मजिस्ट्रेट को संपत्ति के कब्जे को प्रभावित करने का अधिकार नहीं-झारखंड हाईकोर्ट

सीआरपीसी की धारा 107 के तहत मजिस्ट्रेट को संपत्ति के कब्जे को प्रभावित करने का अधिकार नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

अजय सिंह

⚫झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सीआरपीसी की धारा 107 के तहत संपत्ति के कब्जे के वितरण को प्रभावी करना का मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं है।

जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने यह टिप्पणी की:

?”यदि व्यक्ति अपने अधिकार क्षेत्र में है या शांति या अशांति के संभावित उल्लंघन का स्थान उसके अधिकार क्षेत्र की स्थानीय सीमा के भीतर है तो सीआरपीसी की धारा 107 को देखते हुए यह स्पष्ट है कि मजिस्ट्रेट मामले में आगे कार्रवाई को बढ़ा सकता है।

?मजिस्ट्रेट सीआरपीसी की धारा 107 के तहत आदेश पारित कर सकता है, लेकिन मजिस्ट्रेट को किसी संपत्ति को किसी व्यकि के कब्ज़े में नहीं दे सकता। जैसा कि इस मामले में 09 मई 2017 के आदेश में किया गया जो धारा 107 की भावना के खिलाफ है।”

?याचिका सत्र न्यायाधीश के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए दायर की गई थी जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि याचिकाकर्ता उस कार्यवाही का पक्षकार नहीं था जिसके संबंध में पुनर्विचार आवेदन को प्राथमिकता दी गई थी।

?साथ ही 09 मई, 2017 के पारित आदेश को रद्द करने के लिए भी सीआरपीसी की धारा 107 के संदर्भ में स्थापित किया गया है, जिसके तहत सब डिविज़नल मजिस्ट्रेट, सदर, चाईबासा ने सर्किल अधिकारी को ओ.पी.सं.2 और 3 के पक्ष में संपत्ति के कब्जे के वितरण को प्रभावित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया।

?अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता विचाराधीन भूमि का मालिक है, क्योंकि उसने याचिका के अनुलग्नक-1 में निहित बिक्री विलेख दिनांक 31 अगस्त, 2015 के द्वारा विचाराधीन भूमि ओ.पी.सं.3 से खरीदी है। उन्होंने प्रस्तुत किया कि मजिस्ट्रेट के पास सीआरपीसी की धारा 107 के तहत एक आदेश पारित करने की शक्ति नहीं है जिसकेओ.पी. नंबर 2 को कब्जा दिया जा सके।

?इसके अलावा उन्होंने तर्क दिया कि अदालत को केवल यह देखने की आवश्यकता है कि यदि शांति भंग या कोई गड़बड़ी है तो वह केवल एक वर्ष के लिए बांड निष्पादित करने का आदेश दे सकती है।

?कोर्ट ने वकीलों को सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों को देखने के बाद कहा कि आक्षेपित आदेशके अनुसार मामला 22.9.2016 और अगले आदेश दिनांक 09 मई, 2017 द्वारा अन्य पक्षों की ओर से कारण बताओ फाइल करने के बिना दर्ज किया गया था। आदेश बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए पुन: बिना कारण बताओ विचार किए उक्त आदेश पारित कर दिया गया है।

?कोर्ट ने कहा कि यह आदेश क्षेत्राधिकार के बिना है और यदि कोई अवैधता चल रही है तो उक्त को आगे जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके अलावा यह देखा गया कि पुनर्विचार याचिका अदालत ने इस आधार पर खारिज कर दी कि याचिकाकर्ता याचिकाकर्ता कार्यवाही में पक्षकार नहीं है। याचिका के साथ संलग्न बिक्री विलेख से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने विचाराधीन भूमि खरीदी है।

कोर्ट ने कहा,

?”यह ओपी नंबर 2 पर याचिकाकर्ता को याचिकाकर्ता बनाने के लिए बाध्य है, याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति में आदेश पारित किया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि अगर इस तरह से अधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है तो याचिकाकर्ता उक्त आदेश को चुनौती देने का हकदार नहीं है।”

तदनुसार, सत्र न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया गया।

केस शीर्षक: सुखलाल बिरुली बनाम झारखंड राज्य और अन्य।

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