Sunday, May 31, 2026
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तबादला सीजन में पीडब्ल्यूडी का सेटिंग साम्राज्य सक्रिय

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तबादला सीजन में पीडब्ल्यूडी का सेटिंग साम्राज्य सक्रिय
तबादला सीजन में पीडब्ल्यूडी का सेटिंग साम्राज्य सक्रिय

तबादला सीजन में पीडब्ल्यूडी का सेटिंग साम्राज्य सक्रिय। दो दशक से जमे इंजीनियरों पर कब चलेगा नियमों का बुलडोजर ? सूत्रों की मानें तो पीडब्ल्यूडी में सक्रिय कुछ स्वयंभू ट्रांसफर विशेषज्ञ और कथित कलमकार बिचौलिया समूह इस बार तबादला सत्र को ही शून्य घोषित कराने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।

त्रिनाथ शर्मा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार लोक निर्माण विभाग में तबादला सत्र शुरू होते ही कुछ जूनियर इंजीनियरों की बेचैनी बढ़ गई है। वजह साफ है, वर्षों से कब्जाई गई मलाईदार कुर्सियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। विभाग में ऐसे भी महारथी मौजूद हैं जिन्होंने तबादला नीति को शायद सुझाव-पत्र समझ रखा है और 20-22 वर्षों से एक ही दफ्तर को अपनी पुश्तैनी जागीर की तरह संभाल रखा है। उधर बिचौलिया बिरादरी भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुकी है। सूत्रों का दावा है कि तबादला नीति लागू कराने से ज्यादा ऊर्जा उसे निष्प्रभावी बनाने में खर्च की जा रही है। सवाल यह है कि शासन का डंडा चलेगा या फिर सेटिंग का सिक्का ?


उत्तर प्रदेश सरकार प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करती रही है, लेकिन लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में चल रहे तबादला सत्र ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार राजधानी लखनऊ समेत विभाग के कई महत्वपूर्ण कार्यालयों में ऐसे जूनियर इंजीनियर तैनात हैं जो पिछले 20 से 22 वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि तबादला नीति के स्पष्ट नियम होने के बावजूद इन जूनियर इंजीनियरों की कुर्सियां आज तक नहीं हिलीं।
मानव सम्पदा पोर्टल पर लगभग 400 जूनियर इंजीनियरों द्वारा तबादले के लिए आवेदन किए जाने की चर्चा है। इनमें बड़ी संख्या उन जूनियर इंजीनियरों की है जो वर्षों से स्थानांतरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दूसरी ओर कुछ प्रभावशाली जूनियर इंजीनियरों अपनी वर्तमान तैनाती बचाने के लिए हर स्तर पर सक्रिय बताए जा रहे हैं। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि संपर्क, प्रभाव और बिचौलिया तंत्र के सहारे तबादलों को प्रभावित करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।


मलाईदार कुर्सियों पर स्थायी कब्जे का खेल

सबसे अधिक चर्चा निर्माण खंड-2 (सीडी-2) सहित विभाग के कुछ ऐसे कार्यालयों की है जिन्हें लंबे समय से मलाईदार और प्रभावशाली माना जाता है। सूत्रों का कहना है कि यहां कई जूनियर इंजीनियर दो दशक से अधिक समय से तैनात हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब सामान्य कर्मचारियों और अधिकारियों पर तबादला नीति पूरी कठोरता से लागू होती है, तब इन स्थायी महारथियों को विशेष संरक्षण आखिर किसके आशीर्वाद से प्राप्त है? प्रशासनिक व्यवस्था में लंबे समय तक एक ही स्थान पर तैनाती न केवल पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाती है बल्कि कार्यप्रणाली में हितों के टकराव और प्रभाव के स्थायी नेटवर्क को भी जन्म देती है। यही कारण है कि समयबद्ध तबादला व्यवस्था को सुशासन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।


प्रमुख सचिव कार्यालय के बाहर बढ़ी चहल-पहल

तबादला सत्र शुरू होते ही प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग कार्यालय के आसपास असामान्य हलचल की चर्चा भी विभाग में जोरों पर है। सूत्रों का दावा है कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग तबादलों को प्रभावित करने के उद्देश्य से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। इससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। गौरतलब है कि लोक निर्माण विभाग प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण विभागों में शामिल है और सीधे मुख्यमंत्री की निगरानी वाले विभागों में इसकी गणना होती है। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि तबादले पूरी तरह नियमों और शासन की मंशा के अनुरूप हों। यदि निर्धारित अवधि से कई गुना अधिक समय तक अधिकारी एक ही स्थान पर बने रहते हैं तो यह न केवल व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि अन्य कर्मचारियों के बीच भी असंतोष और निराशा पैदा करता है।


विभागीय जानकारों का मानना है कि शासन को मानव सम्पदा पोर्टल, तैनाती अवधि और विभागीय रिकॉर्ड का गहन परीक्षण कर ऐसे सभी मामलों की समीक्षा करनी चाहिए जहां अधिकारी वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। साथ ही तबादला प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के बाहरी प्रभाव, बिचौलिया तंत्र अथवा अनुचित हस्तक्षेप की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। सूत्रों की मानें तो पीडब्ल्यूडी में सक्रिय कुछ स्वयंभू ट्रांसफर विशेषज्ञ और कथित कलमकार बिचौलिया समूह इस बार तबादला सत्र को ही शून्य घोषित कराने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। मानो उन्हें अधिकारियों के तबादले की नहीं, बल्कि अपनी वर्षों पुरानी सेटिंग व्यवस्था के उजड़ जाने की चिंता सता रही हो। अब देखना यह है कि तबादला नीति का राज चलता है या फिर सेटिंग तंत्र एक बार फिर नियमों पर भारी पड़ता है।