तीन राज्यों के उपचुनाव नतीजों ने भाजपा को दिया बड़ा राजनीतिक संदेश

अजय कुमार
अजय कुमार

तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों के नतीजे आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। बिहार की बांकीपुर सीट पर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा के नीरज कुमार को 19,324 वोटों के बड़े अंतर से हराकर 64,151 वोट हासिल किए। भाजपा उम्मीदवार को 44,827 वोट मिले जबकि राजद की रेखा कुमारी महज 14,273 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर सिमट गईं। यह जीत सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि 1995 से लगातार भाजपा के कब्जे वाली सीट का पतन है। नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा ने परिवार के बाहर उम्मीदवार उतारकर जो जोखिम लिया, वह भारी पड़ गया।

बांकीपुर में मतदान प्रतिशत 34.30 फीसदी रहा, जो पिछले विधानसभा चुनाव के 41.45 फीसदी से सात अंक कम है। करीब 3.8 लाख मतदाताओं में से बहुत कम लोग वोट डालने पहुंचे। फिर भी जो पहुंचे, उन्होंने साफ संदेश दिया। प्रशांत किशोर ने इसे विधायक चुनने का चुनाव नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तक संदेश पहुंचाने वाला जनमत संग्रह बताया। उन्होंने कहा कि जनता ने सम्राट चौधरी की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ अपनी राय रखी है। जीत के बाद उन्होंने साफ कहा कि बिहार को जंगलराज से मुक्ति दिलाने का वादा करने वाली पार्टी ने उसी दौर के चेहरे को मुख्यमंत्री बना दिया, जिसे लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे।

यह हार भाजपा के लिए इसलिए भी चुभने वाली है क्योंकि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला उपचुनाव था। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद एनडीए का सामाजिक संतुलन बिगड़ गया था। अति पिछड़ा और महिला मतदाताओं के बीच नीतीश का जनाधार हमेशा मजबूत रहा। सम्राट चौधरी की स्वीकार्यता बांकीपुर जैसे शहरी, प्रबुद्ध और मध्यमवर्गीय इलाके में उतनी नहीं बन पाई। भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने कानून व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े किए। सवर्ण और शहरी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा नाराज हो गया। नीट पेपर लीक और उच्च शिक्षण संस्थानों के नियमों को लेकर युवाओं में आक्रोश भी चुनावी माहौल में घुला। भाजपा ने उम्मीदवार भी बदला। पहले अमित कुमार उर्फ बंटी को टिकट दिया, फिर परिवारिक कारणों से उन्होंने नाम वापस ले लिया और नीरज कुमार को उतारा। यह फेरबदल भी पार्टी के लिए घातक साबित हुआ।

मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भी भाजपा को झटका लगा। कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 66,757 वोट हासिल कर भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया। आशुतोष को 60,741 वोट मिले। यह सीट कांग्रेस के राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म होने के बाद खाली हुई थी। भारती को बैंक धोखाधड़ी मामले में तीन साल की सजा हुई थी। 2023 में भारती ने नरोत्तम मिश्रा को सात हजार से ज्यादा वोटों से हराया था। इस बार भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया। मिश्रा तीन बार जीत चुके थे। उनकी नाराजगी और स्थानीय संगठन की सुस्ती ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। मुख्यमंत्री मोहन यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बड़े नेताओं के प्रचार के बावजूद नतीजा नहीं बदला। दतिया में मतदान 71.44 फीसदी रहा, जो बांकीपुर से कहीं ज्यादा था। कांग्रेस ने अपनी सीट बचाई और भाजपा को सत्ताधारी होने के बावजूद हार का स्वाद चखना पड़ा।

गुजरात की मांजलपुर सीट पर भाजपा ने राहत की सांस ली। सतेंद्रभाई पटेल ने कांग्रेस के भीखाभाई रबारी को करीब 30,500 वोटों से हराया। पटेल को 55,481 वोट मिले जबकि रबारी को 24,851। लेकिन जीत का अंतर पहले के मुकाबले काफी कम रहा। 2022 में भाजपा ने लगभग एक लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। मतदान प्रतिशत 37 फीसदी के आसपास रहा। योगेश पटेल की मौत के बाद हुई इस उपचुनाव में भाजपा ने सीट तो बचा ली लेकिन विपक्ष की बढ़त साफ दिखी।उपचुनाव हमेशा बड़ी लहर का संकेत नहीं होते। 2018 में उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर भाजपा हारी थी।

योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य की सीटें थीं। समाजवादी पार्टी ने इसे बड़ी जीत बताई लेकिन 2019 लोकसभा और 2022 विधानसभा में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की। महाराष्ट्र के कस्बा पेठ में 2023 में भाजपा हारी लेकिन 2024 विधानसभा में एनडीए ने 232 सीटें जीतकर वापसी की। बिहार में भी 1994 में लवली आनंद की वैशाली उपचुनाव जीत के बाद मुख्यमंत्री बनने का दावा किया गया था लेकिन बाद में पार्टी विलय करना पड़ा। बांकीपुर में भी वोटिंग प्रतिशत कम रहा। ऐसे में इसे सीधे पूरे राज्य या केंद्र की राजनीति से जोड़ना जल्दबाजी होगी।

फिर भी बांकीपुर का नतीजा अलग है। प्रशांत किशोर की जन सुराज 2025 विधानसभा चुनाव में 238 उम्मीदवार उतारकर बुरी तरह हारी थी। ज्यादातर की जमानत जब्त हो गई थी। अब पहली जीत भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ में हुई है। उन्होंने राजद को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। तेजस्वी यादव के लिए भी यह चिंता का विषय है। राजद प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने प्रशांत किशोर को कौवे की मिसाल देकर नसीहत दी कि डाल टूटने से पेड़ नहीं गिरता। लेकिन वोट ट्रांसफर के संकेत साफ हैं। शहरी मतदाता भाजपा और राजद दोनों के पुराने ढर्रे से ऊब चुके थे।

प्रशांत किशोर ने तीसरा विकल्प पेश किया। उन्होंने कहा कि ज्यादातर वोट भाजपा के पारंपरिक समर्थकों के थे जिन्होंने अहंकार के खिलाफ मतदान किया।भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग का जादू भी इस बार कमजोर पड़ा। गैर यादव ओबीसी, अति पिछड़ा और सवर्ण वोट बैंक का गठजोड़ हमेशा काम आता रहा लेकिन बांकीपुर में युवा और मध्यम वर्ग की नाराजगी भारी पड़ी। कोर वोट बैंक का एक हिस्सा उत्साहपूर्वक मतदान केंद्र नहीं पहुंचा। रविशंकर प्रसाद के कथित बयान को लेकर भी नैरेटिव बना। प्रशांत किशोर ने इसे स्वाभिमान से जोड़कर माहौल बना लिया। भाजपा समय रहते इसे बेअसर नहीं कर पाई।

अब सवाल यह है कि यह झटका स्थायी है या अस्थायी। प्रशांत किशोर ने कहा कि वे विपक्ष का चेहरा नहीं बल्कि बिहार के भविष्य की बात करने वालों का चेहरा बनेंगे। उन्होंने घूसखोरी खत्म करने, सरकारी स्कूल सुधारने और क्षेत्र के विकास का ब्लूप्रिंट तैयार करने का वादा किया। सम्राट चौधरी ने उन्हें बधाई दी और जनता के फैसले का सम्मान किया। गिरिराज सिंह ने विपक्ष को ज्यादा खुश न होने की सलाह दी और 2009 के उदाहरण दिए जब उपचुनाव में हार के बाद भी बड़ा चुनाव जीता गया।तीनों नतीजे एक साथ देखें तो साफ है कि अब चुनाव सिर्फ पुराने वोट बैंक या बड़े नेताओं की रैलियों से नहीं जीते जा सकते। उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय मुद्दे, संगठन की एकजुटता और जमीनी काम ज्यादा मायने रखते हैं।

बांकीपुर में प्रशांत किशोर की पदयात्राएं, बूथ प्रबंधन और युवाओं के बीच पैठ ने जीत की पटकथा लिखी। भाजपा के फैसलों ने भी उनका रास्ता आसान किया। दतिया में उम्मीदवार चयन की गलती और गुजरात में कम होता अंतर यही बताते हैं कि चुनौतियां बढ़ रही हैं।आचार्य चाणक्य कहते थे कि राजनीति में एक पराजय कई विजयों से ज्यादा शिक्षा देती है। बांकीपुर की हार भाजपा के लिए आत्ममंथन का मौका है। सोशल इंजीनियरिंग के अलावा नेतृत्व, संगठन और संदेश तीनों स्तरों पर नए समीकरण बनाने होंगे। प्रशांत किशोर की यह पहली चुनावी जीत बिहार की राजनीति में तीसरी ताकत खड़ी करने का संकेत है या सिर्फ एक स्थानीय नतीजा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन फिलहाल तीन दशक पुराना किला ढह चुका है और संदेश साफ है।

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