मैं से हम तक..!

मैं से हम तक चल पड़े, बदले मन के भाव। मिल-जुलकर जब बाँट लें, आधा हो हर घाव॥

मैं की सीमा छोड़कर, हम का थामें हाथ। साथ चलें तो दूर हो, जीवन की हर रात

मैं-मैं करते रह गए, छूट गया संसार। हम बनकर जो जी लिए, मिल जाता परिवार॥

अपना सुख ही क्यों चुनें, बाँटें सबके भाग। दूजों के चेहरे खिले, मिटे हृदय का दाग॥

तेरा-मेरा छोड़कर, अपना मानें गाँव। मिल-जुलकर जब हम रहें, महके अपनी छाँव॥

एक अकेला दीप है, मिलकर बने उजास। एकता की लौ जले, मिटे मनों की प्यास॥

मैं छोटा या तू बड़ा, इससे क्या सम्मान। साथ खड़े जब हम रहें, ऊँचा हो इंसान॥

जाति-धर्म की दीवारें, मन से दें हम तोड़। मानवता की राह पर, प्रेम-सुमन दें जोड़॥

स्वार्थों की इस भीड़ में, बाँटें प्रेम अपार। ‘मैं’ से ‘हम’ तक जो बढ़े, वह सच्चा संसार॥

हाथ मिले तो राह में, पर्वत जाएँ टूट। मन से मन जब जुड़ गए, बंधन जाएँ छूट॥

मेरा तेरा भूलकर, सबका हो अधिकार। साझा श्रम, साझा खुशी, यह सच्चा व्यवहार॥

अहंकार की आग को, प्रेम करे निष्काम। ‘मैं’ मिटते ही ‘हम’ बने, सुंदर हो हर धाम॥

अपनेपन की छाँव में, खिलें सभी के फूल। ‘हम’ की शक्ति से मिटें, जीवन के सब शूल॥

‘मैं’ से ‘हम’ तक जो चले, बदले मन संसार। साथ-संगति, प्रेम से, जीवन हो गुलज़ार॥

—— डॉ. प्रियंका सौरभ

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