
प्रकृति मां है। मां प्रथमा है। हम सब मां के अंग हैं। मां का ही विस्तार हैं। मां न होती तो हम न होते। मां सृष्टि प्रकृति की आदि अनादि अनुभूति है। मां दिव्य है। मां का अनुभव दिव्यता है। तैत्तिरीय उपनिषद् के ऋषि ने ठीक ही मां को देवता कहा है। देवता दिव्यता की ही घनीभूत अनुभूति है। जहां जहां दिव्यता, वहां वहां देवता। प्रकृति का सर्वोत्तम है दिव्यता। पृथ्वी प्रकृति का ही अंश है इसलिए पृथ्वी भी माता है। जल सृष्टि सृजन का प्राचीन घटक है। ऋग्वेद में जल भी माताएं-आपः मातरम् हैं। माता अपने स्वभाव से ही दाता व विधाता है। वे अपने प्रेम प्रवाह का प्रतिदान नहीं लेती। जीवन प्रकृति का अनुग्रह है। इसमें जल है, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी के अंश हैं। प्रकृति देवी है। माता है। इस माता का ऋण है हम पर। अनुकम्पा के प्रति धन्यवादी बने रहना भारतीय संस्कृति है। प्रकृति का दोहन, शोषण यूरोपयी सभ्यता है। प्रकृति का पोषण, संवर्द्धन भारतीय परम्परा है। व्रत, ध्यान आदि आस्था के विषय हैं। मुख्य बात है-प्रकृति में मां देखने की अनुभूति। यह अनुभूति सर्वभूतेषु मातृरूपेण प्रतीति है। यही देवी उपासना है।
देवी उपासना प्रकृति का ही नीराजन है। दुर्गा सप्तशती (पांचवे अध्याय) में कहते हैं, “जो परम दिव्यता देवी मां के रूप में हरेक तत्व में उपस्थित है, उन्हें अनेक बार नमस्कार है-या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः। यह दिव्यता अनेक रूपों में भी प्रकट होती है, अनेक भावों में भी उगती है। ऋषि गाते हैं “जो देवी लज्जा, क्षमा और चेतना आदि के रूप में सभी तत्वों में उपस्थित हैं, उसे अनेकशः नमस्कार है।” ये नमस्कार भावजगत की गहराई से उगे हैं। वे सामान्य कर्मकाण्ड नहीं हैं। देवी दर्शन में सामने मूर्ति होती है। देखने में ही यह मूर्ति है, दर्शन में नहीं। हम मूर्त शरीर में यंत्र हैं लेकिन भीतर मंत्र हैं। मूर्ति के पार विराट अस्तित्व है। अस्तित्व मां है। हम उसके अंश। अन्य उपासनाओं में हम तरल सरल नहीं होते। मां उपासना में सुविधा है। हम शिशु है और अस्तित्व मां। प्रकृति दिव्य है, इस दिव्यता की अनुभूति दिक्-काल में नहीं रहने देती। प्रसन्नता आह्लाद या पीड़ा छुपाए नहीं जा सकते। हम लाख जतन करें-प्रसन्नता केन्द्र से फैलकर परिधि पर आ ही जाती है। दिव्यता की अनुभूति सामान्य प्रसन्न्ता नहीं है। दिव्यता सम्पूर्णता की ही आभा और प्रभा है। यही अनुभूति “नमस्तस्ये नमस्तस्ये, नमो नमः” में प्रकट हुई है।
प्रकृति में अनेक रंग, अनेक रूप। बहरूपधारी वनस्पतियां, कीट, पतिंग, पशु, पक्षी, मनुष्य, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य और पर्वत। लेकिन सबके भीतर एक चैतन्य आत्म गतिशील है। गीत एक है और छन्द अनेक। गंगा एक घाट बहुतेरे। जल एक है नदी, पोखर, झील, समुद्र, बादल, वर्षा अनेक रूप हैं। अग्नि एक हैं। एक ही अग्नि तत्व सभी रूपों में रूप प्रतिरूप हो रहा है। यम ने नचिकेता को कठोपनिषद् की कथा में बताया था “अग्निर्थेको भुवनं प्रावेष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव – अग्नि है। वही अग्नि हरेक रूप में प्रविष्ट होकर उसी के अनुरूप हो जाते हैं। प्रकृति के सभी रूप एक ही चेतना का प्रकटीकरण हैं। “या देवी सर्वभूतेषु चेतन विधीयते” में सभी तत्वों में चेतना के रूप में उपस्थित देवी को नमस्कार है। सभी तत्व परस्पर अन्तर्सम्बन्धी है। महाऊर्जा एक है। वही दुर्गा है और वही महालक्ष्मी, काली या सरस्वती। हम अपनी सुविधानुसार प्रतीक चुनते हैं। छन्दस प्रिय वीणावादिनी सरस्वती में मातृत्व देखते हैं और शक्ति अभीप्सु दुर्गा में। धनप्रेमी लक्ष्मी के साथ जुड़ते हैं। लेकिन सारे रूप, प्रतीक या प्रतिमान हैं। हमारे चित्त का ही रूपायन। हमारी आस्तिकता की दिव्य अभीप्सा। देवी उपासना प्रकृति के मातृस्वरूप की ही आस्तिकता हैं।
प्रकृति भी आस्तिक है। विंध्य पर्वत अतिप्राचीन है। यहां लाखों देवी उपासकों की भीड़ जुटती है। देवी को विंध्यवासिनी कहा जाता है। लेकिन इस क्षेत्र को एक और खूबसूरत नाम मिला है-विंध्यांचल। मुझे यह नाम बड़ा प्यारा लगता है। मां के आंचल का विस्तार है-विंध्याचल। आंचल आश्वस्ति है। हम सब शैशव में बहुत रोये चिल्लाएं हैं। स्मरण है कि मेरी चिल्लपों पर बड़ो ने डाटा तो और जोर से चिल्लाए। मां ने उठा लिया, सुबकने लगे। मां ने आंचल में लिया तो फिर से मुस्कान। क्या प्रत्यक्ष इस भौतिक सत्य को अंधविश्वास कह सकते हैं? मैं स्वयं विंध्याचल जाता हूं। बहुत पढ़ा सुना है इस शक्तिपीठ के सम्बंध में। हमारा मन निर्णायक नहीं है। नास्तिकता कहती है कि यह व्यर्थता है, लेकिन आस्तिकता उपासना के लिए प्रेरित करती है।
देवी उपासना का क्षेत्र व्यापक है। असम में है ही कोलकाता में काली दर्शन की भीड़ लगती है। अव्यवस्था का राज यहां भी पीड़ादायी है। जम्मू में वैष्णव देवी की उपासना शिखर पर्वत पर है। सभी शक्तिपीठ अपनी तमाम कथाओं और रहस्यों से भरेपूरे हैं। प्रकृति सभी प्राणियों की जननी है। डाॅ0 राधाकृष्णन् ने गीता (14.4) के भाष्य में कहा है “सभी जीवित रूपों की माता प्रकृति है।” प्रकृति से हमारा सम्बन्ध मां और संतति का है। उपासना या भक्ति के प्रारम्भ में हम ‘दो’ होते हैं। एक माता और दूसरे हम। लेकिन सामान्य समझ में मां और हम दो नहीं है। प्रकृति विकासमान है। सांख्य चिन्तन में विकार प्रकृति विकास का अगला रूप है। हमारा रूप प्रकृति का ही रूप है। हमारे गुण प्राकृतिक हैं। सभी रूप प्रकृति के ही रूप हैं।
हम अपनी सुविधा के लिए उन्हें अनेक नाम देते हैं। दुर्गा, काली, सरस्वती, शाकम्भरी, महामेधा, कल्याणी, वैष्णवी, पार्वती आदि आदि। नाम स्मरण बोध में सहायक हैं। असली बात है-मां। या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नमः। अंधविश्वास या आस्था का कोई प्रश्न नहीं। विज्ञान प्रकृति में पदार्थ और ऊर्जा देख चुका है। समूची प्रकृति एक अखण्ड इकाई है। इस अखण्ड इकाई का नाम क्या रखें? कठिनाई बड़ी है। नाम रखते ही रूप का ध्यान आता है। रूप की सीमा है। अखण्ड प्रकृति अनंत है। असीम और अव्याख्येय।
माँ प्रत्येक जीव की आदि अनादि अनुभूति है। माँ की देह का विस्तार ही हम सबकी काया है। माँ न होती तो हम न होते। मां प्रत्यक्ष ब्रह्म है। आत्मीय ब्रह्म है। ऋग्वेद का सुपरिचित पुरूष है। यही पोषक पालक अदिति है। उसका स्पर्श सर्वोत्तम प्यार है। भारतीय परम्परा का ईश्वर या भगवान सुपरिचित शक्ति नहीं है। उसकी स्तुति भी ‘त्वमेव माता-आप माता हैं’ से शुरू होती है और त्वमेव पिता, बंधु मित्र तक विस्तार पाती हैं। अस्तित्व का सबसे बड़ा गुण है मां जैसा होना। माँ स्वाभाविक ही दिव्य हैं। देवी हैं, पूज्य हैं, वरेण्य हैं, नीराजन और आराधन के योग्य हैं।
मार्कण्डेय ऋषि ने ठीक ही दुर्गा सप्तशती (अध्याय 5) में “या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता बताकर नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमोनमः” कहकर अनेक बार नमस्कार किया है। माँ का रस, रक्त और पोषण ही प्रत्येक जीव का मूलाधार है। हम माँ का विस्तार हैं सो मां जैसी सर्जक पालक शक्ति के निकट होना आनंददायी है। सप्तशती में संसार की सारी विद्याओं को भी मां देवी देखा गया है “विद्या समस्ता तव देवि भेदा।” जो देवी सभी तत्वों में माँ के रूप में उपस्थित है, उसे बारम्बार नमस्कार है-या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः।



