मूर्तियाँ दूध पिएँ अगर, इसमें नहीं कमाल।
भूखे बच्चे तृप्त हों, होगा तभी धमाल॥
पत्थर दूध उँडेलते, बजते जय-जयकार।
सूखे होंठों से मगर, हार गया संसार॥
दरवाज़े भूखा खड़ा, किसको है यह ख्याल—
भूखे बच्चे तृप्त हों, होगा तभी धमाल॥
मंदिर में बहता दूध है, बाहर सूना थाल।
कूड़े में भोजन सड़े, भूखे हैं कंगाल॥
कैसा मानव, कैसा करम, कैसी यह है चाल—
भूखे बच्चे तृप्त हों, होगा तभी धमाल।
पत्थर को भगवान कह, करते खूब प्रणाम।
जीवित मानव भूलकर, करे धर्म का नाम॥
करुणा बिन पूजा सभी, केवल है जंजाल—
भूखे बच्चे मर रहे, किसको है यह ख्याल॥
जिस दिन भूखे पेट भी, पाए रोटी-दाल।
जिस दिन आँसू पोंछ दे, मानवता की ढाल॥
उस दिन कहना हो गया, सच्चा बड़ा कमाल—
भूखे बच्चे मर रहे, किसको है यह ख्याल॥
‘सौरभ’ धर्म वही बड़ा, जो बाँटे सम्मान।
रोटी, शिक्षा, प्रेम दे, रखे सभी का मान॥
पत्थर से पहले अगर, इंसाँ हो खुशहाल—
भूखे बच्चे तृप्त हों, होगा तभी धमाल॥
मूर्तियाँ दूध पिएँ अगर, कहते उसे कमाल।
भूखे बच्चे मर रहे, किसको है यह ख्याल॥
—- डॉ. सत्यवान सौरभ



