
क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ब्राह्मण फैक्टर गेम चेंजर बनने जा रहा है? क्या समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के सबसे मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति तैयार कर ली है? और अगर ब्राह्मण वोटों का सिर्फ 5 प्रतिशत भी इधर-उधर हुआ, तो क्या 2027 का चुनाव पूरी तरह बदल सकता है?लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने जनेश्वर मिश्र की जयंती के अवसर पर एक बड़ा प्रबुद्ध सम्मेलन आयोजित किया। इस प्रबुद्ध सम्मेलन ने यूपी की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ एक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का है जो सीधे बीजेपी के कोर वोट बैंक तक पहुंचाने की कोशिश की गई।
ब्राह्मण क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
अब सवाल उठता है कि आखिर हर चुनाव में ब्राह्मण समाज इतना चर्चा में क्यों आ जाता है? कारण सिर्फ आबादी नहीं है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज की आबादी करीब 9 से 12 प्रतिशत मानी जाती है। पहली नजर में यह संख्या बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन राजनीति केवल आबादी से नहीं, बल्कि प्रभाव और भौगोलिक फैलाव से तय होती है। पूर्वांचल, अवध और मध्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ब्राह्मण मतदाता 15 से 20 प्रतिशत तक हैं। वाराणसी, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, प्रयागराज, कानपुर, बस्ती और महाराजगंज जैसे क्षेत्रों में इनका वोट किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार तय करने की क्षमता रखता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 60 से 80 और कुछ अनुमानों के अनुसार 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि चुनाव नजदीक आते ही लगभग हर राजनीतिक दल इस समाज को साधने की कोशिश करता है। लेकिन एक और कारण भी है। ब्राह्मण समाज को अक्सर “ओपिनियन मेकर” माना जाता है। यानी केवल वोट देने वाला समाज नहीं, बल्कि राजनीतिक माहौल बनाने वाला समाज। यही वजह है कि लगभग हर दल चुनाव से पहले इस वर्ग तक पहुंचने की कोशिश करता है।
सपा की नई रणनीति
लखनऊ में जनेश्वर मिश्र की जयंती पर समाजवादी पार्टी ने बड़ा प्रबुद्ध सम्मेलन आयोजित किया। हालांकि जनेश्वर मिश्र पार्क में अनुमति नहीं मिली, लेकिन पार्टी मुख्यालय में हुए इस कार्यक्रम के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई। अखिलेश यादव ने पहले जनेश्वर मिश्र की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और फिर मंच से कहा— “पीडीए में पी का मतलब सिर्फ पिछड़ा नहीं, पंडित भी है।” यही एक लाइन पूरे कार्यक्रम की सबसे बड़ी राजनीतिक हेडलाइन बन गई।
मंच पर माता प्रसाद पांडेय, सनातन पांडेय, प्रो.अभिषेक मिश्रा,पवन पांडेय जैसे ब्राह्मण नेताओं को प्रमुखता दी गई। काशी, अयोध्या और मथुरा से संतों और विद्वानों को बुलाया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यह संदेश देने की कोशिश हुई कि समाजवादी पार्टी अब खुद को केवल एक जाति आधारित दल के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक गठबंधन के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। इसी मंच से अयोध्या सदर सीट से पवन पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। अखिलेश यादव ने मंच से की अयोध्या से पवन पांडेय विधयक होने जा रहे है। इससे पहले अखिलेश यादव न कहा था की audesh प्रसाद अयोध्या के संसद होने जा रहे है बीजेपी लहर होने के बाउजूद audesh प्रसाद सांसद बने।
आंकड़े क्या कहते हैं?
अब जरा चुनावी आंकड़ों पर नजर डालते हैं। 2022 विधानसभा चुनाव में सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे के अनुसार लगभग 89 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं ने बीजेपी गठबंधन का समर्थन किया। वहीं समाजवादी पार्टी को केवल लगभग 6 प्रतिशत समर्थन मिला।
2017 में भी स्थिति लगभग ऐसी ही थी। बीजेपी ने उस चुनाव में 68 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे, जबकि सपा ने 40। 2017 में बीजेपी के 312 विधायकों में 58 ब्राह्मण विधायक थे। 2022 में यह संख्या घटकर 46 रह गई। यानी बीजेपी का प्रभाव अब भी मजबूत है, लेकिन कुछ संकेत ऐसे भी हैं जिन पर विपक्ष नजर बनाए हुए है।
इतिहास क्या बताता है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समाज का रुख कई बार सत्ता बदल चुका है। कांग्रेस के दौर में गोविंद बल्लभ पंत, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे। 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण बनाया। सतीश चंद्र मिश्र के नेतृत्व में ब्राह्मण सम्मेलन हुए और बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 1990 के दशक के बाद राम मंदिर आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में ब्राह्मण बीजेपी के साथ आए। अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं ने इस आधार को और मजबूत किया। 2014 के बाद बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और सवर्ण वोटों का बड़ा गठबंधन तैयार किया, जिसमें ब्राह्मण समाज महत्वपूर्ण स्तंभ रहा।
अखिलेश यादव द्वारा ‘PDA’ का दायरा बढ़ाकर उसमें ‘पंडित’ और ‘पीड़ित’ को शामिल करना सपा की सोशल इंजीनियरिंग में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
लेकिन इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अखिलेश यादव बार-बार ‘PDA’ की नई परिभाषा क्यों दे रहे हैं? क्या बदल गया है ‘PDA’ का मतलब? अब तक समाजवादी पार्टी PDA का मतलब बताती थी—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक।यानी वही सामाजिक गठबंधन, जिसने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को बड़ी सफलता दिलाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है।
लखनऊ के प्रबुद्ध सम्मेलन में अखिलेश यादव ने कहा कि PDA में ‘P’ का मतलब सिर्फ ‘पिछड़ा’ नहीं, बल्कि ‘पंडित’ और ‘पीड़ित’ भी है। यानी समाजवादी पार्टी पहली बार खुलकर यह संदेश दे रही है कि उसका राजनीतिक गठबंधन केवल जातीय आधार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन सभी वर्गों तक पहुंचेगा जो खुद को उपेक्षित या असंतुष्ट महसूस करते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि सपा की सोशल इंजीनियरिंग का नया अध्याय है। इस रणनीति के जरिए पार्टी दो बड़े संदेश देना चाहती है।
पहला, ब्राह्मण समाज को यह भरोसा दिलाना कि समाजवादी पार्टी में उनके लिए भी सम्मान और राजनीतिक भागीदारी की जगह है।—दूसरा, ‘पीड़ित’ शब्द जोड़कर उन युवाओं, कर्मचारियों, प्रतियोगी छात्रों और अन्य वर्गों तक पहुंचने की कोशिश करना, जो बेरोजगारी, पेपर लीक, संविदा भर्ती, महंगाई या अन्य मुद्दों पर असंतोष जताते रहे हैं।
यानी अब PDA केवल एक जातीय समीकरण नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक संदेश बनने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी राजनीतिक नारे का चुनावी असर अंततः मतदाताओं के व्यवहार पर निर्भर करता है। यह देखना बाकी है कि यह नई व्याख्या कितनी स्वीकार्यता हासिल करती है और क्या यह वास्तव में वोटों में बदल पाती है। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की यह नई रणनीति उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है।
क्या बीजेपी को चिंता करनी चाहिए?
समाजवादी पार्टी मानती है कि अगर ब्राह्मण समाज का सिर्फ पांच प्रतिशत वोट भी बीजेपी से दूर हुआ तो कई सीटों पर मुकाबला बदल सकता है। इसी वजह से अखिलेश यादव लगातार ब्राह्मण नेताओं को आगे बढ़ा रहे हैं। माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाना, हरिशंकर तिवारी को श्रद्धांजलि देना हाता नहीं भाता और ब्राह्मण समाज से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर बीजेपी भी अपने परंपरागत समर्थन को बनाए रखने की कोशिश कर रही है। यानी मुकाबला अब सिर्फ जातीय समीकरण का नहीं, बल्कि भरोसे और राजनीतिक संदेश का भी है।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि 2027 का चुनाव केवल पीडीए बनाम एनडीए नहीं होगा। यह सामाजिक समीकरणों, युवाओं के मुद्दों और नए राजनीतिक गठबंधनों की भी परीक्षा होगा। क्या समाजवादी पार्टी वास्तव में बीजेपी के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगा पाएगी? क्या ब्राह्मण समाज नई राजनीतिक दिशा चुनेगा या फिर पुराना भरोसा कायम रहेगा? यानी मुकाबला अब केवल जातीय नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास और नेतृत्व की विश्वसनीयता का भी होगा। इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में साफ होंगे।
भाजपा और उसके नेता इसे सपा का ‘तुष्टिकरण’ और चुनावी छलावा बता रहे हैं, तथा उनका दावा है कि जागरूक ब्राह्मण समाज विपक्षी दलों के बहकावे में आने वाला नहीं है।



