घर आँगन की छाँव है, जीवन का विश्वास। ईंटों से बढ़कर सदा, रिश्तों भरी सुवास॥
दीवारों में कैद हैं, बचपन के सब राग। हँसी, खिलौने, स्वप्न सब, जगते हर अनुराग॥
लौट बुलाए हर घड़ी, मन का मधुर निवास— ईंटों से बढ़कर सदा, रिश्तों भरी सुवास॥
नए पात, नव ऋतु बदल, बदले जग का रंग। घर फिर भी संजोए रहे, स्मृतियों का संग॥
अपनेपन की छाप से, महके हर उल्लास— ईंटों से बढ़कर सदा, रिश्तों भरी सुवास॥
शहर बदलते रोज़ ही, बदले देश-जहान। घर ही देता हर समय, होने का प्रमाण॥
यहीं मिले पहचान की, सबसे गहरी प्यास— ईंटों से बढ़कर सदा, रिश्तों भरी सुवास॥
थका पथिक जब लौटता, पाता शीतल छाँव। ममता की उस गोद में, खिल उठते सब भाव॥
सुख-दुख दोनों बाँटता, घर का मधुर प्रकाश— ईंटों से बढ़कर सदा, रिश्तों भरी सुवास॥
‘सौरभ’ घर वह केंद्र है, जहाँ बसे संसार। जिससे मिलकर अर्थ लें, जीवन के विस्तार॥
घर आँगन की छाँव है, जीवन का विश्वास। ईंटों से बढ़कर सदा, रिश्तों भरी सुवास॥
—- – डॉ.सत्यवान सौरभ



