दलितों के प्रथम मसीहा स्वामी विवेकानंद

303
दलितों के प्रथम मसीहा स्वामी विवेकानंद
दलितों के प्रथम मसीहा स्वामी विवेकानंद

—— संविधान दिवस के उपलक्ष्य में प्रस्तुत है —–

चित्रलेखा वर्मा
चित्रलेखा वर्मा

स्वामी विवेकानंद जाति भेद को तोड़ने और मनुष्य मात्र की समानता का संस्कार लेकर पैदा हुए थे। विवेकानंद दलितों के प्रथम मसीहा थे।आपके गुरु परमहंस जी थे। वे जाति के ब्राह्मण थे । अपने यगोपवीत के अवसर पर गुरु जी ने एक अस्पृश्य परिवार के सदस्य से भिक्षा लिया था। ऐसे ही गुरु के शिष्य स्वामी विवेकानंद जी ने अपने गुरु के जन्म दिवस के मौक़े पर ब्राह्मण शिष्यों को यगोपवीत दिया था । इसका उद्देश्य बहुत दिनों से खोयी हुई हिन्दू जाति को आत्म चेतना देना था। दलितों के प्रथम मसीहा स्वामी विवेकानंद


जिन शूद्र व्यक्तियों ने यगोपवीत ग्रहण किया था उनको समाज में बहुत कष्ट सहने पड़े। पर बैलूर मठ के इस छोटे से कार्यक्रम ने बंगाली समाज पर तअनुकूल प्रभाव डाला।स्वामी जी के जीवन में शुरू से ही अश्पृश्यता के लिए कोई भी जगह नहीं थी ।इसका एक उदाहरण द्रष्टव्य है। उनके पिता बहुत बड़े वकील थे। उनके बहुत से मुवक्किल थे। उनमें से बहुत से मुस्लिम भी थे। हर जाति के लिए अलग-अलग हुक्का टंगा रहता था ।मुस्लिम मुवक्किलों के लिए फरसी भी टंगी रहतीथी। उनको अक्सर खंवीश पीने को दिया जाता था। उसकी सुगन्ध बहुत अजीब होती थी। छह साल के बालक नरेंद्र (विवेकानंदका बचपन का नाम )का बालमन हुक्का पीने को ललचाता था। इसके साथ उन्होंने ने यह भी सुन रखा था कि मुस्लिम लोगों का जूठा नहीं पीना चाहिए और जूठा खाने या पीने से सिर पर आसमान टूट कर गिर पड़ता है। इसी बात की पुष्टि करने के लिए बालक ने मौक़ा पाकर,जब मुस्लिम मुवक्किल चले गए तब नरेंद्र ने अजमाइश कर ही लिया। इसी बीच उनके पिता जी आ गये। वे उदार वादी प्रकृति के थे एवं समझदार थे। उन्होंने बालक पर बेबुनियादी दबाव डालना उचित नहीं समझा।

विवेकानंद जी के जीवन में धर्म और जाति से जुड़ी बहुत सी घटनाएँ हैं।

एक बार आगरा से वृन्दावन जाते समय उन्होंने मेहतर से चिलम लेकर पी थी। राम धारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘जूठीचिलम’ नामक कविता भी की रचना कर डाला था।माउंट आबू में वे एक मुस्लमान की कोठी में ठहरे भी थे।ढाका प्रवास के दौरान उन्होंने सभी जाति के लोगों के हाथों से छुआ और बनाया खाना खाया था। वे संन्याल्यो को वे भोजन कराते और उनके साथ करते भी थे।राजस्थान प्रवास के दौरान तीन दिन भूखे रहने के बाद स्वामी विवेकानंद जी को एक दिन चमार ने ही रोटी पका कर खिलाया था । उस रोटी को खाने के बाद उनको जो तृप्ति मिली थी उसके बारे में स्वामी विवेकानंद जी ने स्वयं ही लिखा है,” उस समय देवराज इंद्र के द्वारा स्वर्ण पात्र में अमृत देने पर भी वह उतना तृप्त दायक होता कि नहींकह नहीं सकता “
स्वामी विवेकानंद जी के बंगला जीवनी में इस बात का पता है कि खांडवा प्रवास के दौरान वे एक मेहतर के घर में ठहरे थे और भोजन भी ग्रहण किया था ।

स्वामी विवेकानंद जी के हिमालय भ्रमण के दौरान एक मुस्लिम सज्जन ने खीरा खिला कर उनकी प्राण रक्षा की थी।आबू में जब वे एक मुस्लिम परिवार के घर ठहरे थे तब खेतणी नरेश के प्राइवेट सेक्रेटरी मुंशी जगमोहन जी के रोकने पर उन्होंने कहा था कि,मैं एक संन्यासी हूँ, इसमें भगवान के प्रसन्नता का मुझे कोई भी भय नहीं है।एक धर्माचार्य के रूप में स्वामी विवेकानंद जी का आवह्नन है कि मत भूलो कि नीच,अज्ञानी, दरिद्र,अनपढ़,चमार,मेहतर सब आप की तरह रक्त, मांस से ही बने हैं।

स्वामी विवेकानंद जी ही एक ऐसे धर्म पुरुष है जो कहते है कि अब तक यह सिखलाया गया है कि मातृ देवो भव, पितृ देवों भव,दरिद्र देवों भव,आचार्य देवोंभव,परन्तु अब मैं कहता हूँ, चांडाल देवोभव,दरिद्र देवों भव,शूद्र देवोभव अर्थात् अभाव में जीवन जी रहे, दरिद्र,शूद्र,चांडाल लोग ईश्वर के समान है।स्वामी विवेकानंद जी का कहते है कि भारत की दीर्घकालीन पराधीनता के कारण नीचीजातियों को बहुत ही उपेक्षा हुई है इस लिए नीचीऔरउपेक्षित,जातियों को ऊपर उठाने की ज़रूरत है।इस तरह छोटी और बड़ी घटनाओं ने उनके मन और विचारों को देश के उपेक्षित,निर्धन,दलित और दरिद्र जातियों का पक्षधर बना दिया।बीसवीं शताब्दी के शुरुआत से ही दलितों के प्रथम मसीहा बन कर खड़े हो जाते है। वे युगों-युगों तक याद किए जायेंगे। दलितों के प्रथम मसीहा स्वामी विवेकानंद