पश्चिम एशिया में फिर युद्ध का खतरा; क्या दुनिया एक और महाविनाश की ओर बढ़ रही है?पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने एक बार फिर वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। लगातार बढ़ते संघर्ष, कूटनीतिक टकराव और महाशक्तियों की सक्रियता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या दुनिया एक और बड़े युद्ध की दहलीज पर खड़ी है, या फिर समय रहते शांति की राह निकलेगी?
सौरभ वार्ष्णेय
पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां एक छोटी-सी चिंगारी पूरे क्षेत्र को भीषण युद्ध की आग में झोंक सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ता तनाव केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शांति, ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। यदि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष शुरू होता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया इसकी कीमत चुकाएगी।
हाल के दिनों में अमेरिका की ओर से दिए गए कड़े संकेत और ईरान की आक्रामक चेतावनियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि यदि आवश्यक हुआ तो अमेरिका ईरान के ऊर्जा प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर कार्रवाई कर सकता है। वहीं ईरान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि उसके रणनीतिक ठिकानों पर हमला हुआ तो उसकी प्रतिक्रिया केवल अपने भूभाग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों और इजरायल को भी इसका सामना करना पड़ सकता है।
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युद्ध की भाषा हमेशा विनाश की प्रस्तावना होती है। इतिहास बताता है कि जब राष्ट्र संवाद की बजाय सैन्य शक्ति पर भरोसा करने लगते हैं तो परिणाम केवल तबाही होता है। अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रहा है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और ऊर्जा उत्पादन के उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है।परमाणु कार्यक्रम पर अविश्वास ने दोनों देशों के संबंधों को लगातार खराब किया है। आर्थिक प्रतिबंध, तेल निर्यात पर रोक, वित्तीय प्रतिबंध और सैन्य दबाव ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। अब यदि यह विवाद खुले युद्ध में बदलता है तो उसके परिणाम केवल सैन्य नहीं बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और मानवीय भी होंगे।आधुनिक युद्धों में केवल सैनिकों पर हमला नहीं किया जाता बल्कि विरोधी देश की आर्थिक रीढ़ को कमजोर करने का प्रयास किया जाता है।
ऊर्जा प्रतिष्ठान किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार होते हैं। तेल रिफाइनरी, गैस संयंत्र, बिजलीघर और पाइपलाइन किसी राष्ट्र की जीवनरेखा हैं। यदि इन पर हमला होता है तो केवल ऊर्जा उत्पादन ही प्रभावित नहीं होता बल्कि उद्योग, परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएं, संचार व्यवस्था और आम नागरिकों का जीवन भी संकट में पड़ जाता है।ईरान दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में उसके ऊर्जा ढांचे पर किसी भी प्रकार का हमला वैश्विक तेल बाजार को तुरंत प्रभावित कर सकता है।
दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे संवेदनशील बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य माना जाता है। विश्व के समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।यदि युद्ध की स्थिति में यह मार्ग बाधित होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इसका सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं।पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, विमान ईंधन और बिजली उत्पादन की लागत बढऩे से महंगाई तेज होगी। परिवहन से लेकर खाद्य पदार्थों तक हर क्षेत्र प्रभावित होगा। भारत के पश्चिम एशिया के लगभग सभी देशों के साथ अच्छे संबंध हैं। लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं और भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है।
भारत पहले भी पश्चिम एशिया के संकटों के दौरान अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए बड़े अभियान चला चुका है। इसलिए किसी भी नए संघर्ष की स्थिति में भारत को कूटनीतिक और मानवीय दोनों स्तरों पर तैयार रहना होगा। ईरान ने संकेत दिए हैं कि यदि उस पर हमला होता है तो वह केवल अपने क्षेत्र की रक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम एशिया में अमेरिका के अनेक सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। कतर, बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, जॉर्डन और अन्य क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति लंबे समय से बनी हुई है। यदि इन ठिकानों पर हमले होते हैं तो संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कई देश अनचाहे रूप से इसमें शामिल हो सकते हैं। यही किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष को वैश्विक संकट में बदलने का सबसे बड़ा कारण बनता है।
इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से गहरा तनाव रहा है। दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष और परोक्ष टकराव समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यदि अमेरिका किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है तो इजरायल की सुरक्षा स्वत: एक बड़ा मुद्दा बन जाएगी। दूसरी ओर ईरान पहले भी संकेत देता रहा है कि वह इजरायल को अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। ऐसी स्थिति में पूरा पश्चिम एशिया कई मोर्चों वाले युद्ध का मैदान बन सकता है।तनाव के बीच यह चर्चा भी तेज है कि रूस ईरान को विभिन्न प्रकार की तकनीकी या खुफिया सहायता उपलब्ध करा सकता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रियाएं भी सीमित रही हैं। फिर भी यदि बड़ी शक्तियां प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी संघर्ष में शामिल होती हैं तो क्षेत्रीय युद्ध का दायरा और व्यापक हो सकता है।
आज की दुनिया पहले जैसी नहीं रही। किसी भी क्षेत्रीय युद्ध का प्रभाव वैश्विक राजनीति, व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। युद्ध कभी अचानक नहीं होता। उसके पहले वर्षों तक अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप, आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य तैयारियां और असफल वार्ताएं चलती रहती हैं।दुर्भाग्य यह है कि आज वैश्विक कूटनीति पहले की तुलना में अधिक कमजोर दिखाई देती है। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं लगातार अपील तो करती हैं, लेकिन महाशक्तियों के सामने उनकी प्रभावशीलता सीमित नजर आती है। यदि संवाद की प्रक्रिया मजबूत नहीं होगी तो सैन्य विकल्प हमेशा अधिक आकर्षक प्रतीत होने लगेंगे। युद्ध का निर्णय नेता लेते हैं लेकिन उसकी कीमत आम नागरिक चुकाते हैं।बम सैनिक अड्डों पर ही नहीं गिरते, वे अस्पतालों, स्कूलों, घरों और बाजारों को भी प्रभावित करते हैं। लाखों लोग विस्थापित होते हैं, बच्चों की शिक्षा रुक जाती है, स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा जाती हैं और वर्षों तक समाज अस्थिर रहता है।इराक, सीरिया, यमन और अफगानिस्तान इसके बड़े उदाहरण हैं, जहां युद्ध समाप्त होने के बाद भी सामान्य जीवन लौटने में वर्षों लग गए।
इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि सैन्य जीत हमेशा राजनीतिक समाधान नहीं बनती। अफगानिस्तान, इराक, लीबिया और सीरिया के उदाहरण बताते हैं कि युद्ध शुरू करना अपेक्षाकृत आसान होता है लेकिन शांति स्थापित करना बेहद कठिन।यदि उद्देश्य केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन रह जाए और राजनीतिक समाधान पीछे छूट जाए तो संघर्ष वर्षों तक चलता रहता है।भारत परंपरागत रूप से रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलित विदेश नीति का समर्थक रहा है।भारत के अमेरिका से भी मजबूत संबंध हैं और ईरान के साथ भी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा ऊर्जा संबंध महत्वपूर्ण रहे हैं।
ऐसी स्थिति में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए शांति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में प्रभावी भूमिका निभाए।संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ही इसलिए हुई थी कि विश्व युद्ध जैसी त्रासदियां दोबारा न हों। आज आवश्यकता है कि संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद, यूरोपीय संघ, अरब लीग और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंच सक्रिय होकर दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने की दिशा में ठोस पहल करें। यदि कूटनीति विफल होती रही तो दुनिया बार-बार युद्ध के मुहाने पर खड़ी दिखाई देगी।
अमेरिका और ईरान दोनों शक्तिशाली राष्ट्र हैं। दोनों के पास सैन्य क्षमता है, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी है। विश्व नेतृत्व का अर्थ केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं बल्कि संयम भी होता है।यदि दोनों देश वार्ता की मेज पर लौटते हैं तो न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया राहत की सांस लेगी।पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव केवल दो देशों का विवाद नहीं है; यह पूरी मानवता की चिंता का विषय है। ऊर्जा संकट, वैश्विक व्यापार, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और करोड़ों लोगों का भविष्य इस संघर्ष से प्रभावित हो सकता है। किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले यह याद रखना होगा कि युद्ध का अंत चाहे जिस रूप में हो, उसकी शुरुआत हमेशा मानवता की हार से होती है।
दुनिया पहले ही अनेक संकटों से जूझ रही है। ऐसे समय में एक और व्यापक युद्ध किसी के हित में नहीं होगा। आज आवश्यकता शक्ति प्रदर्शन की नहीं, बल्कि धैर्य, संवाद, विश्वास और कूटनीतिक समाधान की है। यदि विश्व समुदाय समय रहते सक्रिय नहीं हुआ तो पश्चिम एशिया की यह आग सीमाओं को पार कर वैश्विक संकट का रूप ले सकती है। इतिहास गवाह है कि युद्ध जीतने वाले भी अंतत: शांति की तलाश में ही लौटते हैं। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि शांति का रास्ता युद्ध शुरू होने से पहले ही खोज लिया जाए।



