
लखनऊ। रामपुर जेल का दरवाजा खुला तो आजम खान ने बाहर की हवा में सांस लेने की उम्मीद की होगी, लेकिन आजादी की यह सुबह महज कुछ मिनटों की मेहमान निकली। जेल से बाहर आते ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जिस नेता की रिहाई को समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने मुस्लिम नेतृत्व की ताकत दिखाने के अवसर के रूप में देख सकती थी, वह फिर सलाखों के पीछे पहुंच गया। एक ही घटनाक्रम में सपा के सामने तीन सवाल खड़े हो गए हैं। आजम खान की गैरमौजूदगी में रामपुर की राजनीति किसके इर्द-गिर्द घूमेगी? मुस्लिम नेतृत्व के सवाल पर अखिलेश यादव ओवैसी को क्या जवाब देंगे? और क्या सपा अपने सबसे पुराने मुस्लिम राजनीतिक चेहरों में से एक के साथ खड़े होने का भरोसा कायम रख पाएगी?
आजम खान की गिरफ्तारी को केवल एक कानूनी घटनाक्रम मानकर छोड़ देना उत्तर प्रदेश की राजनीति के एक महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज करना होगा। 31 अक्टूबर 2026 को दो पैन कार्ड मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम रामपुर जेल से बाहर आए। लेकिन आजम की रिहाई के तुरंत बाद ईडी ने जौहर ट्रस्ट से जुड़े धनशोधन मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। एक नवंबर को गाजियाबाद की विशेष अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। यानी जिस रिहाई को राजनीतिक वापसी की शुरुआत माना जा रहा था, वह फिर कानूनी लड़ाई में बदल गई।
इस मामले में 494.46 करोड़ रुपये और 78.32 करोड़ रुपये के बीच का अंतर सबसे महत्वपूर्ण है। जिला मूल्यांकन अधिकारी की रिपोर्ट के मुताबिक, जौहर विश्वविद्यालय की 59 इमारतों के निर्माण की लागत 494.46 करोड़ रुपये आंकी गई। दूसरी तरफ जौहर ट्रस्ट ने आयकर रिकॉर्ड में वित्त वर्ष 2013-14 से 2024-25 के दौरान 78.32 करोड़ रुपये का पूंजीगत खर्च दिखाया। ईडी के मुताबिक, दोनों आंकड़ों के बीच 416.14 करोड़ रुपये का अंतर है, जिसका संतोषजनक हिसाब नहीं मिला। एजेंसी ने सरकारी धन के कथित इस्तेमाल और वित्तीय लेनदेन की भी जांच की है। हालांकि, यह जांच एजेंसी के आरोप हैं, इन्हें अदालत में साबित होना बाकी है। आरोपों को ही अंतिम फैसला मान लेना न्यायिक प्रक्रिया के साथ अन्याय होगा।
आजम खान का राजनीतिक महत्व समझने के लिए उनके चुनावी सफर पर नजर डालना जरूरी है। वह रामपुर से दस बार विधायक चुने गए। चार बार मंत्री रहे और दो बार लोकसभा पहुंचे। 1980 में पहली बार विधानसभा पहुंचे आजम खान ने चार दशक से अधिक समय तक रामपुर की राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखी। मुलायम सिंह यादव के दौर में उनकी हैसियत इतनी बड़ी थी कि सपा के भीतर उनके राजनीतिक वजन को नजरअंदाज करना आसान नहीं था। अखिलेश यादव के कार्यकाल में भी वह सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में शामिल रहे। इसलिए आजम की अनुपस्थिति केवल एक वरिष्ठ नेता की गैरमौजूदगी नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक व्यवस्था में खाली हुई जगह है जिसमें मुस्लिम नेतृत्व का एक बड़ा चेहरा लंबे समय तक मौजूद रहा।
लेकिन आजम खान की राजनीतिक ताकत को लेकर एक दूसरा सच भी है। रामपुर में उनका प्रभाव पहले जैसा निर्विवाद नहीं रह गया है। 2022 के उपचुनाव में रामपुर लोकसभा सीट भाजपा के घनश्याम सिंह लोधी ने जीत ली थी। 2024 में सपा के मोहिबुल्लाह नदवी ने 4,81,503 वोट हासिल कर भाजपा के घनश्याम सिंह लोधी को 87,434 वोटों से हराया। यह जीत सपा के लिए महत्वपूर्ण थी, लेकिन उम्मीदवार चयन को लेकर आजम खान के खेमे की नाराजगी ने पार्टी के अंदरूनी समीकरण भी उजागर किए। आजम के करीबी आसिम रजा की दावेदारी और मोहिबुल्लाह नदवी को टिकट दिए जाने के बीच पैदा हुआ विवाद बताता है कि रामपुर में आजम की राजनीतिक विरासत को लेकर खींचतान पहले से मौजूद है।

लिहाजा उनकी गिरफ्तारी के बाद यह मान लेना कि पूरा राजनीतिक मैदान अपने आप सपा के हाथ से निकल जाएगा, उतना ही गलत होगा जितना यह मानना कि उनकी अनुपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम नेतृत्व के भरोसे की है। 22 अक्टूबर को रामपुर जेल में आजम खान से मुलाकात करके अखिलेश ने राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी। लेकिन इस मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद आजम की गिरफ्तारी ने उस संदेश की परीक्षा शुरू कर दी है। सवाल यह नहीं है कि अखिलेश आजम खान के सम्मान में बयान देते हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि पार्टी संगठन और चुनावी फैसलों में मुस्लिम नेताओं को कितनी भागीदारी मिलती है।
2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में 34 मुस्लिम विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे थे। यह आंकड़ा बताता है कि मुस्लिम मतदाताओं की राजनीतिक भागीदारी और विधानसभा में उनके प्रतिनिधित्व के बीच अभी भी बड़ी बहस मौजूद है। सपा के लिए चुनौती केवल मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन हासिल करना नहीं, बल्कि उन्हें राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी का भरोसा देना भी है।इसी खाली जगह पर असदुद्दीन ओवैसी अपनी राजनीति का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं। 18 अक्टूबर को रामपुर के टांडा में हुई जनसभा में उन्होंने अखिलेश यादव और सपा पर निशाना साधते हुए कहा कि मुस्लिम युवा अब दूसरों के लिए दरी बिछाने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपना नेतृत्व खुद करेंगे। ओवैसी का यह बयान महज चुनावी भाषण नहीं, बल्कि मुस्लिम प्रतिनिधित्व की उस बहस को सामने लाता है जिसे सपा लंबे समय से अपने राजनीतिक आधार का हिस्सा मानती रही है।
आजम खान जेल से बाहर रहते तो सपा के पास इस सवाल का जवाब देने के लिए एक प्रभावशाली राजनीतिक चेहरा मौजूद रहता। वह अपने पुराने समर्थकों से संवाद कर सकते थे और अखिलेश यादव के साथ मंच साझा करके पार्टी के भीतर मुस्लिम नेतृत्व की भूमिका का संदेश दे सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि किसी एक नेता की मौजूदगी से प्रतिनिधित्व की पूरी समस्या हल नहीं होती। ओवैसी के सवालों का जवाब तभी दिया जा सकता है जब टिकट वितरण से लेकर संगठन और विधानसभा में नेतृत्व तक मुस्लिम नेताओं की भागीदारी दिखाई दे।अब सपा के सामने दोहरी चुनौती है।
एक तरफ आजम खान के पुराने समर्थकों को पार्टी से जोड़े रखना है, दूसरी तरफ रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नए नेतृत्व को जगह देनी है। आजम के राजनीतिक सम्मान और स्थानीय नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। आजम खान की कानूनी लड़ाई अभी लंबी हो सकती है, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद छह महीने जेल में रहना अनिवार्य है, ऐसा कहना भी सही नहीं होगा। जमानत का फैसला अदालत और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए जनवरी से मार्च 2027 तक उनकी रिहाई का कोई रास्ता नहीं है, ऐसा अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मुस्लिम नेतृत्व किसी पार्टी के चुनावी समर्थन तक सीमित रहेगा या उसे फैसले लेने की वास्तविक जगह भी मिलेगी। 2027 की लड़ाई में यह सवाल केवल आजम खान का नहीं होगा। यह अखिलेश यादव की संगठनात्मक राजनीति, ओवैसी के प्रतिनिधित्व संबंधी दावों और मुस्लिम मतदाताओं के राजनीतिक विकल्पों की भी परीक्षा होगी। रामपुर से उठी यह बहस अब प्रदेश की राजनीति के बड़े सवालों में शामिल हो चुकी है।



