उपलब्धि है या चिंता का विषय फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन

प्रियंका सौरभ
डॉ.प्रियंका सौरभ

स्वास्थ्य किसी भी राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण पूँजी है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने रोगों के उपचार में अभूतपूर्व प्रगति की है और इस प्रगति का एक महत्वपूर्ण आयाम है विभिन्न औषधियों का संयुक्त उपयोग। अनेक रोग ऐसे होते हैं जिनके उपचार के लिए एक से अधिक दवाओं की आवश्यकता पड़ती है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन (एफडीसी) विकसित किए गए। एफडीसी ऐसी दवाएँ हैं जिनमें दो या दो से अधिक सक्रिय औषधीय घटकों को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर एक ही दवा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह टैबलेट, कैप्सूल, सिरप या इंजेक्शन किसी भी रूप में हो सकती है।

वर्तमान समय में एफडीसी चिकित्सा जगत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, क्षय रोग, एचआईवी संक्रमण, हृदय रोग, अस्थमा और विभिन्न प्रकार के संक्रमणों के उपचार में इनका व्यापक उपयोग किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कुछ परिस्थितियों में एफडीसी के उपयोग को उपयोगी मानता है। हालांकि इनके अनेक लाभ हैं, लेकिन इनके अनियंत्रित और अतार्किक प्रयोग ने गंभीर चिंताएँ भी उत्पन्न की हैं। विशेष रूप से भारत में एफडीसी के नियमन और गुणवत्ता को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है।

एफडीसी का मूल उद्देश्य उपचार को सरल बनाना है। जब किसी रोगी को दिन में कई बार अलग-अलग दवाएँ लेने की आवश्यकता होती है, तो वह कई बार खुराक भूल जाता है या दवाएँ नियमित रूप से नहीं लेता। इससे उपचार की सफलता प्रभावित होती है। यदि वही दवाएँ एक ही गोली में उपलब्ध हों तो रोगी के लिए उन्हें लेना आसान हो जाता है। यही कारण है कि एफडीसी को रोगी-अनुपालना बढ़ाने वाला एक प्रभावी साधन माना जाता है।

एफडीसी का सबसे बड़ा लाभ रोगी की सुविधा है। एक ही गोली में कई दवाएँ होने के कारण दवा लेने की प्रक्रिया सरल हो जाती है। विशेष रूप से वृद्ध रोगियों, बच्चों और लंबे समय तक उपचार लेने वाले व्यक्तियों के लिए यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। जब दवाओं की संख्या कम हो जाती है तो रोगी द्वारा उपचार छोड़ने की संभावना भी कम हो जाती है। यह लाभ क्षय रोग और एचआईवी जैसी बीमारियों में अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जहाँ उपचार का अधूरा रह जाना गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

एफडीसी का दूसरा महत्वपूर्ण लाभ उपचार की प्रभावशीलता में वृद्धि है। कई रोगों में अलग-अलग दवाएँ मिलकर बेहतर परिणाम देती हैं। उदाहरण के लिए, क्षय रोग के उपचार में अनेक दवाओं का संयुक्त उपयोग आवश्यक होता है क्योंकि एक ही दवा से उपचार करने पर जीवाणुओं में प्रतिरोध विकसित हो सकता है। इसी प्रकार एचआईवी संक्रमण में भी बहु-दवा चिकित्सा मानक उपचार का हिस्सा है। ऐसे मामलों में एफडीसी उपचार को सरल और अधिक प्रभावी बनाती है।

एफडीसी का एक और लाभ दवा प्रतिरोध को नियंत्रित करना है। वर्तमान समय में प्रतिजैविक प्रतिरोध एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। यदि रोगी आवश्यक दवाओं में से किसी एक को छोड़ देता है तो रोगाणुओं में प्रतिरोध विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है। एफडीसी इस समस्या को कम करने में सहायता करती हैं क्योंकि सभी आवश्यक दवाएँ एक साथ दी जाती हैं। इससे रोगी किसी एक दवा को छोड़ नहीं सकता और उपचार अधिक प्रभावी रहता है।

आर्थिक दृष्टि से भी एफडीसी कई बार लाभकारी सिद्ध होती हैं। अलग-अलग दवाओं की तुलना में संयुक्त दवा के उत्पादन, पैकेजिंग, परिवहन और वितरण की लागत कम हो सकती है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ भी घटता है। बड़े सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में एफडीसी के उपयोग से दवाओं के प्रबंधन और आपूर्ति व्यवस्था को भी सरल बनाया जा सकता है।

एफडीसी स्वास्थ्य प्रशासन के लिए भी उपयोगी हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में जब बड़ी संख्या में रोगियों को दवाएँ उपलब्ध करानी होती हैं, तब अलग-अलग दवाओं के स्थान पर एक संयुक्त दवा का वितरण अधिक सुविधाजनक होता है। इससे भंडारण की आवश्यकता कम होती है तथा दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने में आसानी होती है।

इन लाभों के बावजूद एफडीसी से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। सबसे महत्वपूर्ण समस्या खुराक में लचीलेपन का अभाव है। प्रत्येक रोगी की आवश्यकता अलग होती है। कई बार चिकित्सक किसी एक दवा की मात्रा बढ़ाना या घटाना चाहता है, लेकिन एफडीसी में ऐसा करना संभव नहीं होता क्योंकि सभी घटक निश्चित अनुपात में होते हैं। परिणामस्वरूप रोगी को या तो पूरी दवा बदलनी पड़ती है या ऐसी खुराक लेनी पड़ती है जो उसकी आवश्यकता के अनुरूप नहीं होती।

एफडीसी का दूसरा प्रमुख दोष यह है कि इनके कारण दुष्प्रभावों की पहचान कठिन हो जाती है। यदि किसी रोगी को संयुक्त दवा लेने के बाद एलर्जी या अन्य प्रतिकूल प्रभाव होता है तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि किस घटक ने समस्या उत्पन्न की है। इससे उपचार की प्रक्रिया जटिल हो सकती है और रोगी की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या अनावश्यक औषधि सेवन की है। कई बार रोगी को एफडीसी में सम्मिलित सभी दवाओं की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी उसे पूरा संयोजन लेना पड़ता है। इससे दुष्प्रभावों का जोखिम बढ़ जाता है और रोगी अनावश्यक रूप से अतिरिक्त दवाओं के संपर्क में आ जाता है। चिकित्सा विज्ञान का मूल सिद्धांत है कि रोगी को केवल वही दवा दी जाए जिसकी उसे आवश्यकता हो, लेकिन अतार्किक एफडीसी इस सिद्धांत के विपरीत जा सकती हैं।

भारत में एफडीसी से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता अतार्किक संयोजनों की रही है। लंबे समय तक बाजार में ऐसी अनेक दवाएँ उपलब्ध रहीं जिनके संयोजन का कोई स्पष्ट वैज्ञानिक आधार नहीं था। कुछ मामलों में दवाओं के घटक एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ाने के बजाय कम कर देते थे, जबकि कुछ संयोजन रोगियों के लिए अनावश्यक जोखिम उत्पन्न करते थे। इस स्थिति ने दवा नियमन व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया।

प्रतिजैविक दवाओं के अतार्किक संयोजन विशेष रूप से चिंता का विषय रहे हैं। इनका अनुचित उपयोग जीवाणुओं में प्रतिरोध को बढ़ावा देता है। जब प्रतिजैविक दवाएँ प्रभावहीन होने लगती हैं तो सामान्य संक्रमणों का उपचार भी कठिन हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रतिजैविक प्रतिरोध को मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक माना है। इसलिए प्रतिजैविक एफडीसी के उपयोग में विशेष सावधानी आवश्यक है।

एफडीसी से जुड़ी चुनौतियों में नियामक व्यवस्था की जटिलता भी शामिल है। किसी नई एफडीसी को बाजार में लाने से पहले उसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और गुणवत्ता का पर्याप्त वैज्ञानिक परीक्षण होना चाहिए। यदि परीक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया कमजोर हो तो असुरक्षित या अप्रभावी दवाएँ बाजार में पहुँच सकती हैं। भारत में समय-समय पर केंद्र सरकार ने अनेक अतार्किक एफडीसी पर प्रतिबंध लगाया है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

भारत विश्व के सबसे बड़े औषधि उत्पादक देशों में से एक है और यहाँ एफडीसी का उपयोग अत्यंत व्यापक है। भारतीय दवा बाजार में हजारों प्रकार के एफडीसी उपलब्ध हैं। इनमें से कई वैज्ञानिक रूप से उचित हैं और रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी हैं, जबकि कुछ संयोजन केवल व्यावसायिक लाभ को ध्यान में रखकर विकसित किए गए प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से तर्कसंगत औषधि नीति की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं।

तर्कसंगत एफडीसी वही मानी जाती है जिसमें प्रत्येक घटक की स्पष्ट भूमिका हो, सभी घटक एक-दूसरे के पूरक हों, उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो तथा उनका संयुक्त उपयोग अलग-अलग उपयोग की तुलना में अधिक लाभकारी हो। यदि कोई संयोजन इन मानकों को पूरा नहीं करता तो उसे तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।

भविष्य की दृष्टि से भारत को एफडीसी के क्षेत्र में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। एक ओर इन दवाओं के वास्तविक लाभों को स्वीकार करना होगा, वहीं दूसरी ओर उनके दुरुपयोग और अतार्किक प्रयोग को रोकना होगा। इसके लिए दवा स्वीकृति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाना आवश्यक है। चिकित्सकों को तर्कसंगत औषधि उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए तथा रोगियों को भी जागरूक बनाया जाना चाहिए कि वे बिना चिकित्सकीय परामर्श के संयुक्त दवाओं का उपयोग न करें।

फार्माकोविजिलेंस अर्थात् दवाओं के दुष्प्रभावों की निगरानी प्रणाली को भी मजबूत करना आवश्यक है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किसी एफडीसी से संबंधित प्रतिकूल प्रभावों की समय रहते पहचान हो और आवश्यक नियामक कार्रवाई की जा सके। साथ ही प्रतिजैविक दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी रणनीतियाँ अपनानी होंगी।

अंततः कहा जा सकता है कि फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का एक महत्वपूर्ण और उपयोगी उपकरण हैं। उचित परिस्थितियों में इनका उपयोग रोगी की अनुपालना बढ़ाने, उपचार को सरल बनाने, दवा प्रतिरोध को कम करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं की दक्षता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किंतु इनके लाभ तभी सुनिश्चित किए जा सकते हैं जब उनका उपयोग वैज्ञानिक प्रमाणों, तर्कसंगत चिकित्सा सिद्धांतों और सुदृढ़ नियामक व्यवस्था के आधार पर किया जाए। अतार्किक एफडीसी न केवल रोगियों के लिए जोखिम उत्पन्न करती हैं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौतियाँ पैदा कर सकती हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि भारत में एफडीसी के विकास, स्वीकृति और उपयोग को वैज्ञानिकता, पारदर्शिता और रोगी हित के सिद्धांतों के अनुरूप संचालित किया जाए, ताकि चिकित्सा विज्ञान की यह महत्वपूर्ण उपलब्धि समाज के लिए वास्तविक कल्याण का माध्यम बन सके।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, 

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