मिट्टी के दीए

आर्यावर्ती सरोज “आर्या”

तीन दिन पहले से ही वेदांती विला चाइनीज झालरों से सजाया जा रहा था। कुछ दिनों पहले ही विला की सफाई हुई थी दिपावली के लिए रंगाई-पुताई, पेंटिंग,साज सज्जा सारी तैयारियां चल रही थी। सफाई के दौरान कुछ पुराने खिलौने भी विला के मैनेजर ने टीनू को दिए। और साथ में पटाखे जलाने के लिए मुन्नू को सौ रुपए का एक नोट भी दिया।
दिपावली से एक दिन पहले दिपावली के लिए बाजार सजा था।तरह -तरह की मिठाइयों, मिट्टी के खिलौने, चाइनीज खिलौने, लक्ष्मी गणेश जी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों , से बाजार में रौनक के साथ काफी भीड़ थी।

बड़ी- बड़ी दुकानों के पास ही नीचे एक बूढ़ी औरत कुछ मिट्टी के दीए ,एक बोरा बिछाकर उस पर बैठ कर बेच रही थी। टीनू का मन कभी खिलौने पर ललचाता तो कभी मिठाईयों पर कभी मूर्तियों पर।हाथ में सौ रुपए लेकर कभी खोलता कभी मुट्ठी में भींच लेता ।बुढ़ी औरत कुछ अस्वस्थ भी लग रही थी। टीनू तेजी से उनकी तरफ बढ़ा और सौ का नोट निकाल कर बूढ़ी औरत की ओर बढ़ाते हुए कहा- “आजी ! ये मिट्टी के दीए मुझे दे, दो ।”


झुर्रियों से भरे उदास चेहरे पर एक मुस्कान खिल उठा ।
बूढ़ी औरत ने कहा – ” तुम्हें खिलौने और मिठाइयां नहीं लेनी?दीए चाहिए?”
“हां , आजी!”
“मुझे मिट्टी के दीए दे,दो।”
बूढ़ी औरत ने अखबार में लपेटकर दीए दे दिए।
टीनू खुशी से झूमता मस्ती में चला गया।मानो पूरा बाजार खरीद लिया हो उसने…।
उसे तो आभास भी नहीं था कि उसने बूढ़ी नेत्रहीन आंखों में ज्योति जला दिया है। वास्तविक दीपावली उसने मनाई है।


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