जातीय राजनीति पर हरिश्चंद्र श्रीवास्तव का बड़ा हमला अपराध नहीं, जाति देखना लोकतंत्र के लिए घातक’।
त्रिनाथ शर्मा
लखनऊ। सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतक हरिश्चंद्र श्रीवास्तव ने एक प्रेसवार्ता के दौरान कहा कि प्रदेश और देश की राजनीति में बढ़ती जातीय सोच लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने समानता, न्याय और योग्यता आधारित व्यवस्था की कल्पना की थी, लेकिन आज राजनीति का बड़ा हिस्सा जातीय समीकरणों तक सिमट गया है। हरिश्चंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि यदि किसी अपराधी के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होती है और राजनीतिक दल उसे भी जातीय चश्मे से देखने लगते हैं, तो इससे न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। अपराध को अपराध की दृष्टि से देखने के बजाय उसे जातीय आधार पर प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।
उन्होंने कहा कि आज अधिकांश राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए जातीय समीकरणों को प्राथमिकता दे रहे हैं। उम्मीदवारों के चयन से लेकर संगठन और प्रशासनिक व्यवस्थाओं तक योग्यता, ईमानदारी, दूरदृष्टि और नैतिक मूल्यों की बजाय जातीय गणित हावी दिखाई देता है। इससे लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। उन्होंने चिंता जताई कि समाज में नैतिक मूल्यों का लगातार क्षरण हो रहा है। राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक जीवन में गुणवत्ता की जगह जातीय पहचान और आर्थिक प्रभाव बढ़ने से स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है। उनका कहना था कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
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प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि समाज को यह तय करना होगा कि डॉक्टर, शिक्षक, अधिवक्ता, सैनिक या वैज्ञानिक का चयन जाति के आधार पर नहीं बल्कि योग्यता और क्षमता के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और समाज के प्रबुद्ध वर्ग से जातीय राजनीति से ऊपर उठकर संविधान की समतामूलक भावना, नैतिक मूल्यों और सुशासन को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।



