वंदेमातरम क्यों बना राजनीतिक विवाद का विषय?

सौरभ वार्ष्णेय
सौरभ वार्ष्णेय



वंदेमातरम केवल दो शब्दों का उच्चारण नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों, राष्ट्रभक्ति की भावना और उस दौर के संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। यह एक ऐसी ऊर्जा है जिसके गायन से देशभक्ति से वातावरण भी गुंजायमान हो जाता है। जिस गीत ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीयों में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना जगाने में भूमिका निभाई, वह आज राजनीतिक बहस और विवाद का विषय बन गया है। सवाल यह नहीं है कि वंदेमातरम् का सम्मान होना चाहिए या नहीं—उसका सम्मान भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में निर्विवाद रूप से होना चाहिए। असली सवाल यह है कि आखिर एक राष्ट्रीय भावना से जुड़े गीत को बार-बार राजनीतिक विवाद के केंद्र में क्यों खड़ा कर दिया जाता है? अभी १५ अगस्त को कांग्रेस के कार्यालय में फिर से इसको लेकर विरोधियों ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। यानी देशभक्ति को भी तराजू में तोला जा रहा है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह सह नहीं है। आज देश ८० वां स्वतंत्रता दिवस मना चुका है। आगामी दिवस जब २१ साल बाद देश १०० वां स्वतंत्रता दिवस मनायेगा तब भी हम देश को उंचाइयों पर ले जाने की जगह यह विवाद कर रहे होंगे। आज के राजनेताओं  को देश के लिए कुछ सोचना होगा।


भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी विविधता है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां, परंपराएं और विचारधाराएं सदियों से साथ-साथ रही हैं। स्वतंत्रता आंदोलन ने भी इसी विविधता को एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य में जोडऩे का काम किया था। वंदेमातरम् उसी दौर की राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण स्वर था। इसलिए जब इसे राजनीतिक बयानबाजी का हथियार बनाया जाता है, तो केवल एक गीत पर विवाद नहीं होता, बल्कि उस व्यापक राष्ट्रीय भावना पर बहस खड़ी हो जाती है, जिसने देश को स्वतंत्रता के संघर्ष में एकजुट किया था।


वंदेमातरम् की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में सामने आया। बाद में यह स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे उत्साह और संघर्ष की भावना के साथ अपनाया। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों में इसके उद्घोष ने लोगों में राष्ट्रीय भावना पैदा की। यही कारण है कि वंदेमातरम् को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है।


लेकिन इतिहास के साथ-साथ उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को भी समझना होगा। भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज था। राष्ट्रवादी आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए यह आवश्यक था कि देश के सभी समुदायों को उसमें बराबर का स्थान महसूस हो। वंदेमातरम् के कुछ अंशों की धार्मिक प्रतीकात्मकता को लेकर समय-समय पर आपत्तियां भी सामने आईं। इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने 1937 में यह निर्णय लिया कि सार्वजनिक अवसरों पर गीत के शुरुआती दो पदों का उपयोग किया जाए, जिन्हें अपेक्षाकृत अधिक स्वीकार्य माना गया। यह निर्णय बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व ने भी राष्ट्रीय एकता और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया था।
स्वतंत्र भारत में भी वंदेमातरम् को विशेष सम्मान मिला। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को इसे राष्ट्रगान के समान सम्मान देने की बात स्वीकार की। वहीं ‘जन गण मनÓ को राष्ट्रगान और वंदेमातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला। यानी भारत के संवैधानिक और राष्ट्रीय जीवन में दोनों की अपनी विशिष्ट पहचान बनी। समस्या तब पैदा होती है, जब इस ऐतिहासिक संतुलन को राजनीतिक बहस में बदलकर यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि कौन अधिक राष्ट्रवादी है और कौन कम।


राष्ट्रभक्ति किसी एक गीत, नारे या प्रतीक तक सीमित नहीं हो सकती। देश के प्रति सम्मान का अर्थ संविधान के प्रति निष्ठा, कानून का सम्मान, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, कर्तव्यों का पालन और राष्ट्रहित में ईमानदार योगदान भी है। यदि कोई व्यक्ति वंदेमातरम् का सम्मान करता है तो यह उसकी राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति की राष्ट्रभक्ति को केवल इस आधार पर मापना कि वह किसी विशेष अवसर पर किस तरह का नारा लगाता है, लोकतांत्रिक समाज के लिए स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, यह भी सही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना समाज में बनी रहनी चाहिए। किसी राष्ट्रीय गीत या स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रतीक का जानबूझकर अपमान करना भी उचित नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। इसलिए वंदेमातरम् के सम्मान और उसके राजनीतिक दुरुपयोग—दोनों के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।


आज राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इतिहास को समझें, उसे चुनावी हथियार न बनाएं। वंदेमातरम् पर बहस यदि इतिहास, साहित्य, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में हो तो वह सार्थक हो सकती है। लेकिन यदि इसका इस्तेमाल विरोधी दल या किसी समुदाय को राष्ट्रविरोधी साबित करने के लिए किया जाए तो यह बहस समाज को जोडऩे के बजाय विभाजित करेगी। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न और है—क्या राष्ट्रवाद का अर्थ केवल भावनात्मक नारों तक सीमित हो जाना चाहिए? यदि देश में बेरोजगारी है, किसान अपनी आय को लेकर चिंतित है, युवा बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में है, सीमाओं की सुरक्षा चुनौतीपूर्ण है, शहरों में प्रदूषण बढ़ रहा है और गरीब व्यक्ति सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है, तो इन समस्याओं के समाधान के लिए काम करना भी राष्ट्रभक्ति है। सैनिक सीमा पर देश की रक्षा करता है, किसान खेत में अन्न पैदा करता है, शिक्षक नई पीढ़ी तैयार करता है, वैज्ञानिक अनुसंधान करता है और श्रमिक अपने श्रम से अर्थव्यवस्था को गति देता है। इन सभी के योगदान में राष्ट्रभक्ति दिखाई देती है।


दुर्भाग्य से हमारी राजनीतिक बहस में कई बार वास्तविक मुद्दों की जगह प्रतीकों को केंद्र में लाने की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई देती है। प्रतीकों की अपनी भूमिका है, लेकिन प्रतीक तभी सार्थक होते हैं जब उनके पीछे की भावना और जिम्मेदारी को भी समझा जाए। वंदेमातरम् का मूल संदेश मातृभूमि के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना से जुड़ा है। यदि हम इस भावना को समझ लें तो विवाद अपने आप छोटा हो सकता है। यह भी विचार करने की जरूरत है कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान स्वाभाविक होना चाहिए, राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं। देशभक्ति को आदेश से पैदा नहीं किया जा सकता। वह नागरिक के मन में इतिहास, शिक्षा, संस्कार और देश के प्रति अपनेपन की भावना से विकसित होती है। जब राष्ट्रप्रेम को राजनीतिक पहचान की कसौटी बना दिया जाता है, तब लोकतांत्रिक समाज में अनावश्यक तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।
वंदेमातरम के संदर्भ में राजनीतिक दलों को भी संयम दिखाना चाहिए।

सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि राष्ट्रवाद किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। विपक्ष को भी यह समझना होगा कि ऐतिहासिक राष्ट्रीय प्रतीकों को केवल राजनीतिक विरोध के लिए खारिज करना उचित नहीं है। दोनों पक्षों को इतिहास के प्रति सम्मान और वर्तमान के प्रति जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की राष्ट्रीय पहचान बहुस्तरीय है। इसमें वंदेमातरम है, जन गण मन है, तिरंगा है, संविधान है और स्वतंत्रता आंदोलन की असंख्य स्मृतियां हैं। इसमें शहीदेआजम भगत सिंह का साहस है, महात्मा गांधी का सत्याग्रह है, सुभाषचंद्र बोस का संघर्ष है, सरदार पटेल की एकता की भावना है और डॉ. आंबेडकर द्वारा निर्मित संवैधानिक लोकतंत्र की दृष्टि भी है। भारत को इनमें से किसी एक प्रतीक में सीमित नहीं किया जा सकता।


वंदेमातरम पर विवाद खड़ा करने से पहले हमें यह पूछना चाहिए कि क्या हम उस भारत की भावना को समझ रहे हैं, जिसके लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया था? वह भारत ऐसा था जिसमें विभिन्न समुदायों ने मिलकर विदेशी शासन का मुकाबला किया। स्वतंत्रता का संघर्ष किसी एक जाति, धर्म या भाषा का संघर्ष नहीं था। वह पूरे भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन था।  आज आवश्यकता इस बात की है कि वंदेमातरम् को विवाद का विषय बनाने के बजाय इतिहास और राष्ट्रीय चेतना के सम्मान के रूप में देखा जाए। जहां सम्मान आवश्यक है, वहां सम्मान हो; जहां संवैधानिक स्वतंत्रता का प्रश्न है, वहां संविधान सर्वोपरि हो; और जहां राजनीतिक मतभेद हों, वहां लोकतांत्रिक संवाद हो।


वंदेमातरम का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उसके नाम पर समाज में दूरी नहीं, बल्कि देश के प्रति साझा जिम्मेदारी की भावना मजबूत हो। राजनीति को राष्ट्रभावना से प्रेरणा लेनी चाहिए, राष्ट्रभावना को राजनीति का हथियार नहीं बनाना चाहिए। भारत की शक्ति उसकी विविधता में है और उसकी लोकतांत्रिक परंपरा का मूल संदेश भी यही है कि असहमति के बावजूद देश सबसे ऊपर रहे। इसलिए समय आ गया है कि वंदेमातरम को लेकर होने वाली बहस नारों की राजनीति से ऊपर उठे। इतिहास को इतिहास की तरह पढ़ा जाए, राष्ट्रीय प्रतीकों को सम्मान दिया जाए और लोकतांत्रिक अधिकारों को भी उतनी ही गंभीरता से समझा जाए। आखिरकार राष्ट्र केवल गीतों और नारों से नहीं बनता—राष्ट्र नागरिकों के विश्वास, संविधान की मर्यादा, सामाजिक सद्भाव और करोड़ों लोगों के ईमानदार योगदान से बनता है। वंदेमातरम् पर बहस हो तो भारत को जोडऩे के लिए हो, बांटने के लिए नहीं। यही उस गीत की ऐतिहासिक भावना के प्रति सच्चा सम्मान होगा।

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