79 साल का भारत:आजादी से आत्मनिर्भरता तक का सफर

हृदयनारायण दीक्षित


भारतीय स्वतंत्रता की उम्र 79 वर्ष हो गई है। किसी राष्ट्र के लिए स्वाधीनता की 100-200 वर्ष की उम्र भी बहुत नहीं होती। लेकिन भारत के लिए 79 वर्ष का राष्ट्रजीवन बहुत महत्वपूर्ण है। देश स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ का राष्ट्रीय उत्सव मना रहा है। उत्सव की बात स्वाभाविक है। लेकिन इसी अवसर पर देश को अपनी संवैधानिक संस्थाओं की गतिविधि पर भी ध्यान देना चाहिए। देश ने नवंबर 1949 में अपना संविधान अधिनियमित आत्मारपित किया था। संविधान निर्माण के समुद्र मंथन से एक पवित्र अमृत तत्व प्रकट हुआ था। देश और संविधान निर्माताओं ने इस अमर तत्व का नाम ’हम भारत के लोग’ रखा था। ’हम भारत के लोग’ हमारा सामूहिक परिचय है। ’हम भारत के लोग’ मिलजुल कर एक जन हैं। भारत जातियों और पंथों का गठजोड़ नहीं है। क्षेत्रीयताओं का योग भी राष्ट्र नहीं है। इस राष्ट्र के गठन का आधार संस्कृति है। यह संस्कृति सहस्त्रों वर्ष प्राचीन है। विशेष बात है एक सुनिश्चित भूखण्ड में इस संस्कृति की निरंतरता।


भारतीय संस्कृति में सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता है। भारत के लोग विषम परिस्थितियों में भी अपने देश की संप्रभुता के विरुद्ध कुछ भी सुनने को तैयार नहीं होते। एक राष्ट्र राज्य के रूप में भारत ने लगातार स्वयं को सुदृढ़ किया है। भारत का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण साथ साथ हुआ था। भारत शक्तिशाली होता गया और पाकिस्तान बिखर रहा है। भारत में उत्सव हैं और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भयानक सरकारी हिंसा है। बांग्लादेश में भी अशांति है। यूरोपीय उपनिवेश बाद से मुक्त हुए अनेक देश टूट गए। इथ¨पिया, सूडान आदि भी विघटन का शिकार हुए। पश्चिमी यूरोप का यूगोस्लाविया 7 देशों में टूट गया। पूर्व का सोवियत संघ 15 टुकड़ों में हो गया। यूक्रेन और मध्य पूर्व में अभी भी टूट फूट की प्रक्रिया जारी है। इधर हाल के दो दशकों में बने तमाम विकसित और विकासशील देश कई बारदिवालिया घोषित हुए। भारत की आर्थिक प्रतिष्ठा बनी रही। तमाम देशों में निर्वाचित सरकारों को फौजी तानाशाहों ने अपदस्थ किया। भारत में लोकतंत्र का सुंदर अनुशासन बना रहा। भारत एक राष्ट्र राज्य के रूप में अपनी संस्कृति के कारण अजर अमर और युवा राष्ट्र है।


संविधान निर्माता भारत के लोगों की जिजीविषा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सुपरिचित थे। संविधान सभा के सदस्य वैदिक परंपरा और लोकतांत्रिक मानस के जानकार थे। ऐसे महान राष्ट्र पर विदेशी तत्वों ने आक्रमण किया। इसका प्रतिरोध भी हुआ। लेकिन विदेशी सत्ता से लड़ाई लंबी चली। भारत का स्वाधीनता संग्राम सांस्कृतिक था। 1857 का स्वाधीनता संग्राम विश्व इतिहास का अनूठा युद्ध है। अंग्रेजी सत्ता डर गई थी। ब्रिटिश सत्ता अपनी वैधानिकता सिद्ध करना चाहती थी। ब्रिटिश संसद में 1857 के ठीक 1 वर्ष बाद भारत शासन अधिनियम 1858 बना।

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दरअसल अंग्रेज यह सिद्ध करना चाहते थे कि वे भारत पर शासन विधि के अनुरूप चलाते हैं। 1861 में भारतीय परिषद कानून बना। लेकिन स्वाधीनता की मांग बढ़ती गई। इसी बीच एक अंग्रेज अधिकारी ए ओ ह्यूम ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना की। 1892 में ब्रिटिश सत्ता ने भारतीय परिषद अधिनियम 1892 बनाया। 1909 में लार्ड मोर्ले और वायसराय मिन्टो के सुधार आए। नया भारतीय परिषद अधिनियम बना। सेना, विदेशी कार्य और देशी रियासतों को छोड़कर बाकी विषयों पर बहस करने की शक्ति विधान परिषद को मिली। परिषद का आकार बढ़ा। अफसरों की संख्या घटी। निर्वाचित लोगों की संख्या बढ़ी।


चुनाव के माध्यम से जीत कर आए सदस्यों की संख्या बढ़ी। यहीं सांप्रदायिकता का प्रवेश हुआ। मुस्लिम संप्रदाय के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान हुआ। ध्यान दीजिए मुस्लिम लीग 1906 में बनी और तीन वर्ष के अंदर ही उसे सफलता मिली। कांग्रेस 1885 में बनी थी। मुस्लिम लीग उसका राष्ट्रवाद 21 वर्ष के भीतर ही निगल गई। ब्रिटेन की संसद में फिर नया भारत अधिनियम आया। भारत में 2 तरह की सरकारों की व्यवस्था हुई। केन्द्र में 2 सदन बने। लेकिन सारी ताकत गवर्नर जनरल के पास थी। 1935 में नया भारत शासन अधिनियम आया। राजनीतिज्ञों के पद बढ़े। सीटें बढ़ीं। स्वाधीनता के अवसर पर इस छोटे से विचार को जान लेना जरूरी है। 1935 के भारत शासन अधिनियम की ज्यादातर बातें भारत शासन अधिनियम में हैं। 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन विचारणीय है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अंग्रेजों के खिलाफ थीं।


अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वाधीनता का दबाव बढ़ रहा था। भारत की सांस्कृतिक चेतना में विस्फोट था। अंग्रेजी सत्ता झुक गई। ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पारित हुआ। यह कानून गवाह है कि भारत को मिली स्वतंत्रता किसी क्रांति का परिणाम नहीं है। ब्रिटिश संसद ने 4 जुलाई 1947 के दिन स्वतंत्रता अधिनियम बनाया। इधर संविधान बन रहा था। देशवासी प्रसन्न थे कि अब भारत के पास अपनी संस्कृति आधारित राजव्यवस्था होगी। समतापूर्ण समाज होगा। विधि का शासन होगा। संवैधानिक संस्थाएं अपना अपना काम करेंगी। राजव्यवस्था संविधान का अनुसरण करेगी। भारत को भारत की नियति में विकसित होने का पूरा अवसर मिलेगा। लेकिन वैसा हुआ नहीं।


डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा के अंतिम भाषण में कहा था कि, ”भारत के पास अब अपना संविधान हो गया है। संविधान हमारे राष्ट्रजीवन के कार्य संचालन का संरक्षक होगा। हमें राष्ट्र निर्माण के लिए संविधान पर ही विश्वास करना चाहिए। हमें हिंसक आंदोलनों का सहारा नहीं लेना चाहिए। लेकिन देश के तमाम हिस्सों में आंदोलन हुए। हिंसक आंदोलनों से व्यापक राष्ट्रीय क्षति हुई है। आंदोलनों के माध्यम से जबरदस्ती अपनी बात मनवा लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जंतर मंतर पर हुआ कथित छात्र आंदोलन संविधान और विधि व्यवस्था के दायरे में नहीं था। सत्याग्रह और आंदोलन बेशक लोकतंत्र की शान होते हैं, लेकिन हिंसक उपायों से अपनी बात मनवाने की खतरनाक प्रवृत्तियां देखी जा रही हैं। संविधान ने जनादेश प्राप्त सरकारों को ही शासन का अधिकार दिया है। 1000-500 लोग पूरे भारत के प्रतिनिधि नहीं हो सकते। उनकी मांगें उचित या अनुचित हो सकती हैं, लेकिन पुलिस पर पत्थर चलाकर किसी भी समस्या का वास्तविक समाधान नहीं हो सकता।


संसद संप्रभु है। विधायिका में ही बजट पारण होता है। यही नए कानून बनते हैं। जरूरी हो तो यहीं संविधान संशोधन होता है। सरकार विधायिका के प्रति जवाबदेह है। यहीं विधायिका के ही सदनों में सरकार के प्रति विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव आते हैं। लेकिन हमारी विधायी संस्थाएं लगभग 35 वर्ष से निराश कर रही हैं। संसद और विधानमंडल के सदनों में एक दूसरे पर माइक फेंकने, अपशब्द कहने, गालीगलौज करने की घटनाएं आश्चर्य पैदा नहीं करतीं। महत्वपूर्ण    विधायी कार्यों का हुल्लड़ के बीच निपटारा आहतकारी है। सरकारें सदनों में विधेयक लाती हैं। भारी शोरगुल के बीच विधेयक पारित हो जाते हैं। महत्वपूर्ण विधायन पर भी कोई चर्चा नहीं होती। सदनों की कार्यवाही को बाधित करने के समाचार राष्ट्रजीवन को आहत करते हैं। बजट प्रावधानों पर भी चर्चा नहीं होती। क्या इस स्वाधीनता दिवस के पर्व पर हम अपनी संसदीय व्यवस्था पर आत्ममंथन की स्थिति में हैं?

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