झूठों के दरबार में,सच बैठा है मौन

झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन,

घेरे घोर उदासियाँ, सुनता उसकी कौन॥

मंचों पर सच हारता, झूठ करे अभिनंदन,

सिक्कों के इस खेल में, बिकता हर स्पंदन

न्याय बिके बाजार में, पूछे अब वह कौन—

झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥

चेहरों पर उजली हँसी, भीतर काला शोर,

मीठी वाणी ढाँपती, छल का गहरा छोर।

विश्वासों की राह में, बिखरे काँटे मौन—

झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥

सत्ता की चौखट तले, पलते झूठे आज,

सत्य सिसकता रह गया, सुनता नहीं समाज।

ईमानों की हार पर, हँसता झूठा कौन—

झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥

जागो अब इंसान तुम, तोड़ो यह संजाल,

सत्य-अग्नि जल उठे, मिट जाए जंजाल।

जब बोलेगा सत्य फिर, चुप न रहेगा कौन—

झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥

….. डॉ.सत्यवान सौरभ

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