कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे ने खोली सरकार की पोल

कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे ने खोली ‘विश्वस्तरीय सड़क’ के दावों की पोल? 25 दिन में धंसने लगी सड़क, PNC पर NHAI का शिकंजा; गडकरी से भी उठे बड़े सवाल! ₹4,200 करोड़ के एक्सप्रेसवे पर संकट! सड़क क्षतिग्रस्त होने के बाद टोल वसूली रोकी गई, निर्माण कंपनी पर कार्रवाई की तैयारी; लेकिन इसी बीच PNC को ₹3,483 करोड़ के दो नए हाईवे प्रोजेक्ट मिलने से सवाल और गहरे

लखनऊ/कानपुर। जिस कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे को आधुनिक और बेहतर कनेक्टिविटी की बड़ी परियोजना के तौर पर पेश किया गया था, उसके निर्माण की गुणवत्ता पर उद्घाटन के कुछ ही समय बाद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। करीब ₹4,200 करोड़ की लागत वाले इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 13 जुलाई 2026 को हुआ था, लेकिन कुछ ही हफ्तों में सड़क के कई हिस्सों में क्षति सामने आने लगी।

मामला इतना गंभीर हुआ कि NHAI ने टोल वसूली रोक दी और निर्माण कंपनी PNC Infratech के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। रिपोर्टों के मुताबिक कंपनी को ‘नॉन-परफॉर्मर’ घोषित किया गया है और भविष्य की बोलियों से रोकने/ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया भी सामने आई है।

25 दिन में सड़क पर सवाल, अब विशेषज्ञों की जांच

एक्सप्रेसवे के क्षतिग्रस्त हिस्सों की तकनीकी जांच की जा रही है। विशेषज्ञों की ओर से सड़क की गुणवत्ता, निर्माण तकनीक और मिट्टी की स्थिति जैसे पहलुओं की जांच की बात सामने आई है। NHAI ने भी निर्माण से जुड़े अधिकारियों और कंपनी के खिलाफ कार्रवाई का संकेत दिया है। यानी जिस सड़क को लंबे समय तक यातायात का भार उठाना था, उसके शुरुआती दिनों में ही सामने आई खराबियों ने निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे बड़ा सवाल—एक तरफ कार्रवाई, दूसरी तरफ ₹3,483 करोड़ के नए प्रोजेक्ट क्यों?

मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि जिस PNC Infratech के खिलाफ कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता को लेकर कार्रवाई की खबरें सामने आईं, उसी कंपनी ने जुलाई में NHAI के साथ ₹3,483 करोड़ के दो हाईवे प्रोजेक्टों के लिए समझौते किए।

कंपनी के अनुसार पहला प्रोजेक्ट बाराबंकी-मुस्तफाबाद चार-लेन हाईवे का है, जिसकी लागत ₹1,728 करोड़ है, जबकि दूसरा मुस्तफाबाद-बिसवां/बिस्वरिया मार्ग का है, जिसकी लागत ₹1,755 करोड़ बताई गई है। दोनों समझौते 16 जुलाई 2026 को हुए।

कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस-वे के लोकार्पण के समय किए गए वादे खस्ताहाल सड़क की तरह खोखले साबित हो रहे हैं। लोकार्पण के 25 दिन शुक्रवार को भी सड़क सात जगह पर 108 मीटर धंस गई। एनएचएआई के नए प्रोजेक्ट डायरेक्टर (पीडी) नवरतन कुमार ने ग्रीन फील्ड क्षेत्र के 45 किलोमीटर हिस्से का निरीक्षण किया।
वहीं, एनआईटी की टीम ने 18 अलग-अलग स्थानों से सड़क, मिट्टी और कंक्रीट के सैंपल लिए। दूसरे दिन भी एक्सप्रेसवे पर भारी वाहनों का संचालन पूरी तरह बंद रहा। 4200 करोड़ रुपये से बने 63 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे का 13 जुलाई को लोकार्पण हुआ था।
24 घंटे के अंदर यहां यहां धंसी सड़क
• किलोमीटर संख्या 64.4 पर दस मीटर सड़क धंसी।
• किलोमीटर संख्या 65.1 पर 15 मीटर सड़क धंसी।
• किलोमीटर संख्या 46.8 से 47 के बीच मंगतखेड़ा के पास 15 मीटर सड़क धंसी।
• कांथा गांव के पास किलोमीटर संख्या 39.7 पर 50 मीटर सड़क धंसी।
• बेगमखेड़ा के पास किलोमीटर संख्या 30.7 पर 10 मीटर सड़क धंसी।
• सहरावां के पास किमी संख्या 31 पर आठ मीटर सड़क धंसी।
• करौंदी गांव के पास किलोमीटर संख्या 68.8 20 मीटर पैचवर्क उखड़ा।
तकनीकी जानकारों का साफ कहना है कि देखते रहिए सड़क की मरम्मत (पीसी) इसी तरह साल भर भी चलती रहेगी तभी भी समस्या रहेगी। पीएनसी के पूर्व इंजीनियर रवींद्र कुमार का कहना है कि एक्सप्रेसवे के ग्रीनफील्ड एरिया का डिजाइन ही गलत है। शुरुआत में ठेकेदार ने आपत्ति लगाई थी, तब एनएचएआई ने कहा कि नई डिजाइन है ठीक है, अमेरिकन डिजाइन है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है—

जब एक तरफ निर्माण गुणवत्ता को लेकर कंपनी पर कार्रवाई की जा रही थी, तो दूसरी तरफ उसी कंपनी को नए हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट कैसे और किन मानकों के आधार पर मिले?

यह सवाल जांच का विषय है और इसका जवाब NHAI तथा संबंधित मंत्रालय से सार्वजनिक रूप से मिलना चाहिए।

2024 का रिश्वत मामला भी फिर चर्चा में

PNC Infratech का नाम 2024 में सामने आए एक ₹10 लाख रिश्वत मामले में भी आया था। CBI ने उस मामले में NHAI के एक जनरल मैनेजर-कम-प्रोजेक्ट डायरेक्टर को कथित तौर पर रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। जांच में PNC से जुड़े लोगों पर भी रिश्वत देने के आरोप लगाए गए थे।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी जांच या आरोप का सामने आना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है। लेकिन जब पुराना मामला, नया ठेका और एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता संबंधी कार्रवाई एक साथ चर्चा में हों, तो पारदर्शिता की मांग स्वाभाविक रूप से उठती है।

सड़क से शराब और एथेनॉल तक—गडकरी परिवार को लेकर पुराने सवाल फिर क्यों?

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को लेकर राजनीतिक बहस अब सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है। उनके परिवार से जुड़े कारोबारी हितों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

गडकरी के बेटों से जुड़ी कंपनियों के एथेनॉल और शराब कारोबार में होने की बात सार्वजनिक रिपोर्टों में दर्ज है। 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक Manas Agro और CIAN Agro से जुड़े कारोबार में एथेनॉल के साथ रम और व्हिस्की ब्रांड भी लॉन्च किए गए थे। उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि कंपनियां गडकरी के बेटों द्वारा संचालित थीं और गडकरी स्वयं इनके रोजमर्रा के कारोबार में शामिल नहीं थे।

इसी वजह से E20 और एथेनॉल ब्लेंडिंग की सरकारी नीति को लेकर हितों के टकराव (conflict of interest) का राजनीतिक सवाल उठता रहा है। हालांकि गडकरी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि एथेनॉल उनके बेटों के कारोबार का छोटा हिस्सा है और उनकी सरकार की नीति का उद्देश्य तेल आयात और प्रदूषण कम करना है।

माइलेज का सवाल भी बड़ा है

E20 पेट्रोल को लेकर गडकरी ने स्वयं माना है कि एथेनॉल के कारण माइलेज में कुछ कमी हो सकती है, हालांकि उन्होंने इसे सीमित बताया।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एथेनॉल नीति सही है या गलत, बल्कि यह होना चाहिए कि—

क्या नीति बनाते समय उससे जुड़े संभावित निजी कारोबारी हितों की पर्याप्त पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित की गई है?

गडकरी की बेटी की शादी और ‘स्कैनिया बस’ विवाद भी याद आया

2016 में गडकरी की बेटी की शादी में बड़ी संख्या में राजनीतिक और कारोबारी हस्तियों की मौजूदगी की खबरें आई थीं। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार शादी में कई केंद्रीय मंत्री और प्रमुख राजनीतिक नेता शामिल हुए थे।

इसी शादी के दौरान Scania की एक लग्जरी बस से जुड़ा विवाद भी बाद में सामने आया था। हालांकि इस मामले में गडकरी की ओर से किसी गलत काम से संबंध से इनकार किया गया था। इसलिए इसे भ्रष्टाचार का प्रमाण बताने के बजाय एक पुराना विवाद कहना ही तथ्यात्मक रूप से उचित है।

अब असली सवाल जनता का है

कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की कहानी सिर्फ एक सड़क के धंसने की कहानी नहीं है।

यह सवाल है—

₹4,200 करोड़ की परियोजना में गुणवत्ता की निगरानी कैसे हुई?

उद्घाटन के कुछ ही समय बाद सड़क क्षतिग्रस्त क्यों हुई?

जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

क्या दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर वास्तव में कार्रवाई होगी?

और सबसे महत्वपूर्ण—जब एक कंपनी के काम पर सवाल उठ रहे थे, उसी समय उसे ₹3,483 करोड़ के नए प्रोजेक्ट मिलने की प्रक्रिया में कौन-कौन से गुणवत्ता और पात्रता मानदंड लागू किए गए?

इन सवालों के जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि NHAI की जांच, तकनीकी रिपोर्ट और सार्वजनिक दस्तावेजों से मिलने चाहिए।

क्योंकि सड़क जनता के पैसे से बनती है—और उसकी कीमत सिर्फ टोल में नहीं, बल्कि हर उस परिवार को चुकानी पड़ती है जो उस सड़क पर अपनी जान और वाहन लेकर चलता है।

अब देखना यह है कि कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की जांच सिर्फ सड़क की मरम्मत तक सीमित रहती है या फिर निर्माण, डिजाइन, निगरानी और ठेका प्रक्रिया की पूरी जवाबदेही भी तय होती है।

निष्पक्ष दस्तक का सवाल साफ है—सड़क धंसी है तो सिर्फ सड़क क्यों खोदी जा रही है, जवाबदेही की परतें कब खुलेंगी?

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