
लखनऊ। स्कूल की टूटी छत से शुरू हुई कहानी डिग्री लेकर बेरोजगार खड़े युवा तक पहुंचती है। यही भारत की शिक्षा व्यवस्था का सबसे कड़वा सच है। आज बच्चे पंखा, पानी, शिक्षक, सड़क और शौचालय के लिए सड़क पर हैं। कल यही बच्चे डिग्री लेकर नौकरी की कतार में होंगे। फर्क सिर्फ इतना होगा कि आज वे व्यवस्था से पढ़ने लायक स्कूल मांग रहे हैं, कल जीने लायक रोजगार मांगेंगे। सवाल यह है कि सरकार उस बच्चे की आवाज कब सुनेगी जब वह स्कूल के बाहर नारा लगा रहा है या तब, जब लाखों युवाओं की भीड़ में सरकारी नौकरी का फॉर्म भर रहा होगा?जुलाई और अगस्त 2026 में देश के अलग-अलग राज्यों से बच्चों के विरोध की जो तस्वीरें सामने आईं, वे मामूली नहीं हैं।
फतेहपुर में सैकड़ों छात्रों ने बिजली, पंखे, पीने के पानी और खराब व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाई। हमीरपुर में करीब 300 बच्चे स्कूल तक पक्की सड़क की मांग को लेकर छह किलोमीटर पैदल चले। लखनऊ में छात्राओं ने शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का सवाल उठाया। गया के सिमुआरा मिडिल स्कूल के करीब 50 बच्चे चार किलोमीटर पैदल चलकर अधिकारियों तक पहुंचे। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और पंजाब तक एक जैसी शिकायतें सुनाई दीं। कोई नई इमारत नहीं मांग रहा था। कोई महंगी मशीन नहीं मांग रहा था। बच्चे बस इतना कह रहे थे स्कूल को स्कूल बना दो।
यहां सरकारी आंकड़े सरकार के लिए ढाल कम और आईना ज्यादा हैं। यूडायस प्लस 2025-26 के अनुसार देश में 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक है। इन स्कूलों में 29 लाख से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। एक शिक्षक को कई कक्षाओं को पढ़ाना है, उपस्थिति देखनी है, सरकारी कागज भरने हैं और पूरे स्कूल की जिम्मेदारी भी उठानी है। दूसरी तरफ 5,663 स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी बच्चा नामांकित नहीं है, लेकिन वहां 20,667 शिक्षक तैनात हैं। इससे साफ है कि समस्या केवल शिक्षकों की कमी नहीं है। असली बीमारी व्यवस्था की नब्ज में है। जहां जरूरत है, वहां शिक्षक नहीं।
जहां बच्चे नहीं, वहां शिक्षक मौजूद हैं। यह कमी नहीं, बंटवारे की विफलता है।सरकार कह सकती है कि तस्वीर सुधर रही है। बिजली वाले स्कूलों का अनुपात बढ़कर 95 प्रतिशत हो गया है। पीने के पानी की सुविधा 99.5 प्रतिशत स्कूलों तक पहुंच गई है। लड़कियों के लिए शौचालय 98.5 प्रतिशत और लड़कों के लिए 97.2 प्रतिशत स्कूलों में हैं। ये आंकड़े निश्चित रूप से प्रगति बताते हैं। लेकिन प्रतिशत का खेल उस बच्चे की परेशानी नहीं मिटाता, जिसके स्कूल में बिजली होने के बावजूद पंखा नहीं चलता। राष्ट्रीय औसत की सबसे बड़ी चाल यही है कि वह लाखों बच्चों की परेशानी को एक छोटे प्रतिशत में बदल देता है।
पांच प्रतिशत स्कूलों में बिजली नहीं है, यह आंकड़ा सुनने में छोटा लगता है। लेकिन 14 लाख से अधिक स्कूलों वाले देश में पांच प्रतिशत हजारों स्कूल होते हैं। वहां पढ़ने वाला बच्चा प्रतिशत नहीं जानता। वह बस गर्मी में बैठता है। जिस स्कूल में पानी गंदा है, वहां 99.5 प्रतिशत की उपलब्धि का कोई मतलब नहीं। जिस शौचालय में ताला लगा है या सफाई नहीं, वहां कागज पर बनी सुविधा बच्चे की जरूरत पूरी नहीं करती। शिक्षा का असली हिसाब यह नहीं कि कितने स्कूलों में सुविधा दर्ज है। असली सवाल यह है कि सुबह स्कूल पहुंचने पर बच्चा उसे इस्तेमाल कर सकता है या नहीं।
डिजिटल शिक्षा की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं। देश के केवल 67.4 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट है और 69.9 प्रतिशत में कंप्यूटर की सुविधा दर्ज है। डिजिटल पुस्तकालय केवल 7.1 प्रतिशत स्कूलों तक सीमित है। ऐसे समय में जब दुनिया तेजी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीक की तरफ बढ़ रही है, देश का बड़ा हिस्सा अभी इंटरनेट की दहलीज पर खड़ा है। एक बच्चा घर में कंप्यूटर, तेज इंटरनेट और अलग से प्रशिक्षण के साथ पढ़ रहा है। दूसरा बच्चा स्कूल में बिजली और पंखे की मांग कर रहा है। फिर दोनों से एक जैसी दौड़ में उतरने की उम्मीद की जाती है। इसे समान अवसर कहना सच्चाई से आंख चुराना है।
दिव्यांग बच्चों की स्थिति और ज्यादा सवाल खड़े करती है। करीब 79.7 प्रतिशत स्कूलों में रैंप हैं, लेकिन दिव्यांग बच्चों के अनुकूल शौचालय केवल 40.1 प्रतिशत स्कूलों में हैं। जयपुर में दिव्यांग छात्रों का विरोध इसी अधूरी व्यवस्था की तरफ इशारा करता है। सरकार रैंप बनाकर सुविधा पूरी मान लेती है, लेकिन बच्चा स्कूल के भीतर अपनी बाकी जरूरतें कैसे पूरी करेगा, यह सवाल पीछे छूट जाता है। पहुंच केवल दरवाजे तक पहुंचने का नाम नहीं है। सम्मान के साथ पूरी शिक्षा पाने का नाम है।यहीं से कहानी स्कूल की दीवार पार करती है और कॉलेज तक पहुंचती है। कमजोर बुनियाद वाला बच्चा किसी तरह बारहवीं पास करता है। फिर बीए, बीकॉम या बीएससी में दाखिला लेता है।
डिग्री मिलती है और उसके बाद सामने खड़ा होता है नौकरी का बाजार। नीति आयोग की 18 अगस्त 2026 की रिपोर्ट ने इस अगले संकट की परत खोल दी। रिपोर्ट के अनुसार केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार पा सके। देश में करीब 3 करोड़ 40 लाख छात्र स्नातक पाठ्यक्रमों में हैं। इनमें बड़ी संख्या सामान्य डिग्रियों में पढ़ रही है। डिग्री बढ़ रही है, लेकिन उसके साथ काम करने की क्षमता उसी गति से नहीं बढ़ रही।
रिपोर्ट का सबसे परेशान करने वाला निष्कर्ष यह है कि पढ़ाई और रोजगार की जरूरतों के बीच बड़ी खाई है। करीब 34 प्रतिशत छात्र कौशल की कमी को गंभीर समस्या मानते हैं। 18 प्रतिशत छात्र साक्षात्कार की तैयारी को लेकर परेशान हैं। लगभग 80 प्रतिशत छात्रों ने व्यावहारिक और कामकाजी अनुभव की कमी को बड़ी कमजोरी बताया। एक छात्र अर्थशास्त्र पढ़ता है, लेकिन उसे कंपनी में उसका इस्तेमाल नहीं आता। वाणिज्य का छात्र हिसाब-किताब जानता है, लेकिन कामकाजी सॉफ्टवेयर का अनुभव नहीं।
राजनीति विज्ञान का छात्र सिद्धांत जानता है, लेकिन शोध और नीतियों के व्यावहारिक विश्लेषण की तैयारी कमजोर है।यही वजह है कि डिग्री लेकर निकलने वाला युवा अक्सर सरकारी नौकरी की तरफ दौड़ता है। नवंबर 2024 से जुलाई 2025 के बीच 55 हजार सरकारी पदों के लिए 1 करोड़ 86 लाख आवेदन आए। यह सिर्फ बेरोजगारी का आंकड़ा नहीं है। यह उस शिक्षा व्यवस्था पर फैसला है, जो युवाओं को वैकल्पिक रास्तों के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पाई। डिग्री पात्रता देती है, लेकिन क्षमता नहीं। फिर युवा सालों तक एक परीक्षा के पीछे भागता है, क्योंकि उसके पास दूसरा भरोसेमंद रास्ता नहीं होता।
इस पूरी बहस का सबसे असहज सवाल सरकारी स्कूलों पर भरोसे का है। सरकारी शिक्षक का बच्चा निजी स्कूल में पढ़े, अधिकारी का बच्चा निजी स्कूल में पढ़े और मंत्री का बच्चा भी निजी स्कूल चुने, तो सरकारी स्कूल की बदहाली पर वास्तविक दबाव कौन बनाएगा? निजी स्कूल में पढ़ाना अपराध नहीं और किसी अभिभावक के चुनाव पर रोक नहीं होनी चाहिए। लेकिन जो लोग सरकारी शिक्षा की व्यवस्था चलाते हैं, अगर उनका अपना भरोसा ही उससे उठ जाए, तो सुधार की आग किसके भीतर जलेगी?गरीब बच्चे के पास यह विकल्प नहीं होता। उसके स्कूल में शिक्षक नहीं है तो वह महंगी पढ़ाई का सहारा नहीं ले सकता।
कंप्यूटर नहीं है तो घर में दूसरा नहीं मिलता। अंग्रेजी या तकनीकी कौशल कमजोर है तो अतिरिक्त प्रशिक्षण उसकी पहुंच से बाहर है। दूसरी तरफ संसाधनों वाले परिवारों के बच्चे बेहतर स्कूल, अतिरिक्त प्रशिक्षण और अनुभव के साथ आगे निकल जाते हैं। फिर दोनों एक ही परीक्षा में बैठते हैं और व्यवस्था इसे बराबरी की दौड़ कहती है।भारत को अब स्कूलों की संख्या नहीं, शिक्षा की गुणवत्ता पर बहस करनी होगी। हर स्कूल में शिक्षक हो, सुविधाएं सिर्फ कागज पर नहीं, रोज चलती हुई मिलें। बच्चों को रटने के साथ काम करने, सोचने, संवाद करने और नई तकनीक समझने की क्षमता मिले। कॉलेज की डिग्री को रोजगार, प्रशिक्षण और वास्तविक अनुभव से जोड़ा जाए।आज बच्चा पंखा मांग रहा है। कल वही युवा नौकरी मांगेगा। अगर स्कूल की पहली आवाज नहीं सुनी गई, तो बेरोजगारी की अगली चीख और तेज होगी। भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने अब सवाल एक ही है बच्चों को सिर्फ डिग्री देनी है या भविष्य भी देना है?



