विघटनकारी शक्तियों से देश को सावधान रहने की जरूरत

हृदयनारायण दीक्षित
हृदयनारायण दीक्षित

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किले से विघटनकारी शक्तियों से सावधान रहने की अपील की है। मोदी का भाषण बार बार पठनीय है। उन्होंने नक्सली हिंसा की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है। बताया है कि देश की धरती पर सक्रिय भारत विरोधी नक्सलियों का हमने सफाया कर दिया है। सब जानते हैं कि नक्सलपंथ संविधान, परम्परा, संस्कृति और कानून को नहीं मानते। उनका विचार हिंसा और सिर्फ हिंसा है। उनसे लड़ते हुए सुरक्षा बलों के हजारों नौजवान मारे गए हैं। वे राष्ट्रतोड़क हिंसावादी विचारधारा की मजबूती के लिए छद्म नामों से संगठन चलाते हैं। संविधान में उनकी आस्था नहीं है। देश को तोड़ने के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। वे स्वयं को विद्वान कहते हैं। उनकी दृष्टि में शेष भारतीय सांप्रदायिक और संस्कृतिविहीन हैं।


नक्सली विचारधारा मार्क्सवाद का विस्तार है। इस विचारधारा में हिंसा और हत्या जैसे कृत्य निंदनीय नहीं हैं। लेनिन ने लिखा था, ”उत्पीड़ित वर्गों द्वारा उत्पीड़न के खिलाफ, भूदासों द्वारा भूस्वामियों पर चलाए जाने वाले अभियान को पूर्णतः प्रगतिशील मानते हैं।” प्रगति प्रकाशन, मास्को द्वारा प्रकाशित पुस्तक में सब कुछ जायज माना गया है। इस विचारधारा से पैदा संगठनों का काम सुव्यवस्थित रूप में चलता है। पढ़ लिख सकने वाले लोग शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करते हैं। ये यत्र तत्र सर्वत्र हिंसक गतिविधियों का मनमाना विश्लेषण करते हैं। उन्हें समर्थन देते हैं। इनकी तुलना स्पेन के गृह युद्ध (1938) में प्रचलित फिफ्थ कॉलमिस्ट (पांचवां स्तंभ) से की जा सकती है।

फ्रेंको के जनरल ने कहा था, ”हमारे चार दस्ते मैड्रिड पर हमलावर हैं। पांचवां कॉलम पहले से ही शहर के भीतर मौजूद और सक्रिय है।” तभी एक विशेष प्रकार की पत्रकारिता को पांचवां स्तंभ कहा गया। भारत में पांचवें स्तंभकार (फिफ्थ कॉलमिस्ट) सक्रिय हैं। वे हिंसक गतिविधियों का औचित्य सिद्ध करने में लगे रहते हैं। जंतर मंतर की अराजकता वाले अंश का समर्थन करने वाले कथित बुद्धिजीवियों के लेख और विश्लेषण ऐसे ही थे। नक्सलपंथी अपने मिशन में सक्रिय हैं।

आईएसआई जैसी संस्थाओं से उनके रिश्ते हैं। कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुसार संसदीय राजनीति में गरीबों मजदूरों और सर्वहारा वर्ग का कोई हितसाधन संभव नहीं है। जनसंग्राम और जनयुद्ध में ही सर्वहारा वर्ग का हित है। मार्क्स ऐंगल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में सर्वहारा की लड़ाई का तत्व बताया था। इस लड़ाई में, ”सर्वहारा वर्ग केवल अपने को ही पुनर्जीवित नहीं करता। वह अपने साथ पूरी कौम और पूरे समाज को भी पुनर्जीवित करता है।

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प्रधानमंत्री ने ऐसी विचारधारा के लिए ‘दिमागी नक्सल‘ शब्द का प्रयोग किया है। स्वयं को सर्वाधिक शिक्षित और विद्वान मानने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदम्बरम ने फौरन प्रतिक्रिया दी और कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। तमाम अन्य लोगों ने भी प्रतिक्रियाएं दी हैं। दिमागी नक्सल विचारधारा के लोगों ने भारत को कभी एक राष्ट्र नहीं माना। उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा और दर्शन का मजाक बनाया है। यहाँ के समाज को आत्महीन और पिछड़ा बताया है। उनके ज्ञान का सदुपयोग कांग्रेस करती आई है। सोची समझी रणनीति के तहत वे भारतीय श्रद्धा वाले महापुरुषों और प्रतीकों का अपमान करते रहे हैं। श्रीराम और  श्रीकृष्ण को कल्पना बताते रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के परिसर में भारत विरोधी नारेबाजी के तार ’भारत तेरे टुकड़े होंगे’ तक विस्तृत है। वे संवैधानिक संस्थाएं नहीं मानते। वे न्यायपालिका का आदर नहीं करते। कार्ल मार्क्स, लेनिन और माओत्सेतुंग इनके देवता हैं।


इसी विचार के लोगों ने महात्मा गांधी तक को गालियाँ दी थीं। हिंसा ही उनकी दृष्टि में सारी समस्याओं का समाधान है। वे कथित रूप में सर्वहारा की तानाशाही लाना चाहते हैं। भिन्न भिन्न नामों से काम करते हैं और हिंसा का प्रचार करते हैं। नक्सलपंथ भी इसी नाम बदलने की शैली से विकसित हुआ है। पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी में दो वर्गों में संघर्ष हुआ। इन्हीं लोगों ने एक गुट को संरक्षण दिया। इस काण्ड में तमाम हत्याएं हुई थीं। इन लोगों ने नक्सलबाड़ी गांव में हुए इस संघर्ष का नाम नक्सलपंथ रखा। नक्सलपंथ माओ से प्रेरित है। हिंसा और हत्या, लूटपाट और डकैती इनके सामान्य हथियार हैं। विश्वविद्यालय इस विचारधारा के प्रचार के लिए सरल और सुगम मार्ग प्रतीत होते हैं। दिल्ली के विश्वविद्यालय जब कब दिमागी नक्सली विचारधारा के प्रचार का अड्डा बन जाते हैं। जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन ने देश का ध्यान आकर्षित किया। इस प्रदर्शन में शामिल होने वाले छात्रों की मांग सुचितापूर्ण परीक्षा से जुड़ी हुई थी। लेकिन उपस्थित नौजवानों का एक वर्ग संसद, प्रधानमंत्री और न्यायपालिका पर भी टिप्पणियां कर रहा था।


आन्दोलन लोकतांत्रिक अधिकार है। संविधान में विचार अभिव्यक्ति की आजादी का स्पष्ट उल्लेख है। लेकिन उसी अनुच्छेद 14 (1) में इस आजादी को लोकव्यवस्था के अधीन संयमित किया गया है। अनुशासित आन्दोलन लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। ऐसे अनुशासित आन्दोलन होते ही रहने चाहिए। लेकिन संसद, प्रधानमंत्री आदि संस्थाओं की गरिमा महिमा का अतिक्रमण संविधान सम्मत नहीं है। किसी भी आन्दोलनकारी को देश की संवैधानिक संस्थाओं को लतियाने की छूट नहीं दी जा सकती। कार्यपालिका संविधान चुनावी जनादेश के अधीन कार्य करती है। हजार दो हजार लोगों की भीड़ कार्यपालिका से जबरदस्ती कार्य नहीं करा सकती। आन्दोलनकारियों की मांगों पर विचार करना निर्वाचित सरकार का कर्तव्य है। स्वस्थ लोकतंत्र में ऐसे आन्दोलन जरूरी होते हैं। लेकिन वामपंथी हिंसा के माध्यम से ही सारी समस्याओं का समाधान चाहते हैं। हम संविधानविहीन राष्ट्र की कल्पना भी नहीं कर सकते। दिमागी नक्सली राज्यविहीन समाज चाहते हैं। वे संविधान का दुरुपयोग करते हैं, गलत व्याख्या करते हैं। धरना प्रदर्शनों में संविधान की प्रति दिखाते रहते हैं। उनका कोई देश नहीं होता। उनसे विचारधारा के आधार पर निपटना जरूरी है।


आइए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कुछ प्रसंगों को ध्यान में लेते हैं। संसद हमले के मुख्य आरोपी आतंकी अफजल गुरु को फांसी हुई थी। इस फांसी के विरोध में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सभा हुई। इस कार्यक्रम में भारत विरोधी नारेबाजी की गई। इन लोगों ने ’भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे राष्ट्रघाती नारे लगाए। नारेबाजी में ’अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’, ’तुम कितने अफजल मारोगे घर-घर से अफजल निकलेगा’ जैसे नारों से देश शर्मिंदा हुआ था। इसी नारेबाजी में ’ब्राह्मणवाद से आजादी’, ’मनुवाद से आजादी’, ’राष्ट्रवाद से आजादी’ जैसे आपत्तिजनक नारे भी लगे थे। ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र इकाई है। उपर्युक्त विवादित कार्यक्रम में कन्हैया कुमार, उमर खालिद, शेहला राशिद जैसे छात्रनेता देशतोड़क जमात में थे। देश के नक्सल प्रभावित राज्यों से इस विचारधारा का सफाया हो गया है। लेकिन ये लोग वेश बदलकर छोटे मोटे आंदोलनों में घुसपैठ कर जाते हैं। इनसे सतर्क रहना आवश्यक है।

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