राम काजि कीन्हें बिना मोहि कहा बिसराम

महांवीर विक्रम बजरंगी-शास्त्रों में वीर रस के चार भेद बताए गए हैं-दान, दया, युद्ध एवं धर्म। कोई दानवीर होता है व कोई कर्मवीर परंतु जिसमें सारे वीर रस मौजूद हों, वह महांवीर होता है-‘महांवीर विक्रम बजरंगी।’ और श्री हनुमान जी इन सभी गुणों के ध्नी हैं। वे स्वभाव से अत्यन्त विनम्र, सरल, कृपालु व अच्छे व्यवहार वाले हैं। वे विशाल, शक्ति सम्पन्न हैं जिसके कारण वे युद्ध वीर रस के धरणी हैं।विद्यावान व गुणी-हनुमान जी के बारे में आता है-विद्यावान गुनी अति चातुर। भाव हनुमंत लाल जी विद्वान, गुणी व बहुत चतुर हैं। वे मात्रा विद्वान नहीं अपितु गुणवान भी हैं। वे उच्च आदर्शों से परिचित ही नहीं अपितु इन्हें धरण भी करते हैं। वे अपने वचन, व्यवहार, विचार से प्रभु श्रीराम जी के आदर्शों पर खरे उतरते हैं। क्योंकि अवगुणों से घिरी विद्ववता कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकती। राम काज को तत्पर, उद्यमी सेवक-‘राम काजि कीन्हें बिना मोहि कहा बिसराम’ समुद्र पार करते समय जब मैनाक पर्वत ने हनुमंत लाल जी को प्रभु श्रीराम जी का दूत होने के नाते कुछ पल आराम करने के लिए कहा, तो हनुमान जी मैनाक को हाथ से छूकर उसे प्रणाम करते हैं और कहते हैं-हे भाई! मैं श्रीराम जी के कार्य को पूर्ण किए बिना विश्राम नहीं कर सकता। यहाँ पर श्री हनुमंत लाल जी ने मैनाक के सामने चतुराई का प्रदर्शन किया। क्योंकि न तो उन्होंने उसकी विनती को स्वीकार किया न ही अस्वीकार। उन्होंने मैनाक पर्वत का मान रखते हुए उसे दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया व आगे बढ़ गए।

हनुमान जी को हर मर्ज़ की एक दवा कहा जाए तो गलत न होगा। दुनिया में दैहिक,दैविक और भौतिक प्रकार के जितने भी रोग, दोष और शोक हैं, हनुमान तीनों का ही दमन, शमन और हरण करते हैं-

‘नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत वीरा’ तथा ‘भूत- पिशाच निकट नहीं आवै। महावीर जब नाम सुनावै।’ जैसी पंक्तियों वाला पूर्ण ‘हनुमान चालीसा’ हनुमान के शौर्य, पराक्रम और प्रताप से भरा हुआ है। हनुमान चालीसा के हर छंद में हनुमान-नाम संकीर्तन किया गया है। इसके बावजूद ‘रामचरितमानस’ के सुंदरकांड में हनुमान विभीषण को अपना परिचय इस प्रकार देते हैं- प्रात लेइ जो नाम हमारा, तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।सीता की खोज करके जब हनुमान लौटकर किष्किन्धा आते हैं और राम उनसे पूछते हैं कि उन्होंने समुद्र-लंघन तथा लंका -दहन जैसे असंभव कार्य कैसे कर डाले तो वे कहते हैं- साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा ते साखा पर जाई।। सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।। यह शब्द महापराक्रमी हनुमान जी की परम विनम्रता के परिचायक हैं।हनुमान न देव हैं, न दानव हैं, न नर हैं। वरन, वानर हैं। हनुमान का व्यक्तित्व जितना अद्भुत और चरित्र जितना विचित्र है, उतना किसी भी देव, ऋषि, मुनि, गंधर्व, किन्नर, मनुज या अन्य शक्ति का नहीं है। आज तक संसार में उन जैसा अन्य अनन्यतम भक्त नहीं हुआ है, जिसने अपना हृदय विदीर्ण कर उसमें विराजमान अपने इष्ट का दर्शन कराया हो।

प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमानजी श्रीराम की तरह बेहतर कुशल प्रबंधक हैं। सदियों पहले महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है। बाद में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी हनुमान जी के उन गुणों के बारे में श्रीरामचरितमानस में विस्तार से बताया है, जिनके आधार पर वो कलियुग में लोगों के लिए प्रेरणादायक हैं।हिंदू पुराणों के अनुसार हनुमानजी अमर हैं। वह कलियुग के अंत तक इस पृथ्वी पर रहेगें। विलक्षण प्रतिभा के धनी हनुमानजी शक्ति और समर्पण के पर्याय हैं। वह मानव संसाधन का उपयोग करने में पारंगत थे। रामायण में हनुमानजी पर आधारित ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जिनसे पता चलता है कि उनकी कार्यकुशलता विशिष्ट प्रबंधन को दर्शाती है। उनकी इन विशेषताओं से युवा प्रबंधकों को सीखना चाहिेए।हनुमानजी हर परेशानी में निडर और साहसपूर्वक साथियों का साथ मार्गदर्शक के तौर पर देते थे। तो वहीं, विरोधी के रहस्य को जान लेना, दुश्मनों के बीच दोस्त खोज लेने की दक्षता रामायण के विभीषण प्रसंग में दिखाई देती है। हनुमानजी अपने वरिष्ठ जामवंत से अमूमन मार्गदर्शन लेते थे, जो एक बेहतर प्रबंधन का अमिट उदाहरण है।

ये नाम जो हनुमानजी के सभी गुणों को प्रकट करते हैं-

  • ॐ हनुमान।
  • ॐ अंजनी सुत।
  • ॐ वायु पुत्र।
  • ॐ महाबल।
  • ॐ रामेष्ठ यानी श्रीराम के प्रिय।
  • ॐ फाल्गुण सखा यानी अर्जुन के मित्र।
  • ॐ पिंगाक्ष यानी भूरे नेत्रवाले।
  • ॐ अमित विक्रम।
  • ॐ उदधिक्रमण यानी समुद्र को अतिक्रमण करने वाले।
  • ॐ सीता शोक विनाशन यानी सीताजी के शोक का नाश करने वाले।
  • ॐ लक्ष्मण प्राण दाता लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले।
  • ॐ दशग्रीव दर्पहा यानी रावण के घमंड को दूर करने वाले।

हनुमान के अनन्यतम भक्ति -भाव को छोड़ तो भी उनसे जुड़ी अनेक ऐसी अद्भुतताएं हैं, जो केवल उन्हीं में हैं, जगत के किसी अन्य जीव या प्राणी में नहीं। वे स्वयं तो भगवान के भक्त हैं ही, अन्य भक्तों और उनके भगवान के बीच भी सेतु या मध्यस्थ की भूमिका अदा करते हैं।हनुमान अपने भक्तों के कष्ट-क्लेशों को दूर करने के लिए अपने इष्ट से प्रार्थना करते रहते हैं। किसी भक्त कवि ने कितना सही कहा है-
‘दुनिया चले न श्री राम के बिना। रामजी चले ना हनुमान के बिना।’

वास्तव में, राम की भेंट हनुमान से न हुई होती तो श्रीभगवान का रामावतार सार्थक व सफल न हुआ होता। दूरदर्शी भक्तजन हनुमान की पूजा विशेष रूप से इसलिए भी करते हैं कि भक्त और हनुमान के मध्य माया रूपी कोई बाधा नहीं है। जैसे जीव और ब्रह्म के बीच माया होती है। संसार में हनुमंत ही एकमात्र ऐसे देव हैं, जो भगवान (राम ) के भक्त भी हैं और अपने भक्तों के भगवान भी हैं।हनुमान को अर्पित श्रद्धा-भक्ति सीधे उनके इष्ट, राम (भगवान) तक पहुंचती है। तुलसी दास ने हनुमान चालीसा में कहा है- तुम्हरे भजन राम को पावें। हनुमान को ‘मनोजवम् मारुततुल्यवेगं’ कहा गया है। अर्थात हनुमान मन और पवन के समान तीव्र गति वाले हैं। (तीनों लोकों में मन और वायु से अधिक वेगवान कोई वस्तु या शक्ति नहीं है।) ऐसे पवनपुत्र की भक्ति करने पर प्रथम और सर्वोत्तम लाभ यही है कि मनोवांछित फल पाने की आशा से भक्तों के द्वारा की गई भक्ति न केवल यथाशीघ्र इष्ट के चरणों में पहुंच जाती है, अपितु हनुमान जी स्वयं आर्त के पास इतनी जल्दी पहुंच जाते हैं, जितनी जल्दी स्वयं भगवान भी उस तक नहीं पहुंच सकते। हनुमान जी का कोई मुकाबला नहीं। यूं, दुर्गा,यम, इंद्र, शनि आदि देव भी अपने प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। पर, जो प्रभा मंडल हनुमान जी का है, वह किसी का नहीं है। शनि अपनी ‘ढैया’ और ‘साढेसाती’ से सारे संसार को सताते हैं, पर हनुमान जी से शनि भी सहमते हैं।हनुमान की संप्रभुता-शक्ति के कारण ही भगवान राम ने अपने साकेत धाम को प्रस्थान करने से पूर्व हनुमान को अयोध्या का ‘कोतवाल’ बनाया था] तब से आज तक अयोध्या के राजा हनुमान ही हैं।‘अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमानश्च विभीषण:। कृपा परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः। श्लोकानुसार हनुमान जी आज भी जीवित हैं। उन्हें अजर-अमर होने का वरदान सीता माता ने दिया था।

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