अजय कुमार
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी धीरे-धीरे गरमाती जा रही है। राज्य की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीतिक तैयारियों के तहत सांगठनिक मशीनरी को मथना शुरू कर दिया है। गौरतलब है, किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव केवल बयानों और भाषणों से नहीं लड़े जाते, बल्कि इसके पीछे एक मजबूत, अनुशासित और दुरुस्त संगठन की बड़ी भूमिका होती है। भाजपा इस बात को भली-भांति समझती है कि संगठन के कमजोर होने का मतलब कांग्रेस बन जाना होता है। इसीलिये उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सूबे में तीसरी बार विजय हासिल करने के लिए जमीन पर पार्टी के ढांचे का एकदम सटीक बैठाये जाने के लिये लम्बा विचार-विमर्श चल रहा है। यही कारण है कि प्रदेश और क्षेत्रीय कार्यकारिणी में बड़े पैमाने पर फेरबदल करने के बाद अब पार्टी का पूरा फोकस जिलों के प्रभारियों और जिला कमेटियों को बदलने पर केंद्रित हो गया है। सांगठनिक फेरबदल की इन चल रही बयारों और सुगबुगाहटों ने उन तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं की नींद उड़ा दी है, जो आगामी विधानसभा चुनाव के लिए खुद को टिकट का सबसे प्रबल दावेदार मानकर चल रहे थे।
संगठनात्मक बदलाव के इस सिलसिले की शुरुआत निचले और मध्यम स्तर पर व्यवस्थित ढंग से की जा रही है, जिसके तहत पिछले दिनों मुरादाबाद महानगर और जिला कार्यकारिणी के गठन व पुनर्गठन के जरिए साफ संदेश दे दिया गया था। इन नई कमेटियों के गठन के पीछे केवल सतही बदलाव का उद्देश्य नहीं था, बल्कि इसके जरिए बहुत ही बारीकी से जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश की गई है। उत्तर प्रदेश की राजनीति जातिगत ताने-बाने से गहराई से जुड़ी हुई है और कोई भी दल सामाजिक संतुलन को नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ सकता है। भाजपा ने जिस प्रकार से विभिन्न जिलों में नियुक्तियों के दौरान क्षेत्रीय और जातीय संतुलन का ध्यान रखा है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी का केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व किसी भी एक वर्ग या समीकरण के भरोसे चुनाव में उतरने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। हर जिले और महानगर में वहां की सामाजिक जनसांख्यिकी के मुताबिक चेहरों को आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि चुनावों से ठीक पहले किसी भी प्रकार के असंतोष को पनपने से रोका जा सके और सभी प्रमुख जातियों को संगठन के साथ जोड़कर एक मजबूत संदेश दिया जा सके।
जिला स्तर पर होने वाले इन बदलावों की श्रृंखला में अगला और सबसे महत्वपूर्ण चरण जिला प्रभारियों का फेरबदल माना जा रहा है, जिसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। जिला प्रभारी की भूमिका किसी भी जिले में पार्टी के भीतर बेहद प्रभावी और निर्णायक होती है। जिला प्रभारी न केवल संगठन और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय का काम करते हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर टिकट वितरण से लेकर चुनावी रणनीति की रूपरेखा तय करने में भी उनकी केंद्रीय भूमिका होती है। जब किसी जिले का प्रभारी बदला जाता है, तो उस जिले की पूरी राजनीतिक गतिशीलता प्रभावित होती है। अब तक जिन जिलों में पुराने प्रभारी जमे हुए थे, उनके साथ स्थानीय नेताओं और टिकट के दावेदारों के समीकरण सेट हो चुके थे। कई दावेदार पिछले कई वर्षों से अपने आकाओं और प्रभारियों के जरिए जमीन तैयार करने में जुटे थे, ताकि सही समय पर टिकट की जुगत भिड़ाई जा सके। लेकिन नए प्रभारियों के आने की संभावना मात्र से इन पुराने समीकरणों के ध्वस्त होने का खतरा पैदा हो गया है, जिससे टिकट के दावेदारों की धड़कनें तेज होना स्वाभाविक है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक असर उन नेताओं पर पड़ा है, जो लंबे समय से खुद को क्षेत्र का सर्वसर्वा मानकर बैठे थे और जिन्हें लगता था कि स्थानीय संगठन पर उनकी पकड़ के कारण पार्टी उनके सामने टिकट वितरण में किसी और विकल्प पर विचार ही नहीं करेगी। भाजपा में संगठनात्मक संस्कृति हमेशा से व्यक्ति-केंद्रित न होकर व्यवस्था-केंद्रित रही है, और समय-समय पर प्रभारियों को बदलकर पार्टी यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी नेता या पदाधिकारी एक ही जगह पर लंबे समय तक रहकर गुटबाजी या व्यक्तिगत प्रभाव का केंद्र न बन जाए। जब नए जिला प्रभारी आएंगे, तो वे अपने साथ नई कार्यशैली, निष्पक्ष आकलन रिपोर्ट और बिल्कुल नया दृष्टिकोण लेकर आएंगे। वे बिना किसी पूर्व पूर्वाग्रह के जमीनी हकीकत का जायजा लेंगे कि कौन सा नेता वास्तव में जनता के बीच लोकप्रिय है और किसकी सक्रियता सिर्फ कागजों तक सीमित है। यही वह बात है, जो उन दावेदारों को सबसे ज्यादा डरा रही है, जिनकी पकड़ जनता के बीच कम और पार्टी कार्यालयों के गलियारों में ज्यादा मजबूत मानी जाती है।
टिकट के दावेदारों की बढ़ी हुई मुश्किलों के पीछे एक और बड़ा कारण यह है कि नए प्रभारियों के जरिए पार्टी हाईकमान का सीधा संदेश कार्यकर्ताओं की कार्यक्षमता और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता पर आधारित है। अब तक टिकट के कई दावेदार सिर्फ इस भ्रम में जीते रहे हैं कि उनके पास वित्तीय संसाधन हैं या पार्टी के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी से उनकी नजदीकी है, तो टिकट उनकी झोली में खुद-ब-खुद आ जाएगा। लेकिन जिस प्रकार से पार्टी ने माइक्रो-मैनेजमेंट और जमीनी फीडबैक के आधार पर बदलाव करने शुरू किए हैं, उससे साफ है कि इस बार पैराशूट या केवल सिफारिश के दम पर टिकट पाने की राह आसान नहीं होगी। जिला प्रभारियों के बदलने से स्थानीय स्तर पर चल रहे वे तमाम गुप्त समीकरण और समझौते बिखर जाएंगे, जिनके बूते लोग टिकट की उम्मीद लगाए बैठे थे। नए प्रभारियों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे पूरी पारदर्शिता के साथ जिताऊ और जुझारू उम्मीदवारों के पैनल तैयार करें, जिससे उन लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं, जो सिर्फ हवा हवाई दावों के दम पर अपनी जमीन मजबूत मान रहे थे।
इसके साथ ही, इस पूरी संगठनात्मक सर्जरी के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बना रहे। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि चुनाव नजदीक आते-आते स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरियां बढ़ने लगती हैं, जिसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ता है। नए प्रभारियों की तैनाती इस बात को भी ध्यान में रखकर की जा रही है कि वे समन्वय स्थापित करने में माहिर हों और किसी भी तरह के आंतरिक विरोध या भीतरघात को समय रहते कुचल सकें। जब संगठन का पहिया दुरुस्त होता है और नीचे से लेकर ऊपर तक के पदाधिकारियों में एक स्पष्ट वैचारिक व कार्यगत अनुशासन होता है, तो चुनावी प्रबंधन स्वतः आसान हो जाता है। भाजपा का यह आंतरिक फेरबदल इस बात का प्रमाण है कि पार्टी ने चुनाव से काफी पहले ही अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करना शुरू कर दिया है, ताकि चुनावी समर में उतरने से पहले संगठन का हर एक सिपाही पूरी तरह से प्रशिक्षित और युद्ध के लिए तैयार मिले।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह से विपक्षी दल भी अपनी रणनीतियों को धार देने में लगे हैं, ऐसे में भाजपा का यह मथने वाला अभियान उसकी दूरगामी राजनीतिक सोच को दर्शाता है। संगठन के भीतर लगातार हो रहे इन परिवर्तनों से भले ही कुछ समय के लिए असंतोष या असमंजस की स्थिति पैदा होती हो, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह पार्टी को अधिक अनुशासित और धारदार बनाता है। जिन दावेदारों की मुश्किलें इन बदलावों की वजह से बढ़ी हैं, उनके पास अब अपनी कार्यशैली बदलने और जनता के बीच अपनी वास्तविक जमीनी पकड़ साबित करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्हें यह समझ आ चुका है कि अब केवल भाई-भतीजावाद या व्यक्तिगत नजदीकियों के सहारे उम्मीदवारी हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए संगठन के मानकों पर खरा उतरना ही होगा। अंततः, उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह दौर इस बात का गवाह बन रहा है कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए केवल चेहरों पर नहीं, बल्कि एक अचूक और परिष्कृत सांगठनिक तंत्र के निर्माण पर पूरी ताकत से काम कर रही है, जिसके आगे हर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को किनारे होना पड़ रहा है।



