प्रकृति से दोस्ती:आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी

सुनील कुमार महला
सुनील कुमार महला

नीला ग्रह यानी कि यह पृथ्वी हमारा इकलौता घर है और इसकी सुरक्षा तथा संरक्षण किसी एक व्यक्ति, देश या संस्था की नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। यही संदेश प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस देता है।यदि इस दिवस को मनाने के प्रमुख उद्देश्यों की बात करें, तो इनमें प्रदूषण, वनों की कटाई, ग्लोबल वार्मिंग और जैव विविधता के ह्रास जैसे गंभीर मुद्दों के प्रति लोगों को जागरूक करना; सरकारों, उद्योगों और आम नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण हेतु ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करना; विकास के साथ सतत विकास की अवधारणा को बढ़ावा देना; तथा हर परिस्थिति में पृथ्वी के पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन सुनिश्चित करना शामिल है।

उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के लिए एक विशेष थीम निर्धारित की जाती है। वर्ष 2025 की थीम ‘प्रकृति के साथ हमारे संबंधों की पुनर्कल्पना’ रखी गई थी। दरअसल,यह थीम इस बात पर केंद्रित थी कि जिस प्रकार मानव प्रकृति का निरंतर दोहन कर रहा है, उसे बदलकर अधिक संतुलित और टिकाऊ दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। वहीं वर्ष 2026 की थीम ‘प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।’ निर्धारित की गई है। इस वर्ष का प्रमुख अभियान #नाऊ फोर क्लाइमेट है, जो जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देता है। साथ ही वर्ष 2026 के वैश्विक आयोजन की मेजबानी अज़रबैजान को सौंपी गई है। हाल फिलहाल,यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो पाठकों को बताता चलूं कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन के दौरान इसकी नींव रखी थी। यही वह अवसर था जब विश्व के देशों ने पहली बार पर्यावरण और मानव जीवन के पारस्परिक संबंधों पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया।

आधिकारिक रूप से पहला विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 1973 को मनाया गया था, जिसका मुख्य नारा(स्लोगन) ‘केवल एक पृथ्वी’ था। वास्तव में इस दिवस को मनाने का महत्व आज और अधिक बढ़ गया है। वैज्ञानिक चेतावनियों के अनुसार पृथ्वी का औसत तापमान खतरनाक स्तर अर्थात 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के निकट पहुंच रहा है। ऐसे में यह दिवस जलवायु संकट के प्रति दुनिया को सचेत करने वाले एक वैश्विक अलार्म की तरह कार्य करता है। वर्तमान में 150 से अधिक देश और करोड़ों लोग इस अभियान(पर्यावरण संरक्षण)से जुड़कर पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों में भाग लेते हैं। आज इस दिवस पर ग्रीन हाइड्रोजन जैसी स्वच्छ ऊर्जा तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग जैसे आधुनिक विषयों पर भी चर्चा की जा रही है। स्पष्ट है कि अब दुनिया का ध्यान ग्रीन टेक्नोलॉजी और सतत विकास की ओर तेजी से बढ़ रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि भारत भी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर देशभर में बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं, सिंगल-यूज प्लास्टिक पर रोक लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं तथा ‘श्री अन्न’ (मोटे अनाज/मिलेट्स) जैसी टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

किन्तु दूसरी ओर एक कटु सत्य यह भी है कि आज का आधुनिक मानव विकास के जिस रथ पर सवार है, उसकी गति जितनी तीव्र है, उसकी दिशा उतनी ही आत्मघाती प्रतीत होती है। हर वर्ष जून का महीना आते ही पर्यावरण संरक्षण को लेकर संगोष्ठियों, सेमिनारों और भाषणों का दौर आरंभ हो जाता है, मानो पूरा समाज प्रकृति को बचाने के लिए व्याकुल हो उठा हो। वातानुकूलित सभागारों में बैठकर, प्लास्टिक की बोतलों से पानी पीते हुए पर्यावरण की चिंता व्यक्त करना हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास बन चुका है। आज वास्तविकता यह है कि धरातल पर स्थितियां सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ती जा रही हैं। हमारा पर्यावरण प्रेम अक्सर एक दिन के दिखावे, सोशल मीडिया पोस्टों और अखबारों में तस्वीरें प्रकाशित करवाने तक सीमित रह जाता है। साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर चमचमाती कुदाल से, पानी डालते हुए पौधारोपण की तस्वीरें खिंचवाने वाले लोग अगले ही दिन उन पौधों को भूल जाते हैं।

पाठक जानते होंगे कि हमारे प्राचीन शास्त्रों में प्रकृति और मनुष्य के बीच अत्यंत आत्मीय संबंध का वर्णन मिलता है। मनीषियों ने कहा है कि ‘एक वृक्ष दस पुत्रों के समान होता है।’ इस कथन का आशय यह है कि जिस प्रकार एक नवजात शिशु को निरंतर स्नेह, संरक्षण और देखभाल की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार एक पौधे को भी वृक्ष बनने तक पालना और संरक्षित करना पड़ता है। दुर्भाग्यवश आज उपभोक्तावादी मानसिकता के दौर में हमने वृक्षों को ‘पुत्र’ मानना तो दूर, उन्हें केवल एक वार्षिक आयोजन की वस्तु बनाकर छोड़ दिया है। परिणामस्वरूप अधिकांश पौधे पर्याप्त देखभाल और पानी के अभाव में शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत, हमारे स्वार्थ की कोई सीमा नहीं रह गई है। आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में हमने हरे-भरे जंगलों, पर्वतों और प्राकृतिक वादियों को उजाड़कर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं। नदियों के प्राकृतिक मार्गों को अवरुद्ध करना, तालाबों को पाटकर कॉलोनियां बसाना तथा पहाड़ों का अंधाधुंध दोहन करना आज विकास का प्रतीक माना जाने लगा है। परिणामस्वरूप संपूर्ण प्राकृतिक चक्र असंतुलित हो गया है।

आज तथाकथित विकास का सबसे भयावह स्वरूप प्लास्टिक प्रदूषण के रूप में सामने आया है। सिंगल-यूज प्लास्टिक और पैकेज्ड पानी की बोतलों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। यह प्लास्टिक केवल भूमि को प्रदूषित नहीं कर रहा, बल्कि सूक्ष्म कणों अर्थात माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारी खाद्य श्रृंखला, जल और वायु के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर रहा है तथा स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। सच तो यह है कि सुख-सुविधाओं की असीमित चाहत ने पृथ्वी पर कार्बन फुटप्रिंट को इस सीमा तक बढ़ा दिया है कि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, नदियां सिकुड़ रही हैं और मौसम का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। आज न पहाड़ सुरक्षित हैं और न ही मैदान। प्रकृति चक्रवातों, बेमौसम वर्षा, सूखे और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के रूप में अपने साथ किए गए अन्याय का उत्तर दे रही है, जिन्हें हम सुविधानुसार ‘प्राकृतिक आपदा’ कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलना चाहते हैं। अब समय आ गया है कि हम कागजी प्रस्तावों, खोखले भाषणों और दिखावटी हरियाली के इस मायाजाल से बाहर निकलें। भाषणों और सेमिनारों का दौर बहुत हो चुका; अब आवश्यकता जमीनी जवाबदेही और वास्तविक कार्रवाई की है। यदि हम सचमुच अपनी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देना चाहते हैं, तो हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना होगा। पेड़ों को केवल लगाना ही नहीं, बल्कि बच्चों की तरह उनका पालन-पोषण भी करना होगा।

अंततः यही कहा जा सकता है कि विश्व पर्यावरण दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख या औपचारिक उत्सव नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। सरकारें कानून बना सकती हैं, संस्थाएं योजनाएं चला सकती हैं और कंपनियां बजट उपलब्ध करा सकती हैं, लेकिन वास्तविक परिवर्तन हमारे दैनिक जीवन के छोटे-छोटे निर्णयों से ही आएगा-चाहे वह बिजली की बचत हो, जल संरक्षण हो, प्लास्टिक का कम उपयोग हो या एक पौधे का रोपण और उसका संरक्षण। यदि आज भी हमारी कुंभकर्णी नींद नहीं टूटी और हमने प्रकृति के साथ इस खिलवाड़ को नहीं रोका, तो कंक्रीट के जिन जंगलों को हम आज अपनी उपलब्धि और प्रगति का प्रतीक मान रहे हैं, वही एक दिन हमारे अस्तित्व की कब्रगाह बन सकते हैं। प्रकृति के बिना मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए पृथ्वी को बचाना किसी और पर किया गया उपकार नहीं, बल्कि स्वयं को और आने वाली पीढ़ियों को बचाने की अंतिम पुकार है।

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