सिर्फ अनाज नहीं, संतुलित पोषण भी जरूरी

खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल हर व्यक्ति तक अनाज पहुंचाना नहीं, बल्कि उसे पौष्टिक और संतुलित आहार उपलब्ध कराना भी है। बदलते दौर में टिकाऊ कृषि, प्रभावी वितरण व्यवस्था और पोषण के प्रति जागरूकता के जरिए ही स्वस्थ और सुरक्षित भारत का निर्माण संभव है।

डॉ.प्रियंका सौरभ
डॉ.प्रियंका सौरभ

खाद्य सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि, सामाजिक न्याय और मानवीय विकास का आधार है। जिस देश के नागरिकों को पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं होता, वहाँ विकास के बड़े-बड़े दावे भी अधूरे रह जाते हैं। भारत ने स्वतंत्रता के बाद खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है। हरित क्रांति से लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विस्तार तक, देश ने खाद्य संकट से उबरकर खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता की दिशा में लंबी यात्रा तय की है। आज भारत दुनिया के प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक देशों में शामिल है। इसके बावजूद कुपोषण, एनीमिया, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें, जलवायु परिवर्तन और खाद्यान्न वितरण में असमानता जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। इसलिए अब आवश्यकता केवल अनाज के भंडार भरने की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक तक संतुलित, पौष्टिक और सुरक्षित भोजन पहुँचाने की है।

विश्व खाद्य दिवस 2026 की प्रस्तावित थीम ‘इनोवेट टुडे, नॉरिश टुमॉरो’ अर्थात ‘आज नवाचार करें, कल पोषण सुनिश्चित करें’ खाद्य सुरक्षा के भविष्य में नवाचार की भूमिका को रेखांकित करती है। बदलती जलवायु, बढ़ती आबादी और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच खाद्य व्यवस्था को अधिक टिकाऊ, समावेशी और तकनीक आधारित बनाना आवश्यक है।

भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अनेक महत्त्वपूर्ण पहल की हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके माध्यम से पात्र लाभार्थियों को रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने का कानूनी आधार मिला। इस व्यवस्था ने गरीब और कमजोर परिवारों के लिए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कोविड-19 महामारी के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना ने करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराकर संकट के समय सामाजिक सुरक्षा का महत्त्व प्रदर्शित किया। जनवरी 2024 से पात्र लाभार्थियों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत पाँच वर्षों के लिए मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू की गई। इससे गरीब परिवारों पर खाद्य व्यय का बोझ कम करने में सहायता मिली।

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भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई द्वारा खाद्यान्न की खरीद, भंडारण और वितरण तथा बफर स्टॉक का रखरखाव देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण आधार हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अनाज जुटाने का प्रयास किया जाता है। हालांकि, इस व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए खरीद प्रक्रिया में विविधता लाने की आवश्यकता है, ताकि गेहूँ और धान के साथ दलहन, तिलहन तथा मोटे अनाजों को भी पर्याप्त प्रोत्साहन मिल सके।

खाद्य वितरण में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए डिजिटल तकनीक का उपयोग भी उल्लेखनीय है। ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ योजना के माध्यम से पात्र लाभार्थियों को देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी सुविधा के अनुसार राशन प्राप्त करने की सुविधा मिली है। विशेष रूप से प्रवासी मजदूरों के लिए यह पहल महत्त्वपूर्ण है। आधार आधारित प्रमाणीकरण, राशन दुकानों पर इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल मशीनों और डिजिटल निगरानी ने वितरण प्रणाली में सुधार की संभावनाएँ बढ़ाई हैं। फिर भी तकनीकी गड़बड़ियों, नेटवर्क की समस्या और प्रमाणीकरण में विफलता के कारण किसी जरूरतमंद व्यक्ति को राशन से वंचित नहीं होना चाहिए। तकनीक का उद्देश्य सुविधा बढ़ाना होना चाहिए, न कि पात्र नागरिकों के लिए नई बाधाएँ खड़ी करना।

खाद्य सुरक्षा का वास्तविक अर्थ केवल पेट भरना नहीं, बल्कि शरीर की आवश्यकताओं के अनुरूप पोषण उपलब्ध कराना भी है। इसी उद्देश्य से प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना यानी पीएम-पोषण के अंतर्गत सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में बच्चों को पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है। पोषण अभियान के माध्यम से बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के पोषण स्तर में सुधार पर ध्यान दिया जाता है। आंगनवाड़ी सेवाएँ, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम भी इस दिशा में योगदान देते हैं। इसके अतिरिक्त, खाद्य पदार्थों के सुदृढ़ीकरण यानी फोर्टिफिकेशन के माध्यम से आयरन, फोलिक एसिड और अन्य आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालाँकि, इन उपायों के साथ विविध आहार, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी।

इन प्रयासों के बावजूद भारत में कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी गंभीर चिंता का विषय हैं। भोजन की पर्याप्त कैलोरी उपलब्ध होने के बावजूद यदि उसमें प्रोटीन, विटामिन, खनिज और अन्य आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी है, तो व्यक्ति स्वस्थ जीवन नहीं जी सकता। महिलाओं और बच्चों में एनीमिया, बच्चों की वृद्धि में रुकावट और कम वजन जैसी समस्याएँ इस चुनौती को स्पष्ट करती हैं। गरीबी, खाद्य पदार्थों की कीमतें, जागरूकता की कमी और असंतुलित खानपान इसके प्रमुख कारण हैं। इसलिए खाद्य सुरक्षा की नीतियों को पोषण सुरक्षा के व्यापक लक्ष्य से जोड़ना होगा।

जलवायु परिवर्तन खाद्य सुरक्षा के सामने एक और बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़, लू और बढ़ते तापमान का प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ता है। गेहूँ जैसी फसलों पर अत्यधिक तापमान का प्रतिकूल असर पड़ सकता है, जबकि धान की खेती में अत्यधिक जल उपयोग भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ाता है। यदि कृषि उत्पादन प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करके बढ़ाया जाएगा, तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा स्वयं संकट में पड़ सकती है। इसके अलावा, भंडारण की अपर्याप्त सुविधाओं, शीत शृंखला की कमी और परिवहन संबंधी समस्याओं के कारण फल, सब्जियों तथा अन्य शीघ्र खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सबसे पहले कृषि उत्पादन को विविधतापूर्ण और टिकाऊ बनाना होगा। किसानों को दलहन, तिलहन, बाजरा, ज्वार और अन्य पौष्टिक फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। मोटे अनाज कम पानी में उगाए जा सकते हैं और पोषण की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। फसल विविधीकरण से किसानों की आय बढ़ाने, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और जल संसाधनों पर दबाव कम करने में सहायता मिल सकती है। इसके साथ ही सूखा सहन करने वाली बीज किस्मों, सूक्ष्म सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और मौसम आधारित कृषि सलाह को बढ़ावा देना चाहिए।

खाद्य आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक गोदाम, शीत भंडारण केंद्र, प्रसंस्करण इकाइयाँ और बेहतर परिवहन सुविधाएँ विकसित की जानी चाहिए। डिजिटल तकनीक के माध्यम से उत्पादन, भंडारण, बाजार की मांग और वितरण की निगरानी की जा सकती है। स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण को प्रोत्साहन देने से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है और खाद्य पदार्थों की बर्बादी कम हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों का लाभ समाज के प्रत्येक जरूरतमंद वर्ग तक पहुँचाने के लिए वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी। प्रवासी मजदूरों, दूरदराज के ग्रामीण परिवारों, आदिवासी समुदायों और अन्य वंचित समूहों की आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियाँ बनानी होंगी। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों, विद्यालयों और स्थानीय समुदायों को पोषण संबंधी कार्यक्रमों से जोड़कर जनभागीदारी बढ़ाई जा सकती है। बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी, पोषण शिक्षा और स्थानीय स्तर पर पौष्टिक भोजन की उपलब्धता पर विशेष ध्यान देना होगा।

अंततः, भारत की खाद्य सुरक्षा की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि देश के गोदामों में कितना अनाज उपलब्ध है, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि प्रत्येक नागरिक को कितना पौष्टिक भोजन मिल रहा है। इसके लिए कृषि उत्पादन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छता, महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण संरक्षण के बीच समन्वय आवश्यक है। नवाचार तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ किसानों से लेकर उपभोक्ताओं तक पहुँचे। भारत को खाद्यान्न की उपलब्धता से आगे बढ़कर पोषण की गुणवत्ता, पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक समानता को अपनी खाद्य नीति के केंद्र में रखना होगा। भविष्य की खाद्य सुरक्षा का वास्तविक लक्ष्य केवल भूख मिटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ, सम्मानजनक और पोषणयुक्त जीवन का अवसर प्रदान करना है।

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