हर माँ का सुरक्षित घर लौटना सिर्फ एक परिवार की खुशी नहीं, बल्कि किसी भी समाज और व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता है। मातृ स्वास्थ्य को लेकर बदली व्यवस्था ने जिंदगियाँ बचाई हैं और हजारों परिवारों में उम्मीद जगाई है। लेकिन मंजिल अभी बाकी है—अब लक्ष्य केवल सुधार नहीं, मातृ मृत्यु को शून्य तक ले जाना होना चाहिए। क्योंकि विकास की असली पहचान तब होगी, जब हर माँ सुरक्षित होगी और हर परिवार की खुशी अधूरी नहीं रहेगी।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
जब किसी माँ की जान बचती है, तो आँकड़े में एक संख्या घटती है, लेकिन किसी घर की पूरी दुनिया बच जाती है। 122 से 87 तक पहुँचा मातृ मृत्यु अनुपात इसी बदलाव का प्रमाण है। भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की सतत विकास लक्ष्य प्रगति रिपोर्ट 2026 के अनुसार, 2015-17 में प्रति लाख जीवित जन्म पर 122 माताओं की मृत्यु होती थी, जो 2022-24 में घटकर 87 रह गई। 35 की यह कमी महज गणित नहीं; यह हर एक लाख जीवित जन्म पर 35 माताओं के बचने का अर्थ है। देशभर में इससे हजारों परिवारों की दुनिया सुरक्षित हुई है। हर घटती संख्या के पीछे एक बची माँ की साँस, बच्चे की सलामत गोद और परिवार का सुरक्षित भविष्य है।
कभी प्रसव की राह में अस्पताल से पहले मजबूरियाँ खड़ी मिलती थीं। अस्पताल दूर, सड़क खराब, वाहन का भरोसा नहीं और पैसों की तंगी अलग संकट थी। अंधविश्वास और रूढ़ मान्यताएँ प्रसव को इलाज नहीं, किस्मत के भरोसे छोड़ देती थीं। कई बार घर ही प्रसव कक्ष बनता और जटिलता बढ़ने पर मदद देर से पहुँचती। अब तस्वीर बदल रही है। नियमित जाँच, आयरन की गोलियाँ, संस्थागत प्रसव और जरूरत पर एम्बुलेंस ने मातृत्व को सुरक्षित किया है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और सुरक्षित मातृत्व अभियान ने भी यह भरोसा मजबूत किया है कि माँ को बचाना सुविधा नहीं, व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
इस बदलाव की जड़ें उन गाँवों की मिट्टी में हैं, जहाँ इलाज की दूरी धीरे-धीरे घटकर लोगों की चौखट तक आ गई है। तपती दोपहर हो या स्याह रात, आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं तक पहुँचती हैं, जाँच के लिए प्रेरित करती हैं, खतरे के संकेत समझाती हैं और जरूरत पड़ने पर अस्पताल पहुँचाती हैं। आंगनवाड़ी केंद्र पोषण और जागरूकता की कड़ी बनते हैं। नर्सें प्रसव कक्ष में रात-दिन डटी रहती हैं, डॉक्टर सीमित साधनों में भी जीवन बचाने की जद्दोजहद करते हैं। इसलिए मातृ मृत्यु में कमी किसी एक विभाग की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन अनाम हाथों की साझा जीत है, जिन्होंने किसी माँ को मौत की देहरी तक पहुँचने से पहले थाम लिया।
मातृ मृत्यु का घटता आँकड़ा दरअसल समाज की बदलती दृष्टि की कहानी भी कहता है। गर्भवती को समय पर अस्पताल पहुँचाना केवल उपचार तक पहुँचना नहीं, उसके जीवन को महत्व देना है। शिक्षित महिला खतरे के संकेत पहचानती है, सक्षम परिवार इलाज टालता नहीं और जागरूक समाज अंधविश्वास के बजाय विज्ञान का साथ चुनता है। इसलिए मातृ मृत्यु अनुपात में गिरावट स्वास्थ्य क्षेत्र की उपलब्धि भर नहीं, सामाजिक चेतना के बदलते चेहरे का आईना भी है। महिला को सिर्फ संतान जन्म देने वाली देह न मानकर अधिकार, स्वास्थ्य और सम्मान से पूर्ण मनुष्य समझना ही इस परिवर्तन की असली नींव है।
संस्थागत प्रसव का 90 प्रतिशत से ऊपर पहुँचना इस बदलाव की गहराई को रेखांकित करता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के 2023-24 के आँकड़े इसकी स्पष्ट पुष्टि करते हैं। मातृ मृत्यु का घटता आँकड़ा सुकून देता है, मगर सवाल भी छोड़ जाता है—क्या 87 पर संतोष किया जा सकता है? 87 अब भी शून्य नहीं है। हर मातृ मृत्यु के पीछे एक घर की बुझी रोशनी, एक बच्चे की सूनी गोद और एक पति के कंधों पर अचानक बढ़ा जिम्मेदारियों का बोझ है। इसलिए 122 से 87 तक पहुँचना बड़ी उपलब्धि है, पर इसे मंजिल मान लेना भूल होगी। विकास केवल मृत्यु अनुपात घटने पर संतुष्ट हो जाना नहीं; विकास तब सार्थक होगा, जब प्रसव के दौरान किसी माँ की मृत्यु असामान्य और अस्वीकार्य मानी जाए—जीवन की अनिवार्य कीमत नहीं।
मातृत्व सुरक्षा की असली कसौटी वहीं सामने आती है, जहाँ सुविधा की आखिरी सीमा समाप्त हो जाती है। पहाड़ी इलाकों, दूर-दराज जिलों और गरीब बस्तियों में आज भी अस्पताल तक पहुँचना आसान नहीं है। कहीं एम्बुलेंस देर से आती है, कहीं रक्त बैंक में पर्याप्त रक्त नहीं मिलता और कहीं प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी जटिल स्थिति को और गंभीर बना देती है। प्रसव की आपात स्थिति में कुछ मिनट भी जीवन-मृत्यु का फैसला कर सकते हैं। इसलिए योजनाएँ बनाना भर पर्याप्त नहीं; उनका ईमानदार क्रियान्वयन, मजबूत रेफरल व्यवस्था, पर्याप्त रक्त, प्रशिक्षित स्टाफ और तेज आपात सेवाएँ जरूरी हैं। आखिरी गाँव तक स्वास्थ्य सुविधा पहुँचाए बिना मातृ मृत्यु को निर्णायक रूप से घटाना संभव नहीं होगा।
माँ को बचाने की जिम्मेदारी की पहली शर्त है—उसे अकेला न छोड़ना। गर्भावस्था और प्रसव को केवल महिला का दायित्व मानने वाली सोच बदलनी होगी। पति पत्नी की नियमित जाँच को उतनी ही गंभीरता से ले, जितनी किसी जरूरी पारिवारिक जरूरत को। सास बहू की कमजोरी को ‘सामान्य’ कहकर न टाले, डॉक्टर की सलाह माने। परिवार गर्भवती के पोषण, आराम और उपचार को खर्च नहीं, भविष्य में किया गया निवेश समझे। मातृत्व सुरक्षा तभी मजबूत होगी, जब समाज माने कि माँ को बचाने की जिम्मेदारी केवल माँ की नहीं—परिवार, समुदाय और शासन की भी है।
किसी देश की प्रगति का सबसे सच्चा प्रमाण तब मिलेगा, जब प्रसव के बाद हर माँ अपने नवजात को सीने से लगाए सकुशल घर लौटेगी। जीडीपी, ऊँची इमारतें, तकनीकी उपलब्धियाँ और आर्थिक विकास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जीवन बचाने से बड़ा विकास का कोई पैमाना नहीं। 122 से 87 की यात्रा उम्मीद जगाती है, पर जिम्मेदारी भी बढ़ाती है। यह उन माताओं को मौन श्रद्धांजलि है, जो लौट नहीं सकीं, और आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कर्मियों, नर्सों, डॉक्टरों व परिवारों को सलाम है, जिन्होंने अनगिनत जिंदगियाँ बचाईं। अब 87 को पड़ाव नहीं, शून्य की ओर अगली छलांग की शुरुआत मानना होगा। क्योंकि एक माँ बचती है तो साथ में बच्चे का भविष्य, परिवार की धुरी और आने वाली पीढ़ी की उम्मीद बचती है।



