Tuesday, April 28, 2026
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आखिर कब पूरी होगी अतिपिछड़ी जातियों की आस

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कब पूरी होगी 17 अतिपिछड़ी जातियों की अनुसूचित जाति में जाने की आस,राजनीतिक दलों ने दिखाया आरक्षण का लॉलीपॉप, समझा दुधारू गाय।


विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रदेश अध्यक्ष चौधरी लौटन राम निषाद की अध्यक्षता में पार्टी प्रदेश कार्यालय पर वीरांगना फूलन देवी की 20वीं पुण्यतिथि के अवसर पर रविवार को शहादत दिवस श्रद्धापूर्ण मनाया। इस अवसर पर प्रदेश अध्यक्ष ने राजनीतिक दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि 17 अति पिछड़ी जातियों के साथ सभी दलों ने वादा खिलाफी किया, आरक्षण नहीं तो वीआईपी पार्टी का गठबंधन नहीं मिलेगा।17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का मामला डेढ़ दशक से पुराना है।राजनीतिक दलों ने अनुसूचित जाति आरक्षण का लॉलीपॉप दिखाकर राजनीतिक लाभ लिया। 17 अतिपिछड़ी जातियाँ राजनीतिक दलों के लिए दुधारू गाय सरीखी है। 17 में 13 अतिपिछड़ी जातियाँ निषाद समुदाय की हैं।विकासशील इंसान पार्टी व निषाद पार्टी निषाद जातियों के आरक्षण मुद्दे पर काफी मुखर हैं।वीआईपी का स्पष्ट तौर पर कहना है कि आरक्षण नहीं तो गठबंधन नहीं।वीआईपी बिहार में राजग गठबंधन की साझीदार है।इसके संस्थापक मुकेश सहनी बिहार सरकार में पशुधन व मत्स्य संसाधन मंत्री हैं।निषाद पार्टी के अध्यक्ष कहते हैं-2022 में भाजपा की सरकार बनवाएंगे,इसके बाद मझवार को अधिकार दिलाएंगे।अंततोगत्वा निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद भाजपा की जाल में फंसकर एक एमएलसी की सीट पर समझौता कर आरक्षण की लड़ाई को कमजोर कर दिए।


17 अतिपिछड़ी जातियों में 13 उपजातियाँ- मछुआ,मल्लाह,बिन्द, केवट, धीमर,धीवर,गोड़िया,कहार,कश्यप,रैकवार,माँझी,तुराहा,बाथम आदि निषाद समुदाय की हैं।जिनकी संख्या 12.91 प्रतिशत है।भर,राजभर 1.31% व कुम्हार,प्रजापति 1.84% हैं।उत्तर प्रदेश की ग्रामीण जनसंख्या में 17 अतिपिछड़ी जातियों की संख्या 17% से अधिक है,जो चुनावी दृष्टिकोण से खासी महत्वपूर्ण है। 2007 में ये बसपा के साथ थीं तो 2012 में सपा की तरफ मुड़ गयीं। 2017 में तो इन जातियों सहित अधिकांश गैर यादव पिछड़ी जातियाँ भाजपा की खेवनहार बन गईं। 2004 से 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का मुद्दा गर्म है।राजनीतिक दलों के लिए ये महज वोटबैंक बनकर रह गयी हैं।


सपा,बसपा की पूर्ववर्ती सरकारों ने केंद्र सरकार को पत्र व प्रस्ताव भेजकर अनुसूचित जाति में शामिल करने की सिफारिश किया।पर,डेढ़ दशक बाद भी इन्हें नहीं मिल पाया अनुसूचित जाति का दर्जा।10 मार्च,2004 को तत्कालीन सपा सरकार ने निषाद समुदाय की 13 उपजातियों को एससी में सम्मिलित करने की संस्तुति केंद्र सरकार को भेजी।आरजीआई ने सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय के हवाले उत्तर प्रदेश शासन से इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का औचित्य व मानवशास्त्रीय अध्ययन रिपोर्ट मांगा।समाज कल्याण विभाग,उत्तर प्रदेश शासन ने उ.प्र. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान भागीदारी भवन गोमतीनगर, लखनऊ से वृहद सर्वेक्षण कराया।समाज कल्याण विभाग ने औचित्य सहित 403 पृष्ठ का नृजातीय अध्ययन रिपोर्ट 31 दिसंबर,2004 को सरकार को भेजा।पुनः आरजीआई ने 18 बिंदुओं का जवाब मांगा।उत्तर प्रदेश शासन ने 16 मई,2005 को इन 18 बिंदुओं का जवाब भेजा।इसके बाद भी केंद्र सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया।केन्द्र सरकार द्वारा निर्णय न लेने के कारण तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने की अधिसूचना कार्मिक अनुभाग-2 से 10 अक्टूबर,2005 जारी करा दिया।इस निर्णय को असंवैधानिक करार देते हुए डॉ. भीमराव आंबेडकर पुस्तकालय एवं जनकल्याण समिति गोरखपुर ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद खण्डपीठ में स्थगनादेश के लिए याचिका दायर कर दिया।उच्च न्यायालय ने 20 दिसम्बर,2005 को अधिसूचना को स्थगित कर दिया।एससी/एसटी की सूची में किसी भी प्रकार के संशोधन का अधिकार भारतीय संसद के पास निहित है।इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 341 व 342 में संशोधन आवश्यक है।


2007 में सत्ता परिवर्तन के बाद 13 मई 2007 को मायावती मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 30 मई को पहली ही कैबिनेट बैठक में 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए केन्द्र सरकार के पास विचाराधीन प्रस्ताव को वापस मंगाकर रद्द करने का निर्णय लिया।केन्द्र सरकार ने 6 जून 2007 को प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार को वापस भेज दिया।प्रदेश सरकार ने इसे रद्द कर शून्य कर दिया।निषाद संगठन मायावती सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध धरना प्रदर्शन करने लगे।निषाद जातियों की नाराजगी को देखते हुए 4 मार्च,2008 को प्रधानमंत्री के नाम अर्द्धशासकीय पत्र भेजकर अनुसूचित जाति में शामिल करने का अनुरोध कीं।


राजनीतिक दल अतिपिछड़ी जातियों को समझते हैं दुधारू गाय-चौ0लौटनराम निषाद

विकासशील इंसान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय निषाद संघ के राष्ट्रीय सचिव चौ.लौटनराम निषाद ने राजनीतिक दलों की मंशा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है।यूपीए-1 व 2 की 2004 से 2014 तक की सरकार सपा,बसपा के समर्थन से चलती रही।परमाणु करार,एफडीआई आदि मुद्दे पर इन दलों ने यूपीए सरकार को गिरने से बचाया।ये चाहे होते तो इन अतिपिछड़ी जातियों को एससी का दर्जा दिला दिए होते।लेकिन राजनीतिक दल अतिपिछड़ी जातियों को दुधारू गाय समझते हैं। 2014 व 2019 के लोकसभा व 2017 के विधानसभा चुनाव में इन जातियों ने आँख मूँदकर भाजपा को समर्थन दिया।पर,भाजपा ने भी ध्यान नहीं दिया।विधानसभा चुनाव-2012 के चुनाव घोषणा पत्र में निषाद समुदाय की जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने व निषाद मछुआरों के परम्परागत पुश्तैनी पेशों की बहाली का भाजपा ने वादा किया था। 5 अक्टूबर, 2012 को भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी व सुषमा स्वराज ने फिशरमैन विज़न डाक्यूमेंट्स/मछुआरा दृष्टिपत्र जारी किया था।संकल्प लिया था कि 2014 में सरकार बनने पर आरक्षण की विसंगतियों को दूर कर निषाद मछुआरा जातियों को एससी व एसटी का दर्जा दिलाया जाएगा।नीली क्रांति के माध्यम से मछुआरों का आर्थिक विकास किया जाएगा।पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बाद भी भाजपा ने अपना संकल्प पूरा नहीं किया।


निषाद ने साफ तौर पर कहा कि बिना राजपत्र व शासनादेश के भाजपा से गठबंधन व उसका समर्थन नहीं किया जाएगा। उत्तर प्रदेश की 403 में 169 विधानसभा क्षेत्र में निषाद वोटबैंक 40 हजार से अधिक है।उत्तर प्रदेश सरकार ने गलत नीति अपना कर निषाद मछुआरों के मत्स्यपालन व बालू मोरम खनन जैसे परम्परागत पेशों पर मत्स्य व बालू माफियाओं का कब्जा करा दिया है।निषाद मछुआ समुदाय की जातियों का परम्परागत पुश्तैनी पेशा मत्स्य पालन,मत्स्याखेट व शिकारमाही, बालू मोरम खनन,नौका फेरी,सिंघाड़ा खेती आदि के साथ नदियों की कछार में जायद की खेती रहा है।जिस पर किसी न किसी रूप में माफियाओं के कब्जे में हो गया है।सरकार की गलत नीतियों के कारण मत्स्यजीवी समुदाय अपने पुश्तैनी पेशों से बेदखल हो गया है।बालू,मोरंग खनन व निकासी के काम मे पुश्तैनी पेशेवर जातियों को प्राथमिकता दी जाती रही है,पर उत्तर प्रदेश सरकार ने ई-टेंडरिंग की व्यवस्था कर इसे भी छीन लिया।


विधानसभा चुनाव-2022 में निषाद जातियों को अपने पाले में करने के लिए सपा,बसपा,भाजपा,कांग्रेस अपने अपने तरीके से हाथ पैर मार रहे हैं।जब प्रयागराज के बसवार गाँव में स्थानीय भाजपा नेताओं व बालू माफियाओं के इशारे पर पुलिस ने कहर बरपाया व निषादों की नावों को तोड़ डाला,तब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी बसवार गॉंव जाकर संवेदना व्यक्त की।निषादों की तोड़ी गयी नावों की मरम्मत के लिए आर्थिक मदद दीं।गोरखपुर की रैली में प्रियंका ने निषादों को जोड़ने के लिए कहा कि-नावें निषादों की माँ है,कांग्रेस सरकार बनने पर निषादों का अधिकार दिलाया जाएगा।प्रियंका ने कहा कि कांग्रेस सरकार बनने पर गोरखपुर में नाथ पंथ के संस्थापक मत्स्येंद्रनाथ जी के नाम विश्वविद्यालय बनवाया जाएगा।बताते चले कि गुरु गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ धीवर/निषाद जाति के थे।सभी दल निषाद जातियों की अहमियत को समझ रहे हैं,सो हर दल निषाद मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिए हाथ पैर मार रहे हैं।