
सामान्य झूठ जब कब चलता ही रहता है, लेकिन इतिहास के तथ्यों को नकारते हुए महाझूठ बोलने की ताजी घटना काफी चर्चा में है। मौलाना जरजिस अंसारी ने झारखंड में एक कार्यक्रम में भगवान श्रीकृष्ण को पक्का मुसलमान बताया और उन्हें 5 वक्त का नमाजी भी बताया। इस टिप्पणी को लेकर एक एफआईआर लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में दर्ज हुई है। इस बयान में महाझूठ का सहारा लिया गया है। वीडियो वायरल होने से खबर सब तरफ फैल गई है। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। ठीक बात है इस टिप्पणी को गंभीरता से लेने की कोई आवश्यकता भी नहीं। इसी बहाने श्रीकृष्ण को पक्का मुसलमान बताने के दावों की तहकीकात व थोड़ी सी पड़ताल जरूरी है।
भारत में इस्लाम आठवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम के हमले के साथ आया। इस्लाम का उदय ही सातवीं शताब्दी में हुआ था। महाभारत युद्ध का काल कम से कम तीन हजार साल पुराना है। महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़ा गया था। युद्ध भूमि में कौरव और पाण्डव आमने सामने थे। श्रीकृष्ण इस युद्ध में पाण्डवों के पक्षधर होकर प्रकट हुए। उन्होंने युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। विषादग्रस्त अर्जुन को तत्वज्ञान, कर्मयोग और राष्ट्रधर्म की शिक्षा दी थी।
श्रीकृष्ण के समय इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था। मौलाना किस आधार पर उन्हें सच्चा नमाजी बता रहे हैं। इस्लाम की व्याख्या इस आलेख का विषय नहीं है। मौलाना के वक्तव्य से पता चलता है कि उन्होंने गीता का कम से कम एक श्लोक पढ़ा है और उसी को आधार बनाकर श्रीकृष्ण को पक्का मुसलमान बताने की कोशिश की है। इस्लाम की राजनीतिक आकांक्षाएं बड़ी हैं। धर्मांतरण कराकर अपनी संख्या बढ़ाना उनके यहां पवित्र माना जाता है। मौलाना ने इसी तर्ज पर श्रीकृष्ण को भी धर्मांतरित कर लिया है।
वे खुश हैं कि गीता दर्शन के वक्ता श्रीकृष्ण भी धर्मांतरित किए जा रहे हैं। हिन्दू अपने देवताओं के प्रति सजग आस्था रखते हैं। बहुत संभव है कि कोई और मौलवी श्रीराम और हनुमान को भी पक्का नमाजी बताने लगे। इस दृष्टि से मौलाना का वक्तव्य महत्वपूर्ण है। मौलाना ने अपनी बात के समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के दसवें श्लोक का हवाला देकर कहा है कि भगवान श्रीकृष्ण पांचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं। मूलभूत प्रश्न है कि जब इस्लाम था ही नहीं तब इबादत की बात कहाँ से आई।
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गीता में कई विचार हैं। भक्ति है। योग है। सन्यास है और प्रत्यक्ष भौतिकवाद भी है, लेकिन योगी की प्रतिष्ठा उल्लेखनीय है। श्रीकृष्ण योग साधना की प्रशंसा करते हुए साधना की विधि भी बताते हैं। मौलाना द्वारा इस्तेमाल किए गए छठवें अध्याय के दसवें श्लोक में श्रीकृष्ण योग की विधि बताते हैं। योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ।। (6.10) बताते हैं, “योगी को एकांत में रहकर स्वयं को एकाग्र करते हुए सतत आत्मवान होना चाहिए। उसे सभी इच्छाओं और संग्रही भाव से मुक्त रहना चाहिए।“ (वही 10) यहां योग विज्ञान की सुस्पष्ट झांकी है। मूल श्लोक का ‘सततम्‘ शब्द ध्यान देने योग्य है। योग अभ्यास निरंतर साधना से ही सफल होता है। यहां सततम् का अर्थ गहन निरंतरता है। इसी तरह ‘निराशी‘ का अर्थ हारा हुआ निराश व्यक्ति नहीं है।
वह योग के प्रति गहन आशा से परिपूर्ण लेकिन सांसारिक इच्छाओं के प्रति बोधपूर्वक निराशा है। आशा बहुमूल्य धारणा है। आशा में स्वयं के प्रति विश्वास होता है, अस्तित्व के प्रति भरोसा रहता है। ईश्वर या परमात्मा की आस्था वाले लोगों की आशा और भी बेहतर होती है, उन्हें परमात्मा पर विश्वास होता है। गीता में ज्ञान और विज्ञान दोनों का विश्लेषण है। विज्ञान अस्तित्व के गूढ़ नियमों की जानकारी देता है और ज्ञान स्वयं का बोध है। दोनों की सम्यक जानकारी और योग की साधना सांसारिक फलों के प्रति निराशी बनाती है और आत्मबोध के प्रति भरपूर आशा जगाती है। गीता का योग सहज है। सतत आत्मवान होना और निराशी भाव से युक्त होना इसकी सामान्य भूमिका है।
गीता का अधिकांश हिस्सा योग प्रधान है। यहाँ सूक्ष्म विश्लेषण वाला सांख्य दर्शन भी सांख्य योग है। भक्ति योग है। कर्मयोग भी है। योग परिपूर्ण विज्ञान है। विज्ञान का कोई पंथ, मत, मजहब नहीं होता। यहाँ भाव और बिना जाने विश्वास का कोई स्थान नहीं होता। दर्शन वैज्ञानिक निष्कर्षों का सहयोग लेता है। विज्ञान से आगे निकल जाता है। दर्शन वैज्ञानिक निष्कर्षों का सहयोग लेता है। विज्ञान जहाँ विश्रांत होता है, दर्शन वहीं से कुलांचे भरता है, अज्ञात में भी छलांग लगाता है। विज्ञान और दर्शन में दूरी बनी रहती है। आस्था और तर्क भी साथ-साथ नहीं चलते पर भारतीय द्रष्टा ऋषियों ने कमाल किया है। योग विज्ञान में विज्ञान और दर्शन गलबहियाँ डालते हैं, साथ-साथ चलते हैं। भारतीय योग अनुभूत दर्शन है और विज्ञान भी है। यह परिपूर्ण व्यवहार शास्त्र है। यहाँ अनुभव का विज्ञान है और अनुभूति का दर्शन है। यहाँ राग विराग और मायामोह के अवसर नहीं हैं। जानो, करो, देखो, समझो। योग प्रत्यक्ष दर्शन है।
योग आनंद का विज्ञान है। दुख और तनाव श्सम्पूर्ण विश्व की समस्या है। मनुष्य चित्त रहस्यपूर्ण संरचना है। यह द्रव्य नहीं है, वरना विज्ञान की पकड़ में आ जाता। यह मनुष्य शरीर का सूक्ष्मतम मगर अदृश्य हिस्सा है। मन ही सुख और दुख के अनुभव करता है। यूरोपीय दृष्टि में दुख का कारण आर्थिक अभाव है। भोग सुख है, ज्यादा भोग ज्यादा सुख हैं। भारतीय दर्शन में दुख का कारण अविद्याध्अज्ञान हैं। भोग सुख नहीं देते, ज्यादा भोग और ज्यादा लोभ देते हैं। लोभ में बाधा से क्रोध आता है। क्रोध बुद्धिनाशी है। बुद्धिनाश से स्मृिितक्षय होती है। मनुष्य तनावग्रस्त होता है। गीता सुख-दुख मुक्त जीवन दर्शन देती है। गीता का योग-दर्शन अनूठा है।
मौलाना को मलाल होगा कि इस्लामी इतिहास में श्रीकृष्ण जैसा नायक नहीं है। हो भी नहीं सकता था। देवता सभी सभ्यताओं में हैं, लेकिन ज्यादातर देवता उदास हैं। श्रीकृष्ण नाचते देवता हैं। युद्ध भूमि में जाते हैं, लेकिन युद्ध में हिस्सा नहीं लेते। मित्र अर्जुन का विषाद प्रसाद बनाते हैं।
भारत में योग की हजारों विधियां थीं। पतंजलि के योग सूत्रों में योग विज्ञान का दर्शन है। गीता में योग साधना के सभी आयामों पर प्रकाश डाला गया है। मौलाना को चाहिए कि वो गीता का पाठ करें और गीता का वास्तविक अर्थ समझने का प्रयास करें। गीता के अंतिम अध्याय में मानने या न मानने की छूट दी गई है। गीता (अध्याय 18) में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि, ”यह गुप्त और योग ज्ञान हमने तुझे विस्तार से बताया है। इस पर विचार करो और जो ठीक लगे वो करो।”



