क्या अम्बेडकर सभी शूद्र जातियों के प्रतिनिधित्व के हिमायती थे..?


आजादी से पहले डॉ. भीमराव अंबेडकर का कोई कार्य व अभियान यह प्रमाणित नहीं करता कि वे सभी शूद्र वर्ण की जातियों के प्रतिनिधित्व के हिमायती थे।यह बात कुछ लोगों को नागवार लग सकती है कि यह अम्बेडकर पर गलत टिप्पणी है।पर,सच्चाई है कि अम्बेडकर सिर्फ शूद्र वर्ण की अछूत जातियों के लिए कार्य करते थे।आजादी से पूर्व उन्होंने कभी दलित व शेड्यूल्ड कास्ट के अलावा सछूत शूद्र व बैकवर्ड कास्ट शब्द का प्रयोग किये हों।अम्बेडकर जी चाहे होते तो हिन्दू पिछड़ी जातियों को 1935 में ही आरक्षण मिल गया होता।अम्बेडकर जी में आज की पिछड़ी जातियों के लिए कोई भावना नहीं रही हो या किसी के दबाव में इन्हें अलग कर चल रहे थे।यही कारण था कि 1932 तक सभी शूद्र वर्ण की जातियों को डिप्रेस्ड क्लास के नाम पर आरक्षण मिल रहा था।पर,गोलमेज सम्मेलन 1932 की बाद डिप्रेस्ड क्लास को दो वर्गों-सछूत पिछड़ी जातियों/टचेबल डिप्रेस्ड क्लास व अछूत पिछड़ी जातियों/अन टचेबल डिप्रेस्ड क्लास(अछूत पिछड़ी व आदिम पिछड़ी जाति) में बंटवारा कर दिया गया।यह अम्बेडकर जी द्वारा या उनकी सहमति से ही लिया गया निर्णय था।भारत सरकार अधिनियम-1935 के द्वारा अछूत व आदिम पिछड़ी जातियों को शिक्षा व नौकरियों में व 1937 द्वारा विधायिका में आरक्षण दे दिया गया।1932 के गोलमेज के बाद हिन्दू पिछड़ी जातियों के साथ धोखाधड़ी शुरू हो गयी।अम्बेडकर सिर्फ अछूतों के लिए ब्राह्मणों के समान अधिकार के पक्षधर थे।


क्या अम्बेडकर सभी के वयस्क मताधिकार के पक्षधर थे-

डॉ. अम्बेडकर सभी वर्गों के वयस्क मताधिकार के पक्षधर बिल्कुल नहीं थे।वे सिर्फ अछूत पिछडों या अनुसूचित जातियों के दोहरे मताधिकार के लिए लड़ रहे थे।लोथियन कमेटी के सामने वे सिर्फ अछूतों के मताधिकार के पक्ष में अपना प्रत्यावेदन दिए।जबकि दूसरी तरफ रामचरण लाल निषाद एडवोकेट(एमएलसी),रामप्रसाद अहीर प्लीडर,शिवदयाल चौरसिया,हरि टमटा, राजाराम कहार आदि सभी के वयस्क मताधिकार की मांग कर रहे थे।

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