स्कूलों की चमक नहीं,शिक्षा की गुणवत्ता बने पहचान

अवनीश कुमार गुप्ता
अवनीश कुमार गुप्ता

भारत में स्कूली शिक्षा की बहस लंबे समय तक विद्यालयों की संख्या, नामांकन और बुनियादी सुविधाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। अब प्रश्न बदल रहा है। बच्चा विद्यालय में पहुंच रहा है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह है कि विद्यालय पहुंचने के बाद वह सीख क्या रहा है, उसकी जिज्ञासा कितनी विकसित हो रही है और भविष्य की चुनौतियों के लिए उसकी तैयारी कैसी है। प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया यानी पीएम श्री योजना इसी बदलाव को संस्थागत रूप देने का प्रयास है। सितंबर 2022 में शुरू हुई यह केंद्र प्रायोजित योजना 2022-23 से 2026-27 तक चलनी है और 14,500 से अधिक मौजूदा विद्यालयों को नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप अनुकरणीय संस्थानों के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखती है। इसका कुल परियोजना व्यय 27,360 करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्रीय हिस्सा 18,128 करोड़ रुपये है।

जुलाई 2026 तक 13,092 विद्यालय पीएम श्री के लिए चयनित किए जा चुके थे। सरकार के अनुसार ये विद्यालय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ-साथ केंद्रीय विद्यालय संगठन, नवोदय विद्यालय समिति और एनसीईआरटी से संबंधित संस्थानों को भी शामिल करते हैं। लक्ष्य की तुलना में यह लगभग 90 प्रतिशत उपलब्धि है। चयनित विद्यालय 725 जिलों और 8,340 ब्लॉकों तथा शहरी स्थानीय निकाय क्षेत्रों तक पहुंच चुके हैं। उत्तर प्रदेश 1,888 विद्यालयों के साथ सबसे आगे है, जबकि महाराष्ट्र में 946 और मध्य प्रदेश में 944 विद्यालय चयनित हैं। सरकार का अनुमान है कि योजना से 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।

लेकिन किसी शिक्षा योजना की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने विद्यालय चयनित हुए। असली सवाल यह है कि इन विद्यालयों में शिक्षा की प्रकृति कितनी बदली है। पीएम श्री की मूल अवधारणा ही यह है कि चयनित विद्यालय अपने आसपास के दूसरे विद्यालयों के लिए अनुकरणीय संस्थान बनें और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए नेतृत्व तथा मार्गदर्शन उपलब्ध कराएं। यानी योजना का उद्देश्य केवल कुछ विद्यालयों को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि उनके माध्यम से व्यापक विद्यालयी व्यवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू करना है।

यहीं से योजना की सबसे बड़ी संभावनाएं और सबसे कठिन चुनौतियां दोनों सामने आती हैं।

पीएम श्री में शिक्षा को नई शिक्षा नीति के 5+3+3+4 ढांचे के अनुरूप विकसित करने, अनुभवात्मक और गतिविधि आधारित अधिगम को बढ़ाने तथा पाठ्यक्रम को बहुविषयी और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने पर जोर है। इसका लक्ष्य बच्चे को केवल पाठ याद कराने के बजाय उसे प्रश्न पूछने, प्रयोग करने, समस्या समझने और समाधान खोजने की क्षमता देना है। विद्यालयों में डिजिटल संसाधन, स्मार्ट कक्षाएं, सूचना एवं संचार तकनीक, विज्ञान तथा कौशल प्रयोगशालाओं जैसी सुविधाओं को भी इसी व्यापक उद्देश्य से जोड़ा गया है। हाल के सरकारी विवरण में सीखने के परिणाम, समावेशी शिक्षा, हरित विद्यालय, अनुभवात्मक अधिगम और भविष्य के कौशल को पीएम श्री के प्रमुख आयामों के रूप में रेखांकित किया गया है।

यह परिवर्तन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रोजगार की दुनिया तेजी से बदल रही है। आने वाले समय में केवल पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान से काम नहीं चलेगा। रचनात्मकता, डिजिटल साक्षरता, तार्किक सोच, समस्या-समाधान, नेतृत्व, संवाद और नैतिक निर्णय जैसी क्षमताएं भी आवश्यक होंगी। इसलिए विद्यालय को परीक्षा केंद्र से सीखने के केंद्र में बदलना समय की मांग है।

भाषा के स्तर पर भी योजना में महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं। यूडीआईएसई+ 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार पीएम श्री विद्यालयों में संस्कृत के 6,102, उर्दू के 1,994 और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के 9,152 शिक्षक दर्ज हैं। यह तथ्य बताता है कि बहुभाषिकता को केवल सांस्कृतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की कोशिश हो रही है।

हालांकि भाषा संबंधी यह उपलब्धि तभी सार्थक होगी जब स्थानीय भाषा और मातृभाषा का प्रयोग वास्तव में कक्षा-कक्ष की शिक्षण पद्धति में दिखाई दे। केवल अलग भाषा के शिक्षक की नियुक्ति पर्याप्त नहीं है। बच्चे को अपनी भाषा में प्रश्न पूछने, विचार व्यक्त करने और अवधारणाओं को समझने का अवसर मिलना चाहिए। भाषा शिक्षा की सुविधा नहीं, ज्ञान तक पहुंच का माध्यम है।

योजना की एक और निर्णायक कड़ी शिक्षक हैं। अच्छी इमारत, स्मार्ट बोर्ड और इंटरनेट सुविधा शिक्षक का विकल्प नहीं बन सकते। पीएम श्री के अंतर्गत जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से क्षमता निर्माण पर जोर दिया गया है। प्रत्येक डायट को क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के लिए तीन लाख रुपये तक और शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए प्रति शिक्षक 2,500 रुपये तक की सहायता का प्रावधान है। प्रधानाचार्यों को नेतृत्व और विद्यालय प्रबंधन का प्रशिक्षण देने की भी व्यवस्था है।

लेकिन शिक्षक प्रशिक्षण की असली सफलता प्रशिक्षण की संख्या से नहीं, कक्षा में उसके प्रभाव से मापी जानी चाहिए। यदि शिक्षक प्रशिक्षण के बाद भी वही पुरानी रटंत पद्धति अपनाता है, तो प्रशिक्षण प्रमाणपत्र बनकर रह जाएगा। शिक्षा सुधार का सबसे कठिन हिस्सा उपकरण खरीदना नहीं, शिक्षण संस्कृति बदलना है।

योजना की चयन प्रक्रिया भी विचारणीय है। पीएम श्री विद्यालयों का चयन चुनौती पद्धति के माध्यम से किया जाता है। राज्य या केंद्रशासित प्रदेश को समझौता ज्ञापन करना होता है, इसके बाद यूडीआईएसई+ के आधार पर पात्रता जांच और प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यांकन होता है। इसके बाद भौतिक सत्यापन किया जाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार शहरी विद्यालयों के लिए न्यूनतम 70 प्रतिशत और ग्रामीण विद्यालयों के लिए 60 प्रतिशत अंक की कसौटी रखी गई है।

यह प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था गुणवत्ता सुनिश्चित करने का प्रयास है, लेकिन इसके भीतर एक अंतर्निहित प्रश्न भी है। जो विद्यालय पहले से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं, उनके लिए मानकों पर खरा उतरना आसान हो सकता है। सबसे पिछड़े विद्यालय, जिनके पास आधारभूत संसाधन और संस्थागत क्षमता कम है, वे इस प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो योजना अनजाने में उन विद्यालयों को प्राथमिकता दे सकती है जो पहले ही कुछ बेहतर स्थिति में हैं। इसलिए उत्कृष्ट विद्यालय बनाने के साथ-साथ कमजोर विद्यालयों के लिए समानांतर सुधार रणनीति आवश्यक है।

सबसे गंभीर प्रश्न परिणामों का है। सरकार ने गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए स्कूल क्वालिटी असेसमेंट फ्रेमवर्क विकसित किया है, जिसमें पाठ्यक्रम, शिक्षण, मूल्यांकन, शिक्षक क्षमता, समावेशन, लैंगिक समानता, आधारभूत संरचना और विद्यार्थियों के सीखने के परिणाम जैसे पहलू शामिल हैं।

फिर भी वास्तविक परीक्षा यही होगी कि इन मानकों का स्वतंत्र मूल्यांकन कितनी कठोरता से होता है। विद्यालय में स्मार्ट कक्षा स्थापित हो जाना उपलब्धि है, लेकिन यदि बच्चा गणित की मूल अवधारणा नहीं समझ पा रहा, तो वह सुविधा अधूरी है। नई प्रयोगशाला बन जाना अच्छी बात है, लेकिन यदि उसमें प्रयोग नहीं हो रहे तो उसका शैक्षिक मूल्य सीमित है। रंगीन दीवारें, सुंदर फर्नीचर और डिजिटल स्क्रीन विद्यालय को आधुनिक दिखा सकते हैं; आधुनिक शिक्षा तब बनेगी जब विद्यार्थी की सोच आधुनिक होगी।

योजना का संघीय पक्ष भी महत्वपूर्ण है। केंद्र प्रायोजित योजना होने के कारण केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय तथा प्रशासनिक समन्वय इसकी सफलता की बुनियादी शर्त है। राज्यों की आर्थिक क्षमता, प्रशासनिक संरचना और स्थानीय शैक्षिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए पूरे देश में एक समान मॉडल लागू करने के बजाय राष्ट्रीय मानकों के साथ स्थानीय जरूरतों के लिए पर्याप्त लचीलापन आवश्यक है।

सबसे बड़ा जोखिम यह है कि पीएम श्री विद्यालय उत्कृष्टता के अलग-अलग द्वीप बन जाएं। यदि कुछ हजार विद्यालय आधुनिक संसाधनों से लैस हो जाएं लेकिन उनके आसपास के हजारों विद्यालय उसी पुराने ढांचे में चलते रहें, तो योजना का व्यापक प्रभाव सीमित हो जाएगा। इसलिए चयनित विद्यालयों से वास्तविक ज्ञान-साझाकरण, शिक्षक सहयोग, संसाधन-साझाकरण और मार्गदर्शन की व्यवस्था को मजबूत करना होगा। तभी ‘मॉडल स्कूल’ की अवधारणा ‘मॉडल व्यवस्था’ में बदल सकेगी।

पीएम श्री योजना को इसलिए केवल विद्यालय उन्नयन की योजना मानना उसके महत्व को छोटा करना होगा। यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था में उस बदलाव का संकेत है जिसमें ध्यान केवल पहुंच से गुणवत्ता, संसाधन से परिणाम और पाठ्यक्रम से दक्षता की ओर ले जाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यह परिवर्तन अपने आप नहीं होगा।

अंततः किसी विद्यालय की पहचान उसके भवन से नहीं, वहां से निकलने वाले विद्यार्थियों से होती है। यदि पीएम श्री विद्यालय ऐसे विद्यार्थी तैयार कर पाते हैं जो प्रश्न पूछते हैं, तर्क करते हैं, असहमति को समझते हैं, तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करते हैं, अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहते हैं और बदलती दुनिया में नए कौशल सीखने के लिए तैयार रहते हैं, तभी योजना को सफल कहा जाएगा। भारत को केवल आदर्श विद्यालयों की सूची नहीं चाहिए; उसे ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जिसमें हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण सीखने का अवसर मिले। पीएम श्री की असली अग्निपरीक्षा इसी अंतर को पाटने में है।

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