क्या जेन-जी को राहुल गांधी की ‘क्लास भा गई?

सौरभ वार्ष्णेय
सौरभ वार्ष्णेय


जिस नेता को वर्षों तक राजनीतिक विरोधियों ने ‘पप्पू कहकर खारिज करने की कोशिश की, उसी नेता की कक्षाओं में आज युवा बैठकर सवाल पूछ रहे हैं। राजनीति में इससे बड़ा व्यंग्य शायद ही कोई हो सकता है। लेकिन इसे केवल राहुल गांधी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में अचानक आई वृद्धि मान लेना भी जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि छात्रों, युवाओं और जेन-जी के एक हिस्से को राहुल गांधी की बातचीत, सवाल-जवाब और शिक्षा-केंद्रित राजनीति आकर्षित करने लगी है?


दरअसल, राजनीति में पीढिय़ों का बदलाव केवल नेताओं की उम्र बदलने से नहीं आता। बदलाव तब आता है जब नई पीढ़ी राजनीति की भाषा, मुद्दों और संवाद की शैली को बदल देती है। भारत की जेन-जी उसी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है। यह वह पीढ़ी है जो इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल तकनीक और त्वरित सूचना के वातावरण में बड़ी हुई है। इसे लंबे भाषणों से अधिक सीधे जवाब चाहिए। इसे नारे से अधिक तथ्य चाहिए और आश्वासन से अधिक परिणाम। यही कारण है कि आज का युवा यह पूछ रहा है कि शिक्षा महंगी क्यों है? रोजगार के अवसर सीमित क्यों हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार विवाद क्यों खड़े होते हैं? भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक क्यों चलती है? परीक्षा देने के बाद परिणाम के लिए महीनों इंतजार क्यों करना पड़ता है? और सबसे महत्वपूर्ण—युवाओं की आवाज नीति निर्माण की मेज तक आखिर क्यों नहीं पहुंचती?


राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी राजनीतिक शैली में एक महत्वपूर्ण बदलाव करने का प्रयास किया है। वे केवल मंच से भाषण देने वाले नेता की भूमिका में नहीं रहना चाहते। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, छात्रों, युवाओं, शिक्षकों और विभिन्न सामाजिक समूहों के साथ संवाद उनकी राजनीति का हिस्सा बना है। कई मौकों पर वे युवाओं के बीच बैठकर सवाल सुनते और जवाब देते दिखाई देते हैं। यही ‘क्लास वाली राजनीति शायद जेन-जी को कुछ हद तक आकर्षित कर रही है। लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। यह मान लेना कि पूरी जेन-जी राहुल गांधी के साथ खड़ी हो गई है, राजनीतिक विश्लेषण नहीं बल्कि राजनीतिक अतिशयोक्ति होगी। भारत का युवा किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। वह भाजपा को भी समर्थन दे सकता है, कांग्रेस को भी, क्षेत्रीय दलों को भी और किसी को भी नहीं। आज का युवा जिस तेजी से किसी नेता को पसंद करता है, उतनी ही तेजी से उससे सवाल भी पूछ सकता है।


राहुल गांधी की राजनीति को समझने के लिए उनकी सार्वजनिक छवि में आए बदलाव को भी देखना होगा। लंबे समय तक उनकी राजनीतिक छवि को उनके विरोधियों ने एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। ‘पप्पू जैसे राजनीतिक विशेषण इसी अभियान का हिस्सा रहे।लेकिन राजनीति में छवि स्थायी नहीं होती। नेता यदि लगातार अपनी शैली बदलता है, जनता के बीच जाता है और नए मुद्दों को उठाता है तो उसकी पुरानी छवि धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है। राहुल गांधी ने यात्राओं, छात्र संवादों और युवाओं के बीच प्रत्यक्ष बातचीत के माध्यम से स्वयं को ‘सवाल पूछने वाले नेताÓ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। यह रणनीति कितनी सफल हुई है, इसका अंतिम फैसला चुनाव ही करेंगे, लेकिन इतना जरूर है कि उनकी राजनीतिक प्रस्तुति में बदलाव दिखाई देता है। आज किसी नेता के भाषण को लाखों लोगों तक पहुंचने में घंटों नहीं लगते। एक वीडियो वायरल होता है, फिर उस पर समर्थन और विरोध दोनों शुरू हो जाते हैं। मीम बनते हैं, बहस होती है और कुछ ही समय में एक राजनीतिक संदेश देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच जाता है।

READ ALSO: मुख्यमंत्री ने ‘हर घर तिरंगा अभियान’ का किया शुभारम्भ


सोशल मीडिया की लोकप्रियता और चुनावी लोकप्रियता के बीच जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है। इसलिए राहुल गांधी के प्रति युवाओं में बढ़ती दृश्यता को सीधे चुनावी समर्थन में बदलकर देखना उचित नहीं होगा। राहुल गांधी की ‘क्लासÓ की चर्चा हो रही है, लेकिन जेन-जी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा रोजगार की है। एक छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है। परिवार उसकी पढ़ाई पर पैसा खर्च करता है। युवा अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष नौकरी पाने की उम्मीद में लगा देता है। फिर परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी का आरोप सामने आता है, पेपर लीक की खबर आती है, परिणाम अटक जाता है या भर्ती प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है।


उस समय युवा केवल राजनीतिक भाषण नहीं सुनना चाहता। उसे जवाब चाहिए। यही वह जगह है जहां किसी भी राजनीतिक दल की असली परीक्षा होती है। युवा पूछेगा—भर्ती कितने समय में पूरी होगी? परीक्षा प्रणाली कितनी पारदर्शी होगी? रिक्त पद कब भरे जाएंगे? शिक्षा की फीस कितनी होगी? सरकारी नौकरियां कितनी बढ़ेंगी? निजी क्षेत्र में रोजगार कैसे पैदा होगा? कौशल विकास का प्रशिक्षण नौकरी में कैसे बदलेगा?इन सवालों का उत्तर केवल सत्ता पक्ष को नहीं, विपक्ष को भी देना होगा। क्योंकि विपक्ष के लिए किसी समस्या को उठाना आसान है, लेकिन उसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना कहीं अधिक कठिन।


राहुल गांधी की राजनीति में संविधान का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है। वे लगातार संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और संस्थाओं की स्वतंत्रता जैसे विषयों को उठाते रहे हैं। युवा पीढ़ी के लिए संविधान अब केवल प्रतियोगी परीक्षाओं का विषय नहीं है। वह इसे अपने अधिकारों, स्वतंत्रता, समान अवसर और भविष्य से जोड़कर देखती है।लेकिन संविधान किसी एक राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी सभी की है। संविधान की सबसे बड़ी शक्ति भाषण में नहीं, बल्कि उसके मूल्यों के व्यवहार में दिखाई देती है। इसलिए युवाओं को संविधान की सबसे प्रभावी ‘क्लासÓ वही राजनीति दे सकती है जिसमें संस्थाओं का सम्मान हो, असहमति के लिए जगह हो और सवाल पूछने वाले नागरिक को दुश्मन न माना जाए।राहुल गांधी संविधान को राजनीतिक विमर्श का प्रमुख मुद्दा बनाकर एक संदेश दे रहे हैं। उनके समर्थक इसे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा मानते हैं, जबकि उनके विरोधी इसे राजनीतिक रणनीति बताते हैं। सच्चाई का मूल्यांकन जनता करेगी।


आज की युवा पीढ़ी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह स्थायी रूप से किसी की अनुयायी नहीं बनना चाहती। वह सवाल पूछती है।वह तुलना करती है। वह वीडियो देखती है।वह आंकड़े खोजती है। वह एक ही मुद्दे पर अलग-अलग नेताओं की राय सुनती है। और सबसे महत्वपूर्ण—वह अपनी राय बदलने से भी नहीं डरती। यही कारण है कि किसी भी नेता के लिए जेन-जी को प्रभावित करना आसान नहीं है। यदि राहुल गांधी की ‘क्लासÓ आज युवाओं को आकर्षित कर रही है तो कल वही युवा उनसे पूछ सकता है कि आपने जो कहा था, उसे लागू कैसे करेंगे? यही लोकतंत्र का स्वस्थ रूप है। राजनीति में युवा किसी नेता का स्थायी विद्यार्थी नहीं होना चाहिए। उसे हर नेता से सवाल पूछने वाला नागरिक होना चाहिए। युवाओं से संवाद करना अच्छी बात है। छात्रों के बीच बैठना अच्छी बात है। शिक्षा, रोजगार, संविधान और सामाजिक न्याय पर चर्चा करना भी आवश्यक है। लेकिन राजनीति की अंतिम परीक्षा संवाद में नहीं, परिणाम में होती है।


यदि कांग्रेस और राहुल गांधी युवाओं की समस्याओं को अपनी राजनीति का केंद्रीय विषय बनाना चाहते हैं तो उन्हें केवल भाषणों से आगे बढऩा होगा।उन्हें बताना होगा—रोजगार कैसे बढ़ेगा? शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव होगा? प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी? भर्ती प्रक्रिया की समयसीमा क्या होगी?युवाओं के लिए उद्यमिता के अवसर कैसे बढ़ेंगे? तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में नई नौकरियां कैसे पैदा होंगी?कौशल विकास को वास्तविक रोजगार से कैसे जोड़ा जाएगा?इन सवालों के ठोस जवाब ही किसी ‘क्लासÓ को राजनीतिक आंदोलन में बदल सकते हैं।क्योंकि जनता तालियों से अधिक रिपोर्ट कार्ड देखती है। यदि कांग्रेस वास्तव में राहुल गांधी की युवा-केंद्रित राजनीति को आगे बढ़ाना चाहती है तो उसे केवल राहुल गांधी पर निर्भर रहने की रणनीति से बाहर निकलना होगा।

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में युवाओं से निरंतर संवाद, रोजगार बाजार की बदलती जरूरतों को समझना, स्टार्टअप और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े युवाओं तक पहुंच बनाना, कृषि और ग्रामीण युवाओं की समस्याओं को समझना तथा डिजिटल पीढ़ी के लिए नई राजनीतिक भाषा विकसित करना—ये सब आवश्यक होंगे। इसलिए मूल सवाल यह नहीं है कि ‘क्या जेन-जी को राहुल गांधी की क्लास भा गई?Ó मूल सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या भारतीय राजनीति ने आखिरकार यह समझना शुरू कर दिया है कि युवा केवल वोट बैंक नहीं है? युवा देश की अर्थव्यवस्था का भविष्य है। वही वैज्ञानिक बनेगा, शिक्षक बनेगा, किसान बनेगा, उद्यमी बनेगा, सैनिक बनेगा, पत्रकार बनेगा और कल का जनप्रतिनिधि भी बनेगा। यदि उसकी शिक्षा कमजोर होगी, रोजगार असुरक्षित होगा, परीक्षा व्यवस्था पर विश्वास समाप्त होगा और अवसरों का वितरण असमान होगा तो इसका असर केवल युवा पर नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र पर पड़ेगा। इस लिहाज से राहुल गांधी की ‘क्लासÓ का महत्व राहुल गांधी से भी बड़ा हो सकता है—यदि वह युवाओं को किसी नेता का समर्थक बनने के बजाय सवाल पूछने वाला नागरिक बनाती है। लोकतंत्र में सबसे अच्छी स्थिति यह नहीं है कि युवा किसी एक नेता की बात आंख बंद करके मान ले।

सबसे अच्छी स्थिति यह है कि युवा हर नेता से सवाल पूछे। इसलिए जेन-जी को किसी एक नेता की ‘क्लासÓ का स्थायी विद्यार्थी बनने की जरूरत नहीं है। उसे लोकतंत्र की उस बड़ी क्लास में जाना चाहिए जहां शिक्षक कोई एक नेता नहीं, बल्कि संविधान हो; किताब किसी एक पार्टी का घोषणापत्र नहीं, बल्कि देश की वास्तविक समस्याएं हों; और परीक्षा हर पांच साल में नहीं, बल्कि हर दिन जनता के सवालों के सामनेहोती रहे। अगर राहुल गांधी की राजनीति युवाओं को इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित कर रही है तो यह केवल राहुल गांधी या कांग्रेस के लिए संकेत नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत उस दिन पैदा होती है जब युवा तालियां बजाने से पहले सवाल पूछता है— आपने कहा बहुत कुछ, अब बताइए—करेंगे क्या? यही वह सवाल है जिससे किसी भी नेता की असली ‘क्लास शुरू होती है और लोकतंत्र की असली परीक्षा भी।

Related Articles

Back to top button