सौरभ वार्ष्णेय
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर यह संदेश दिया कि नए उत्तर प्रदेश में कानून से ऊपर कोई नहीं है और अपराधियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई करने के लिए पुलिस को पूरी स्वतंत्रता दी गई है। मुख्यमंत्री के अनुसार, इसी स्वतंत्रता के कारण प्रदेश की पहचान उपद्रव से उत्सव की ओर बदली है। उनका यह वक्तव्य प्रदेश की कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार की प्राथमिकताओं और पुलिस की भूमिका को रेखांकित करता है। निस्संदेह, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांति, सुरक्षा और कानून का शासन विकास की बुनियादी शर्तें हैं। लेकिन कानून के राज की वास्तविक सफलता केवल सख्त कार्रवाई के दावों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के मन में सुरक्षा के विश्वास, न्याय की उपलब्धता और प्रशासन की निष्पक्षता से तय होती है।
पुलिस स्मृति दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि उन वीर पुलिसकर्मियों के सर्वोच्च बलिदान को याद करने का अवसर है, जिन्होंने देश और समाज की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। पुलिस का दायित्व केवल अपराधियों को पकडऩा या कानून का पालन कराना नहीं है, बल्कि संकट के समय नागरिकों की सहायता करना, कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और समाज में विश्वास का वातावरण तैयार करना भी है। कर्तव्य के प्रति समर्पण, साहस और अनुशासन पुलिस सेवा की पहचान हैं। ऐसे में शहीद पुलिसकर्मियों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी सार्थक होगी, जब पुलिसकर्मियों की सुरक्षा, उनके कार्य करने की परिस्थितियों, आधुनिक संसाधनों और पेशेवर प्रशिक्षण को लगातार बेहतर बनाया जाए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2017 से पहले की कानून व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय प्रदेश में माफिया और अराजक तत्वों का प्रभाव था। मथुरा के जवाहर बाग जैसी घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि कानून-व्यवस्था की चुनौतियां कितनी गंभीर हो सकती हैं और उनसे निपटने में पुलिसकर्मियों को किस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। वर्तमान सरकार का दावा है कि अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई में राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव को बाधा नहीं बनने दिया जा रहा। यदि इस नीति को निष्पक्षता और निरंतरता के साथ लागू किया जाता है, तो इससे कानून के प्रति लोगों का भरोसा मजबूत हो सकता है।
हालांकि, किसी भी सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह कानून व्यवस्था में सुधार का आकलन केवल अपनी उपलब्धियों के आधार पर न करे, बल्कि स्वतंत्र आंकड़ों, अपराध के बदलते स्वरूप और नागरिकों के अनुभवों को भी महत्व दे। अपराध पर नियंत्रण का अर्थ केवल गिरफ्तारी और संपत्ति जब्त करने की संख्या बढ़ाना नहीं है। वास्तविक उपलब्धि तब मानी जाएगी, जब महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, व्यापारियों, किसानों और समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षित वातावरण मिले। शिकायत दर्ज कराने के लिए नागरिकों को परेशान न होना पड़े, पीडि़तों को समय पर सहायता मिले और अपराध की जांच निष्पक्ष ढंग से पूरी हो। पुलिस की सक्रियता के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया की गति और अभियोजन की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
मुख्यमंत्री ने पुलिस व्यवस्था को अधिक सक्षम और आधुनिक बनाने के लिए 2.26 लाख से अधिक पुलिसकर्मियों की भर्ती, प्रशिक्षण क्षमता में दस गुना वृद्धि, सात बड़े शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने, प्रत्येक जिले में साइबर थाने स्थापित करने और सभी थानों में महिला सहायता कक्षों की व्यवस्था जैसे कदमों का उल्लेख किया। इन पहलों का उद्देश्य पुलिस को बदलती सामाजिक और तकनीकी चुनौतियों के अनुरूप तैयार करना है। बढ़ती आबादी और तेजी से शहरीकरण के बीच उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में पुलिस बल की संख्या, उसकी दक्षता और संसाधनों का विस्तार आवश्यक है। नई भर्तियों से पुलिस पर काम का दबाव कम करने, गश्त बढ़ाने और नागरिकों तक सेवाएं पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
लेकिन भर्ती के साथ प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान देना होगा। पुलिसकर्मियों को कानून, मानवाधिकार, साइबर अपराध, फॉरेंसिक जांच, डिजिटल साक्ष्य और सामुदायिक पुलिसिंग का व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए। केवल आधुनिक हथियार और तकनीकी उपकरण उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। पुलिस की कार्यशैली में संवेदनशीलता, धैर्य और पेशेवर व्यवहार भी उतना ही जरूरी है। किसी पीडि़त की शिकायत सुनने से लेकर अपराध की जांच पूरी करने तक हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। पुलिस की प्रतिष्ठा उसके अधिकारों से ही नहीं, बल्कि उन अधिकारों के जिम्मेदार इस्तेमाल से भी बनती है।
आज साइबर अपराध एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। ऑनलाइन ठगी, पहचान की चोरी, डिजिटल भुगतान से संबंधित धोखाधड़ी और सोशल मीडिया के माध्यम से किए जाने वाले अपराधों ने पुलिस के सामने नई जिम्मेदारियां खड़ी कर दी हैं। प्रत्येक जिले में साइबर थानों की स्थापना एक उपयोगी कदम है, लेकिन इन थानों में प्रशिक्षित कर्मचारियों, आधुनिक तकनीक और त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था भी जरूरी है। आम नागरिकों को साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने में सरलता मिलनी चाहिए। इसी तरह महिला सहायता कक्षों की स्थापना तभी प्रभावी होगी, जब महिलाओं की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए, उनकी गोपनीयता सुरक्षित रखी जाए और जरूरत पडऩे पर तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जाए।
सरकार ने गैंगस्टर अधिनियम के तहत 88,973 अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई और 15 हजार करोड़ रुपये से अधिक की अवैध संपत्ति जब्त किए जाने का उल्लेख किया है। ये आंकड़े संगठित अपराध और अपराध से अर्जित संपत्ति के विरुद्ध सरकार की कार्रवाई का संकेत देते हैं। अपराध से अर्जित संपत्ति पर कानूनी कार्रवाई संगठित अपराध के आर्थिक आधार को कमजोर करने का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकती है। फिर भी ऐसी कार्रवाई में कानून की निर्धारित प्रक्रिया, पर्याप्त साक्ष्य और निष्पक्ष जांच का पालन अनिवार्य है। किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई का आधार उसका अपराध होना चाहिए, न कि उसकी राजनीतिक पहचान, सामाजिक स्थिति या किसी अन्य प्रकार का पूर्वाग्रह। कानून की शक्ति तभी विश्वसनीय बनती है, जब उसका प्रयोग सभी के लिए समान हो।
यह भी समझना होगा कि पुलिस को स्वतंत्रता देने का अर्थ उसे जवाबदेही से मुक्त करना नहीं है। पुलिस को अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त अधिकार और प्रशासनिक सहयोग मिलना चाहिए, लेकिन उन अधिकारों का उपयोग संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर होना चाहिए। अवैध हिरासत, हिरासत में हिंसा, झूठे मुकदमे या निर्दोष नागरिकों के उत्पीडऩ जैसी किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मजबूत पुलिस व्यवस्था वही है, जिसमें अपराधी कानून से भयभीत हो, लेकिन निर्दोष नागरिक पुलिस से भयभीत न हो। अधिकार और जवाबदेही का यही संतुलन लोकतांत्रिक शासन की पहचान है।
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सुधार केवल पुलिस विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए न्यायालयों में मामलों के शीघ्र निस्तारण, अभियोजन व्यवस्था को मजबूत करने, जेल सुधार, स्थानीय प्रशासन की सक्रियता और समाज की भागीदारी की भी आवश्यकता है। बेरोजगारी, नशाखोरी, सामाजिक तनाव और स्थानीय विवादों जैसी समस्याओं के समाधान के लिए भी समन्वित प्रयास किए जाने चाहिए। अपराध होने के बाद कार्रवाई जितनी आवश्यक है, अपराध को पनपने से रोकने के लिए सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर काम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पुलिस स्मृति दिवस हमें यह याद दिलाता है कि कानून व्यवस्था केवल सत्ता की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और सम्मान से जुड़ा विषय है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कानून से ऊपर किसी को न मानने का संदेश तभी पूरी तरह सार्थक होगा, जब उसका प्रभाव प्रदेश के हर जिले, हर कस्बे और हर गांव में दिखाई दे। आम नागरिक बिना भय अपनी बात कह सके, पीडि़त को न्याय मिले, महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा हो और अपराधी किसी भी प्रभाव या रसूख के सहारे कानून से बच न सके।
नए उत्तर प्रदेश की पहचान केवल सख्त पुलिस कार्रवाई या सरकारी आंकड़ों से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, सुरक्षित और विश्वासपूर्ण समाज से बनेगी। शहीद पुलिसकर्मियों के बलिदान का वास्तविक सम्मान यही है कि पुलिस व्यवस्था अधिक सक्षम होने के साथ-साथ संवेदनशील, पारदर्शी और जवाबदेह भी बने। कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब कानून का भय अपराधियों में और कानून पर विश्वास आम नागरिकों के मन में स्थापित हो। यही सुशासन की कसौटी है और इसी आधार पर उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।



