देकर कहा है कि 2024 के लोकसभा व अन्य विधानसभा चुनाव में धांधली हुई है।
कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग में हुए निर्णय सर्वसम्मत नहीं हैं। 3 सदस्यीय चुनाव आयोग में विभिन्न निर्णयों पर सहमति और असहमति स्वाभाविक है। आंतरिक बहस के बावजूद सभी निर्णय सर्वसम्मत हुए हैं। देश जानना चाहता है कि आखिरकार पूरी संवैधानिक व्यवस्था को बेइज्जत करना कहां का न्याय है। मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध कोई आरोप नहीं। चुनाव आयुक्तों में कोई मतभिन्नता नहीं है, फिर इस्तीफा मांगने का तुक क्या है? सरकार का विरोध और संवैधानिक संस्थाओं का अपमान अलग अलग बातें हैं। कांग्रेस मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं का चीर हरण खतरनाक है।
राष्ट्र राज्य भरोसे से चलते हैं। हम भारत के लोग संविधान के प्रति निष्ठा रखते हैं। संविधान ने अनेक संस्थाएं दी हैं। न्यायपालिका, विधायिका सर्वविदित हैं। उनके प्रति आदर भाव रखना हम सब का कतऱ्व्य है। ये तो कोई बात न हुई। कहीं से उड़ती खबर या अपुष्ट सूचना के आधार पर इस्तीफा इस्तीफा चिल्लाना कहां का न्याय है। संविधान में अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग को सभी चुनाव संपन्न कराने का अधिकार दिया गया है। संविधान सभा में चुनाव आयोग पर लम्बी बहस हुई थी। सरकारी मशीनरी से निष्पक्षता की रक्षा करने का विषय भी आया था। कांग्रेस की निंदा करने का प्रश्न नहीं है। लेकिन संवैधानिक संस्था की साख को सरेआम बेइज्जत करने का कृत्य अपराध है। नेता प्रतिपक्ष के पास कोई अभिलेखीय तथ्य नहीं है। चुनाव आयुक्तों ने भी किसी त्रुटि का उल्लेख नहीं किया।
राहुल गांधी के उकसावे में जंतर मंतर की घटना के समय अस्तित्व में आई कॉकरोच जनता पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा मांगा है। कथित राजनैतिक पार्टी की तरफ से मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा मांगा गया है। कहा गया है कि वह 48 घंटे के भीतर त्याग पत्र नहीं देते तो जंतर मंतर-2 राष्ट्र व्यापी आंदोलन चलाया जाएगा। पार्टी ने कहा है कि चुनाव प्रक्रिया में धांधली की गई है। नागरिकों से मतदान का अधिकार छीना जा रहा है। पार्टी के संस्थापक ने कहा है कि यदि ज्ञानेश कुमार 48 घंटे के भीतर इस्तीफा नहीं देते तो हम दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करने के पहले एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन करेंगे।
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वाम दलों ने निर्वाचन आयोग से जुड़े विवाद के बीच कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के साथ मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव एम ए बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के महासचिव डी राजा और भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने एक संयुक्त बयान में यह भी कहा कि दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों से निर्वाचन आयोग के कामकाज और उसकी स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग से जुड़े खुलासों से विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों द्वारा पहले उठाई गई चिंताओं को बल मिलता है तथा यह दावा कमजोर होता है कि एसआइआर और मतदाता सूची का प्रबंधन पारदर्शी और विकेंद्रीकृत है।
राष्ट्रभक्त बेचैन हैं। सार्वजनिक बहस का स्तर गिर रहा है। आरोप प्रत्यारोप तो पहले से ही सार्वजनिक जीवन के प्रति गलत धारणा विकसित कर रहे थे। संवैधानिक संस्थाओं को भी घसीटने से वातावरण लगातार खराब हो रहा है। संसदीय परंपरा और राष्ट्रभाव भी अवमूल्यन के शिकार हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में आदर्श राजनीतिक परंपराओं को भी तहस नहस किया जा रहा है। जंतर मंतर जैसी घटनाएं राहुल गांधी और कांग्रेस द्वारा प्रायोजित हैं। देशप्रेमियों को विभाजनकारी आत्मघाती बयानबाजी से बचाने के लिए स्वयं आगे आना चाहिए।



