स्वामी जी ने मुझे दिया पुनर्जीवन

श्याम कुमार

सीढ़ी पर जूते की भारी आवाज सुनाई दी तो मैं समझ गया कि कोई ऊपर आ रहा है। कुछ क्षण बाद एनसीसी का परिधान व बूट पहने एक लड़का सामने आकर खड़ा हो गया। प्रयागराज में परी भवन में मेरा कार्यालय-कक्ष प्रथम तल पर सीढ़ी से लगा हुआ था, जिसमें अपनी कुरसी पर बैठा हुआ मैं लिखने में व्यस्त था। मैं लोकप्रिय साप्ताहिक ‘जनसंसद’ का सम्पादक व प्रकाशक था और उसके लिए मैटर तैयार कर रहा था। मैंने उसे बैठ जाने का इशारा किया तो वह मेज की दूसरी ओर लगी हुई कुरसियों में एकदम पीछे जाकर बैठ गया।

मेरा दरवाजा सुबह छह बजे से खुल जाता था, जिसे रात ग्यारह बजे मैं बन्द करता था। सुबह से लोग आने लगते थे और रात तक आनेवालों का सिलसिला लगा रहता था। उनमें पत्रकार, कलाकार, कवि, लेखक, आदि तो होते ही थे, बड़ी संख्या उनलोगों की होती थी, जो अपनी समस्याएं लेकर आते थे। मैं अपने शहराराबाग, गोसाईं टोला, चक, लखपतराय लेन, बहादुरगंज, विवेकानंद मार्ग, मुहत्शिमगंज आदि कई मुहल्लों की क्षेत्र कल्याण समिति का अध्यक्ष था, अतः क्षेत्रवासी भी समस्याएं लेकर आते थे। मैं सुबह से रात तक अपनी कुरसी पर बैठा लिखतापढ़ता रहता था तथा इस बीच लोगों से बातचीत भी होती रहती थी। बीच में क्षेत्र की समस्याएं देखने के लिए कभी क्षेत्रवासियों के साथ तो कभी अकेले ही चक्कर लगा लिया करता था और नगरमहापालिका के अफसरों को बुलाकर समस्याओं का निस्तारण कराता था। दो घंटे के लिए स्टेनो भी आता था। कार्यालय-कक्ष एवं केसर सभागार के बीच में ड्राइंगरूम था।

वह लड़का जब मेरे पास आया तो उस समय कार्यालय में अन्य कोई नहीं था। वह बेहद उदास और तनाव में था और जैसे ही मैं लिखना बन्द कर उसकी ओर मुखातिब हुआ तो वह रोते हुए बोला कि वह आत्महत्या करने जा रहा है। मैं चौंका, किन्तु बातचीत में उसने बताया कि वह अपने पिता के गुस्सैल स्वभाव और अत्याचारों से बेहद ऊब गया है। उन्होंने घर को नरक बना रखा है और मारपीट करते रहते हैं। इसीसे तंग आकर वह आत्महत्या करने जा रहा है। उसने कहा कि बाहर ‘रंगभारती’ का बोर्ड एवं मेरी नामपट्टिका देखकर वह ऊपर चला आया है। वह कई पन्नों का एक खर्रा साथ लिए हुए था, जिसमें विस्तार में लिखा था कि पिता के अत्याचारों के कारण वह आत्महत्या करने जा रहा है।

मैं मनोविज्ञान का छात्र रहा था और उस विषय का मैंने वैसे भी विशेष अध्ययन किया था। उसी आधार पर मैं तमाम बिगड़े लड़कों को सही दिशा दे चुका था। इस लड़के को भी मैंने बहुत सान्त्वना दी और समझाया। मैंने उसे रचनात्मक कार्यों में अपने को व्यस्त रखने की प्रेरणा दी। उसने कला वर्ग से इन्टर किया था, अतः मैंने उसे आगे पढ़ाई करने को कहा। मैंने यह भी कहा कि उसकी जिन विषयों में रुचि हो, बीए में वही विषय ले। उसने बताया कि चित्रकला में उसकी अधिक रुचि है। वह लड़का अगले दिन पुनः आया और अन्य आगन्तुकों के साथ बैठा रहा। फिर वह नित्य आने लगा तथा उसने एक दिन बताया कि वह विश्वविद्यालय में बीए में प्रवेश लेने जा रहा है। मैंने उसकी जरूरत के मुताबिक उसकी आर्थिक मदद कर दी। मेरे कार्यालय में कई लोग नियमित रूप से आकर घन्टों बैठे रहते थे, जिनमें वह लड़का भी शामिल हो गया।

मेरे अनुज कैलाश वर्मा लखनऊ में राज्य मुख्यालय से मान्यताप्राप्त पत्रकार थे। तथा मेरी मां व पत्नी भी वहीं थीं। इसलिए मेरा लखनऊ आनाजाना लगा रहता था। प्रयागराज में मेरा मुख्य आहार दूध होता था तथा दूध व केले या पावरोटी के सहारे मैं आराम से रह लेता था। कभी खाने की इच्छा होती थी तो मैं सब्जी बना लेता था और पड़ोस में ओमप्रकाश केला के आवास के नीचे पटरी पर खाने का ढाबा लगानेवाले के यहां से कुछ रोटियां मंगा लेता था। वह बड़ी सफाई से खाना बनाता था।

उक्त आगन्तुक लड़का अपने शालीन एवं आज्ञाकारी व्यवहार से मेरा विश्वास जीतने लगा तथा धीरे-धीरे यह स्थिति हो गई कि वह मेरे यहां एक कमरे में रहने भी लगा। मेरे घर के नीचे पटरी पर बहादुर नामक नेपाली व्यक्ति रिक्शेवालों के लिए खाने की ठेलिया लगाता था। बहादुर मेरे लिए दूध, केला व पावरोटी ला दिया करता था। उसी को मैंने उस लड़के के लिए ऊपर रसोई में भोजन बना देने, उसके कपड़े साफ कर प्रेस करा देने आदि कार्यों की जिम्मेदारी सौंप दी तथा वेतन के रूप में चार सौ रुपए देने लगा।

लड़के ने अपना उपनाम ‘पापी’ रखा धा, जिसे बदलकर और उसका जातिचिन्ह हटाकर मैंने साहित्यिक उपनाम रख दिया। उसके आग्रह पर मैंने उसे स्कूटर सिखा दिया, जिससे वह इधरउधर जाने लगा। मेरे स्कूटर पर ‘पत्रकार’ लिखा हुआ था, जिससे सभी उसे मेरा छोटा भाई व पत्रकार समझने लगे। बड़े-बड़े अफसरों से मेरी निकटता थी तथा एकदूसरे के यहां आनाजाना रहता था। इससे उसका भी अफसरों से परिचय होने लगा। उसने मेरा इतना विश्वास अर्जित कर लिया कि उसे तमाम भुगतानों तथा कागज आदि की खरीदारी के लिए मैं बड़ी-बड़ी रकमें उसे सौंपने लगा। उसकी चित्रकला की अभिरुचि को मैंने प्रोत्साहित किया और वह बड़ी अच्छी चित्रकारी करने लगा। उसके सारे खर्च मैंने वहन किए।

वह मेरा स्कूटर लेकर अपने घर जाता था तथा उसके मुहल्ले में पत्रकार के रूप में उसका बड़ा रोबदाब हो गया। जिस पिता के कारण वह आत्महत्या करने जा रहा था, उन्होंने जब उसका यह रुतबा देखा तो उनका उसके प्रति प्रेम उमड़ पड़ा और दोनों के सम्बन्ध अच्छे हो गए। इसके बावजूद वह लड़का रहता मेरे यहां ही था और उसके सारे खर्च मेरे जिम्मे थे।

मैं अनेक वर्षो से प्रतिवर्ष गरमी में दो महीने नैनीताल रहता था तथा वहां राजकीय अतिथिगृह नैनीताल क्लब में रुकता था। वहां के प्रेक्षागृह में ‘रंगभारती’ का ‘पोंगा सम्मेलन’ शीर्षक अखिल भारतीय हास्य कविसम्मेलन, ‘रंगभारती’ के ‘सप्तरंग आॅरकेस्ट्रा’ का ‘एक शाम किशोर कुमार के नाम’ कार्यक्रम तथा गायन, नृत्य, हास्य आदि की प्रतियोगिताएं आयोजित करता था। एक बार जब मैं नैनीताल में था तो उस लड़के को मैंने वहां बुलाया तथा नैनीताल घुमाने के बाद उसे मैंने आठ हजार रुपए देकर इलाहाबाद भेजा, ताकि वह वहां बिजली, टेलीफोन आदि विभिन्न बिलों के पैसे जमा कर दे तथा अन्य कतिपय भुगतान भी कर दे।

दो महीने की अवधि के बाद जब मैं इलाहाबाद लौटा तो मेरे पैरोंतले जमीन खिसक गई। पता लगा कि वह लड़का मेरे दिए हुए सारे रुपए एवं अन्य कई चीजें लेकर मुम्बई भाग गया है। वह मुझे बिलकुल कंगाल कर गया था। धीरे-धीरे लोगों से उसकी विभिन्न करतूतें पता लगीं। पता लगा कि मेरी अनुपस्थिति में वह घर में पीछे के दरवाजे से लड़कियां लाता था तथा मेरे घर में पेशा कराकर कमाई करता था। यह भी पता लगा कि उससे मैं बाजार से जो भी चीजें मंगाता था, उनका अधिक मूल्य बताकर रकम चुरा लेता था।

उस घटना से मुझे इतना गहरा आघात लगा कि मैं बिलकुल विक्षिप्त हो गया। मेरी नींद गायब हो गई और रात-रात भर जागता रह जाता था। मैं दिनभर घर में दौड़ता रहता था कि थक जाऊं तो नींद आ जाए। लेकिन नींद गायब हो गई थी। तब मैंने शरीर को थकाने के लिए प्रयाग स्टेशन से कटरा होते हुए मीलों की दौड़ लगानी शुरू की। इससे नींद आती भी थी तो रात में चौंककर उठ जाता था। कमरे के भीतर चिल्लाकर रोता था। उसी दौरान मेरी पत्नी लता लखनऊ से आईं। मैंने अपनी हालत छिपाने की कोशिश की, किन्तु वह कुछ-कुछ भांप गईं और मुझे संभालने का प्रयास किया। उन्हें यह भी आभास हो गया कि मैं बिलकुल कंगाली की स्थिति में हो गया हूं। मेरी मां अस्वस्थ थीं, इसलिए लता को लखनऊ लौटना पड़ा। जब वह चली गईं तो मैंने देखा कि वह मेरे कमरे में चुपके से दो सौ रुपये छोड़ गई थीं। मैं भावविह्वल हो गया। मेरी पत्नी लता बिलकुल देवी का स्वरूप थीं तथा हमारे परिवार का प्राण-तत्व थीं।

एक स्वामी जी से मेरा परिचय था, जो आयुर्वेदाचार्य भी थे। जैसे ईश्वर की प्रेरणा हुई और मैं स्वामीजी के पास कई दिन गया। वह मुझे हमेशा हंसता हुआ देखते थे। मेरी दुर्दशापूर्ण हालत का कारण जब उन्हें पता लगा तो उन्होंने वास्तव में मेरी प्राणरक्षा की। उन्होंने गीता का कर्मयोग समझाते हुए मुझे संभाला और फिर से नया जीवन शुरू करने का निर्देश दिया। उनसे प्रेरणा पाकर मैंने उधार रुपये लेकर वाराणसी में प्रेक्षागृह का भाड़ा जमा किया एवं कूपन छपाए। उन कूपनों को बेचने के लिए मैंने पागलों की तरह जीतोड़ परिश्रम किया। उस अतिकठोर परिश्रम का फल अच्छा मिला और मेरा कार्यक्रम बेहद सफल हुआ तथा उसने धूम मचा दी। आयोजन में आए सभी उच्चाधिकारियों ने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की। मैंने सारे भुगतान चुकाए। बाद में यह राज भी खुला कि मेरी प्रतिष्ठा और साख का फायदा उठाकर वह लड़का कई अफसरों से रुपये मांग ले गया था। अफसर मेरा चरित्र जानते थे, इसलिए सहर्ष उन्होंने रुपये दे दिए। बाद में जब मैं अफसरों को रुपये वापस देने लगा तो वे ले नहीं रहे थे, किन्तु मैंने जिद पकड़कर सारी धनराशि वापस की। इस प्रकार स्वामी जी की प्रेरणा-शक्ति से मुझे नया जीवन प्राप्त हुआ।

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