लाइफ स्टाइल

अच्छी लाइफ स्टाइल जीने के लिए जीवन में प्रतिदिन की दिनचर्या बनाना चाहिए। उससे यह मालूम रहेगा कि किस समय उसे अपने जीवन का कोन-सा काम करना है। उसे जीवन मे खुद का विकास करना चाहिए। जीवन में खुद का विकास करना भी बहुत जरूरी है। अगर व्यक्ति अपने जीवन में खुद का विकास नहीं करेगा तो अपना लाइफ स्टाइल कभी अच्छा नहीं कर पाएगा। मस्त जीवन जीने के लिए भी व्यक्ति का स्वस्थ रहना भी बहुत जरूरी है। क्योकि अगर व्यक्ति स्वस्थ नहीं रहेगा। तो उसका कितना भी अच्छा लाइफ क्यो न हो उसे बेकार ही लगेगा। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन में खुद का विकास करने ओर खुद को स्वस्थ रखने में अधिक ध्यान देना चाहिए।

संसार मे प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसकी लाइफ में सभी प्रकार की जरूरते पूरी हो। व्यक्ति की लाइफ तभी अच्छी होती है जब उसके खर्चे आसानी से पूरे होते है। तभी वह अपने जीवन में खुश रहता है। मस्त लाइफ संसार में कुछ ही लोगो की होती है। सब लोगो की लाइफ एक जैसी नहीं होती है। जो लोग सोचते है कि उनकी लाइफ स्टाइल अच्छी बन जाए। अच्छी लाइफ स्टाइल बनाने के लिए अच्छी मेहनत करती होती है। आज के समय में मनुष्य तनाव भरी ज़िंदगी जीता है। इसी तनाव की वजह से इंसान मानसिक और शारीरिक तौर पर बीमार हो जाता है पैसा कमाने की ललक इंसान को खुद के शरीर के प्रति लापरवाह हो जाता है। लापरवाही से पैसा तो कमा लेता है लेकिन लाइफ स्टाइल खो देता है।

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    शून्य से शिखर की यात्रा प्रधानमंत्री मोदी के जीवन का सार। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में पीएम मोदी पर…

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    गाय का अर्थशास्त्र

    पंकज गाँधी  अभी हाल ही में देश के प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट में बताया कि पीएम आवास में गाय के बछड़े का आगमन हुआ है. पोस्ट में उन्होंने उन्होंने लिखा कि,हमारे शास्त्रों में कहा गया है—– गाव: सर्वसुख प्रदा:, लोक कल्याण मार्ग पर प्रधानमंत्री आवास परिवार में एक नए सदस्य का शुभ आगमन हुआ है. प्रधानमंत्री आवास में प्रिय गौ माता ने एक नव वत्सा को जन्म दिया है जिसके मस्तक पर ज्योति का चिह्न है. इसलिए, मैंने इसका नाम ‘दीपज्योति’ रखा है.” उनके इस पोस्ट के बाद ही गाय पर विमर्श एक बार फिर शुरू हो गया. दीपज्योति दुर्लभ प्रजाति पुंगनुर नस्ल की गाय है जो आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में पायी जाती हैं जो छोटे कद की और बहुत सुंदर और मोहक होती हैं. ऐसी मान्यता है कि यह  दुनिया की सबसे छोटी कद की देसी गाय है. इस नस्ल की यह गायें अब विलुप्त होने के कगार पर हैं और अब इस नस्ल को बचाने की कोशिश हो रही है. पिछले कुछ सालों में इस गाय को पालने को लेकर लोगों में जागरूकता आई है. दक्षिण भारत में इसे पालना  अब स्टेट्स सिंबल बनता जा रहा है. कई नेता और बड़ी हस्तियां इस गाय को अपने घर में पाल रहे हैं. इस गाय को अच्छे भाग्य का प्रतीक भी माना जाता है. इसीलिए इन गायों की कीमत लाखों में है. प्रधानमन्त्री से पहले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी गाय को लेकर अपने प्रेम को जब तब जाहिर करते रहते हैं. अपने मठ के गौशाला में जैसे ही वह जाते हैं, गौशाला की गायें उन्हें घेर लेती हैं. गायों के प्रति इसी प्रेम और पृथ्वी पर  महत्ता को देखते हुए कुछ दिन पहले मथुरा में उन्होंने कहा था कि गांव, गाय और गंगा को बचाए बिना देश नहीं बच सकता। देखने में तो यह बड़ा ही साधारण सा पारम्परिक बयान लग रहा है लेकिन यह बयान विशुद्ध रूप से मानव जीवन की सच्चाई और मानव जीवन के नदी घाटी के सभ्यता की यात्रा का सार है. गंगा गाँव और गाय एक शब्द श्रृंखला नहीं है यह मानव की सामाजिक एवं पारिवारिक इन्सान बनने की एक श्रृंखला है इसीलिए इसे सिर्फ हिंदुत्व से जोड़ के देखना ठीक नहीं है.यह शब्द श्रृंखला एक सनातन जीवन पध्वति की तरफ इशारा करती है जिसने पृथ्वी पर मानव जीवन को एक सामाजिक प्राणी के रूप में स्थापित किया.आज का मानव समाज इस शब्द श्रृंखला में छुपे निहितार्थ का ऋणी है. जब हम वन मानुष से मानव बन रहे थे तो हम नदियाँ ढूंढ रहे थे. गंगा उस काल में उसी नदी का प्रतीक है, नदियों के किनारे बस्तियों का निर्माण होने लगा . नदी किनारे बस्तियां होने से जीवन यापन एवं परिवहन आसान होने लगे. पानी, खाने, नहाने आदि की कई सुविधाएँ थी जो बिना मूल्य मिलती थी. यही बस्तियां कालांतर में गाँव के रूप में परिभाषित हुई और लोग समूह में रहना और कृषि एवं पशुपालन करना शुरू किये. कृषि एवं पशुपालन के लिए जो सबसे उपयोगी जानवर इन्हें मिला , वह थी गाय. गाय सिर्फ इन्हें कृषि में ही सहायता नहीं करती थी यह इन्हें दूध भी देती थी, गोबर भी देती थी और कई मायनों में बहुपयोगी थी. यह मानव जीवन को स्थापित संतुलित एवं पारिवारिक एवं सामाजिक इकाई रूप में विस्तार के लिए एक आवश्यक अंग हो गई.सभ्यता के शुरुवाती काल में प्रकृति प्रदत्त चीजें ही जीवन का आधार होती थी, इसलिए जीवन में इसे सरंक्षित कर एवं ईश्वर  एवं धार्मिक त्योहारों से कृषि एवं गाय को जोड़कर इनके प्रयोग को नियमित किया गया. तत्कालीन समय में जीवन के प्रवाह के लिए जो जो चीजें आवश्यक थी उसे ईश्वर  एवं धार्मिक त्योहारों से जोड़ा गया, इसीलिए सूर्य चन्द्र भगवान हैं, नदियों को माँ का दर्जा दिया गया, गाय को माँ का दर्जा दिया गाय, गो मुख में ईश्वर का वास बताया गया ताकि मानव  ईश्वर  एवं धार्मिकता के कारण इसे सरंक्षित करे और जीवन में इसे धारण करे. गाय पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं के साथ स्थायी कृषि का एकमात्र आधार था। उस समय सोने की तुलना में गाय को अधिक माना जाता था और गौपालन तत्कालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य संसाधन बन गया था।प्रधानमंत्री जिस तरह गौपालन का सन्देश दे रहें हैं या मौजूदा सन्दर्भ में जिस सूत्र वाक्य के रूप में इसे योगी आदित्यनाथ ने बोला है उसे हलके में न लेते हुए उस पर मंथन होना चाहिए. भारत के सन्दर्भ में यह और भी प्रासंगिक हो जाता है क्यों कि हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में 70 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र ग्रामीण है। देश की आबादी का 60 प्रतिशत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करता है। इसलिए, कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस लिहाज से गाय भारत के लोगों के लिए एक संपत्ति है। गाय के गोबर का इस्तेमाल भारतीय किसानों के लिए ईंधन और उर्वरक के स्रोत के रूप में किया जाता है। यह सब आर्गेनिक और उच्च उपज देने वाली फसलों के उत्पादन में भी सहायक है। पौष्टिकता की बात करें तो भारतीय गाय का दूध सबसे पौष्टिक पाया जाता है। गाय, एक स्तनपायी होने के कारण उसे अपने बछड़ों के लिए जो दूध मिलता है वह  लोगों के कल्याण के लिए अपने दूध को हमारे साथ साझा करती है। आज हम दूध के कई रूप में प्रयोग करते हैं जैसे की दही, क्रीम, मक्खन, और कई सारे खाद्य पदार्थ बना सकते हैं। गाय के ए २ प्रकार के दूध में जो प्रोटीन होता है वह वैसा ही होता है जैसा माँ का दूध होता है इसलिए  गाय को मां या गौ माता की स्थिति समाज में दी गई है। जो लोग गाय पर या इस बयान पर इतना बहस कर रहें हैं दरअसल वह  जीवित गाय के अर्थशास्त्र को समझने में विफल रहते हैं। एक जीवित गाय एक मृत गाय की तुलना में अपने बहुमूल्य उत्पादों के मार्फ़त अपने बीफ के मूल्य की तुलना में 100 गुना अधिक पैसे कमा सकती है। सिर्फ एक गाय एक एकड़ जमीन को उपजाऊ कर सकती है। अगर कोई किसान उर्वरकों पर खर्च किए गए कुल धन का एक-तिहाई हिस्सा गाय पे खर्च दे तो वह उच्च उपज देने वाली फसलों का उत्पादन कर सकता है और यह गुणवत्ता और मात्रा के मामले में दोहरे उत्पाद मूल्य के बराबर हो सकता है। जो लोग न्यूट्रीशन वैल्यू के लिए हवाला देते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि  सोया में इससे ज्यादा न्यूट्रीशन वैल्यू है.ग्रामीण भारत में गायों का उपयोग, ऑर्गेनिक्स खेती को बढ़ावा देने,  रसायनों से छुटकारा पाने , पैसे बचाने,  किसानों की ख़ुशी, उनके बच्चो का पोषण ,  और बाजार में बेहतर उत्पादन मूल्य प्राप्त करने में सहायक हो सकता है। गोसंवर्धन के साथ साथ गोमूत्र, पंचगव्य और गाय के गोबर पर रिसर्च कर कीटनाशक व अन्य वस्तुएं बनाने की दिशा में काम किया जा सकता है। गाय को ऊर्जा के श्रोत के रूप में भी देखा जाना चाहिए क्यूँ की गाय से दूध, दही के साथ – साथ गैस का भी उत्पादन किया जा सकता है। गौ पालन के माध्यम से ऐसे सीमांत परिवारों को बढ़ावा देना होगा जिससे इसके बहुपयोगी होने के कारण वे इसका बहुआयामी लाभ उठा सकते हैं, कुपोषण से खुद एवं अपनी संतानों को बचा सकते है. गाय पर पुनः काम हो तो ग्रामीण भारत के अर्थव्यवस्था की यह पुनः मुख्य इकाई हो सकती है. गाय का अर्थशास्त्र

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    घर पर जेईई मेन 2025 की तैयारी कैसे करें । प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)। जेईई मेन की तैयारी के लिए प्रभावी अध्ययन…

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    खेल,एथलेटिक्स और शारीरिक फिटनेस में करियर के अवसर। भारत में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) सर्वोच्च निकाय है। जिसे युवा प्रतिभाओं…

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    डॉ. वेदप्रकाश       स्वतंत्रता के सात दशक बाद भारत भाव पुन: विचार बनता जा रहा है। इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र…

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    विजय गर्ग कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति अपनी राह पर चल रहा है। एक नन्ही चींटी उसके पैरों के नीचे…

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     उत्तम पालन-पोषण: अपेक्षाओं और आकांक्षाओं पर ध्यान देना। हमारे सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद माता-पिता अक्सर महसूस करते हैं कि वे…

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    ब्यूरो निष्पक्ष दस्तक लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन से सेवा पखवाड़ा प्रारम्भ करेगी। भाजपा सेवा पखवाड़ा…

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