वर्तमान दौर की सबसे बड़ी महामारी:संस्कारहीन रिश्ते

आज हमारे पास बात करने के लिए सैकड़ों लोग हैं, लेकिन दिल की बात सुनने वाला कोई नहीं। हम एक ही छत के नीचे रहते हैं, एक ही टेबल पर खाना खाते हैं, एक-दूसरे के सामने बैठे रहते हैं… फिर भी जाने क्यों, दिलों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। आज की सबसे बड़ी महामारी बीमारी नहीं… संस्कारहीन होते रिश्ते हैं। हम साथ तो रहते हैं, लेकिन दिलों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। क्योंकि रिश्तों को बड़े शब्द नहीं, छोटे-छोटे संस्कार बचाते हैं।

कृति आर.के. जैन

वर्तमान समय की सबसे भयावह महामारी अस्पतालों में नहीं, घरों के भीतर पल रही है। इसका न कोई परीक्षण है, न तापमान, न कोई चिकित्सकीय रिपोर्ट। यह चुपचाप रिश्तों में उतरती है और उनकी धड़कनें धीमी कर देती है। इसका नाम है—संस्कारहीन रिश्ते। समाचारों की सुर्खियाँ हत्या, तलाक, पारिवारिक कलह और टूटते घर दिखाती हैं, पर उन घटनाओं के पीछे पसरा वह सन्नाटा नहीं दिखातीं, जहाँ कभी अपनापन साँस लेता था। असली त्रासदी तब होती है, जब अपने ही लोग एक-दूसरे के लिए अजनबी बन जाते हैं। संस्कार रिश्तों की रखवाली छोड़ दें तो मकान तो खड़े रहते हैं, कमरे भी भरे रहते हैं—बस घर भीतर से वीरान हो जाता है।

कभी रिश्ते मिट्टी जैसे थे—नरम, लचीले, एक-दूसरे में घुले हुए। संस्कार वह पानी थे, जो बिखरे कणों को जोड़कर परिवार गढ़ते थे। आज वही मिट्टी सूख रही है। अहंकार की एक चुभन, स्वार्थ की एक परत और सुविधा की एक आँधी रिश्तों में दरार डाल देती है। हमने संबंधों को भावनाओं से नहीं, फायदे से तौलना शुरू कर दिया है—सुविधा रही तो रिश्ता रहा, सुविधा गई तो अपनापन भी गया। अदालतों के पारिवारिक विवाद और रोज की सुर्खियाँ इसी बिखराव के कण हैं। सवाल यह नहीं कि रिश्ते क्यों टूट रहे हैं; सवाल यह है कि उन्हें बाँधने वाला संस्कारों का पानी हमारी हथेलियों से कब रिस गया।

आज परिवार एक छत के नीचे रहता है, पर एक-दूसरे के भीतर नहीं उतरता। खाने की मेज पर थालियाँ साथ होती हैं, मोबाइल भी—बस संवाद नहीं होता। बच्चे सवाल लेकर बड़ों तक पहुँचने के बजाय स्क्रीन पर उत्तर खोजते हैं और बुजुर्ग घर में रहकर भी बातचीत से बाहर हो जाते हैं। संस्कार अब व्यवहार में कम, किताबों, भाषणों और त्योहारों की तस्वीरों में अधिक दिखाई देते हैं। फिर किसी दिन खबर आती है—किसी वृद्ध की मृत्यु का पता कई दिनों बाद चला। सुर्खी कुछ पल ठहरती है, मगर उसके पीछे वर्षों का अकेलापन, दरवाजे पर टिकी आँखें और अपनों के स्पर्श को तरसते हाथ छूट जाते हैं। संस्कार जीवित होते तो बुजुर्ग खबर नहीं बनते—घर की सबसे सुरक्षित छाँव बने रहते।

प्रेम अब अपनापन कम, अपेक्षाओं का हिसाब अधिक बनता जा रहा है। इच्छा पूरी हुई तो मुस्कान, टूटी तो शिकायत; अपेक्षा टूटी तो रिश्ता भी डगमगा गया। कभी एक माफी वर्षों का साथ बचा लेती थी, आज एक संदेश, ब्लॉक या अनफॉलो वर्षों की निकटता मिटा देता है। मतभेद समस्या नहीं, संवाद का इम्तिहान हैं; दुख यह है कि हमने मतभेद के बाद बात करना छोड़ दिया। गलती मानना कमजोरी नहीं, रिश्ते की ताकत है; माफी माँगना हार नहीं, प्रेम का साहस। इसीलिए पहला तूफान आते ही रिश्ते की छत उड़ जाती है—उसे थामने वाली संस्कारों की कड़ियाँ पहले ही टूट चुकी होती हैं।

शहरों की चमक हमें उस आँगन से दूर ले गई, जहाँ कभी परिवार साथ बैठता था। दादा-दादी की कहानियाँ किस्से नहीं, धैर्य, क्षमा, त्याग और सम्मान की पाठशाला थीं। आज आँगन की जगह बालकनी, कहानियों की जगह रील्स और साथ की जगह अलग-अलग स्क्रीन हैं। बच्चे तेज भागना सीख रहे हैं, ठहरकर सुनना नहीं। माता-पिता सुविधाएँ जुटाने की दौड़ में बच्चों की आँखों की थकान और मन की चुप्पी पढ़ना भूल रहे हैं। फिर वही बच्चे बड़े होकर माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ देते हैं और यह एक खबर बन जाती है। पर वृद्धाश्रम की राह उस दिन नहीं बनती—उसकी पहली ईंट बहुत पहले घर के भीतर रखी जा चुकी होती है।

इस महामारी का सबसे खतरनाक लक्षण है—उसका दिखाई न देना। न बुखार, न खाँसी, न कोई रिपोर्ट; फिर भी परिवार भीतर से बीमार हो जाता है। आवाजों से अपनापन घटता है, बातचीत औपचारिक होती है और एक ही छत के नीचे लोग अपने-अपने एकांत में सिमट जाते हैं। साथ रहते हुए भी अकेलापन बढ़ता जाता है। समाचार चैनल घटना दिखा सकते हैं, आँकड़े गिना सकते हैं, बहस कर सकते हैं; मगर उस संस्कारहीनता को नहीं पकड़ सकते, जो टूटते रिश्तों की जड़ में पलती है। शायद इसलिए हम सुर्खियों से आगे देखना नहीं चाहते—क्योंकि वहाँ किसी और की कहानी नहीं, हमारा अपना आईना खड़ा है।

फिर भी इस बीमारी का इलाज संभव है, क्योंकि संस्कार कोई पुरानी चीज नहीं, बल्कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहार हैं। इलाज बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होगा। बिना कारण मुस्कुरा देना, किसी की बात बीच में न काटकर सुन लेना, गलती पर माफी माँग लेना, बुजुर्ग के हाथ छूकर आशीर्वाद लेना, बच्चे के सवाल को महत्व देना और क्रोध के क्षण में कठोर शब्द रोक लेना—यही रिश्तों की असली वैक्सीन हैं। रिश्तों की सूखी मिट्टी को फिर से गीला करना होगा। संस्कारों को उपदेशों की दीवार से उतारकर व्यवहार की जमीन पर लाना होगा। घर में थोड़ा समय, थोड़ा धैर्य और थोड़ा अपनापन लौट आए, तो बहुत-से रिश्ते टूटने से पहले ही बच सकते हैं।

शायद अब समय है कि हम सुर्खियों से बाहर निकलकर अपने ही घर को देखें। रिश्ते क्यों टूट रहे हैं, यह पूछने से पहले यह देखना होगा कि उन्हें बचाने के लिए हम अपने भीतर क्या बदल सकते हैं। न्यूज़ की सुर्खियाँ बदलती रहेंगी, घटनाएँ गुजर जाएँगी; मगर टूटा विश्वास, अकेला बुजुर्ग और भीतर से बुझा रिश्ता खबर बदलने से वापस नहीं आएगा। शुरुआत किसी बड़े अभियान से नहीं, घर की छोटी-सी संवेदना से होगी—किसी अपने को सुन लेने से, रूठे को मना लेने से, बुजुर्ग के पास बैठ जाने से, बच्चे के मन को समझ लेने से और अपनी गलती पर झुक जाने से। क्योंकि रिश्ते बड़े शब्दों से नहीं, छोटे संस्कारों से बचते हैं। सुर्खियों से आगे देखिए—शायद आपके अपने घर में अभी भी एक रिश्ता आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

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