बचपन की मुस्कान

घर-आँगन में गूँजती, बच्चों की किलकार।
हँसी-खुशी के संग सजे, जीवन का संसार॥

गेंद, खिलौने, साइकिलें, सपनों की उड़ान।
छोटे-छोटे खेल में, छिपा बड़ा सम्मान॥

रिंग फेंकते हर्ष से, सीखें लक्ष्य-निशान।
हार-जीत से बढ़ रहा, उनका दृढ़ अभियान॥

संग-संग बैठें मित्र सब, भूलें हर तकरार।
बचपन की इस दोस्ती, जैसा नहीं उपहार॥

छोटी-सी मोटर चली, लेकर मधुर उमंग।
हाथ थाम विश्वास का, खिल उठे सब रंग॥

नन्हे मन की चाह को, दीजै खुला गगन।
खेल-खेल में गढ़ रहा, अपना स्वर्णिम धन॥

मोबाइल से दूर रह, खेलें मिलकर आज।
यही बचपन की पूँजी, यही सच्चा समाज॥

—–डॉ. सत्यवान सौरभ

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