दृष्टि बदलते ही खुला, जीवन का विस्तार। मन ही बाँधे देह को, मन ही दे उद्धार॥
तारे दूर नहीं कभी, दूरी अपनी दृष्टि। मन सीमाओं में बँधा, भूला नभ की सृष्टि॥
ब्रह्मांड देता हर घड़ी, परिवर्तन का सार— दृष्टि बदलते ही खुला, जीवन का विस्तार॥
दुख उतने गहरे नहीं, जितना मन का शोर। अपनी ही दीवार से, टकराए हर ठौर॥
जो बहना स्वीकार ले, उसका हो संसार। दृष्टि बदलते ही खुला, जीवन का विस्तार॥
पत्थर भी घिस-घिस बने,निर्मल कंकड़ रूप। अहं बचाने में लगे, टूटे पर्वत भूप ॥
सीख गए झुकना तभी, उसका हुआ उद्धार। दृष्टि बदलते ही खुला, जीवन का विस्तार॥
प्रेम न पूजा मात्र है, प्रेम नहीं उपदेश। प्रेम वही जो बाँट दे, अपना सुख-संदेश॥
अनंत कहीं बाहर नहीं, भीतर का आकार। दृष्टि बदलते ही खुला, जीवन का विस्तार॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ



