

आज का विद्यालय केवल ज्ञान का मंदिर नहीं रह गया है; उसकी चौखट पर बाजार खड़ा दिखाई देता है—सजधज कर, आकर्षक पैकेजिंग के साथ, और अपने विस्तार की असीम संभावनाओं के साथ। कभी शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, नैतिकता और समाज निर्माण से जुड़ा था, परंतु अब धीरे-धीरे यह एक ‘सेवा’ से ‘उत्पाद’ में बदलती जा रही है। इस परिवर्तन ने शिक्षा के मूल स्वरूप को चुनौती दी है, और यह प्रश्न उठाया है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं, या केवल खरीद रहे हैं?
विद्यालयों के बाहर कोचिंग संस्थानों, गाइड पुस्तकों, डिजिटल ऐप्स और निजी ट्यूशन का जाल फैल चुका है। यह पूरा तंत्र बच्चों और अभिभावकों को यह विश्वास दिलाता है कि बिना इन ‘अतिरिक्त साधनों’ के सफलता संभव नहीं। परिणामस्वरूप, स्कूल में होने वाली पढ़ाई का महत्व घटने लगता है। छात्र कक्षा में उपस्थित तो रहते हैं, पर उनका ध्यान अक्सर उस ‘बाजार’ की ओर होता है जो उन्हें तेज़, आसान और सुनिश्चित सफलता का वादा करता है।
बाजार की यह घुसपैठ केवल शैक्षणिक सामग्री तक सीमित नहीं है। आज स्कूलों में ब्रांडेड यूनिफॉर्म, महंगे बैग, विशेष किताबें, और अनिवार्य गतिविधियों के नाम पर अतिरिक्त शुल्क—ये सब मिलकर शिक्षा को महंगा और असमान बना रहे हैं। शिक्षा का अधिकार तो सबको है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अब धीरे-धीरे केवल उन लोगों तक सीमित होती जा रही है जो इसे ‘अफोर्ड’ कर सकते हैं। इससे समाज में एक नया वर्ग विभाजन उत्पन्न हो रहा है—शिक्षा आधारित असमानता।
डिजिटल क्रांति ने भी इस बाजार को और मजबूत किया है। ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म, एड-टेक कंपनियाँ और वर्चुअल क्लासेस ने शिक्षा को तकनीकी रूप से उन्नत तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही शिक्षा का व्यावसायीकरण भी बढ़ा है। विज्ञापन यह बताते हैं कि ‘स्मार्ट लर्निंग’ ही सफलता की कुंजी है, जबकि वास्तविकता यह है कि तकनीक केवल एक माध्यम है, लक्ष्य नहीं।
इस परिदृश्य में सबसे अधिक प्रभावित होता है—शिक्षक और छात्र का संबंध। शिक्षक, जो कभी मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत हुआ करता था, अब कई बार केवल एक ‘सेवा प्रदाता’ के रूप में देखा जाने लगता है। वहीं छात्र, जो जिज्ञासु और खोजी होना चाहिए, वह अंकों और रैंकिंग के दबाव में अपनी मौलिकता खोने लगता है। शिक्षा का मानवीय पहलू धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।
यह भी सच है कि बाजार पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। उसने शिक्षा में प्रतिस्पर्धा, नवाचार और संसाधनों की उपलब्धता को बढ़ाया है। लेकिन जब बाजार का उद्देश्य केवल लाभ कमाना हो जाए, और शिक्षा का उद्देश्य पीछे छूट जाए, तब समस्या उत्पन्न होती है। संतुलन का अभाव ही सबसे बड़ी चुनौती है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षा को फिर से उसके मूल उद्देश्य से जोड़ें। स्कूलों को केवल परीक्षा परिणामों का केंद्र न बनाकर, उन्हें विचार, संवाद और सृजन का मंच बनाना होगा। सरकार, शिक्षण संस्थानों और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा सुलभ, समावेशी और मूल्य आधारित बनी रहे।
अभिभावकों को भी इस भ्रम से बाहर निकलना होगा कि अधिक खर्च का अर्थ बेहतर शिक्षा है। बच्चों को यह समझाना होगा कि सीखना एक प्रक्रिया है, न कि कोई उत्पाद जिसे खरीदा जा सके। शिक्षकों को भी अपने भूमिका को पुनः परिभाषित करना होगा—वे केवल पाठ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक हैं।
शिक्षा का ‘कमर्शियलाइजेशन’: एक कड़वी सच्चाई आधुनिक स्कूलों में अब केवल पढ़ाई नहीं बिकती, बल्कि सुविधाओं का एक पूरा **’पैकेज’** बिकता है। स्कूल अब एक शैक्षणिक संस्थान कम और एक कॉर्पोरेट ऑफिस ज्यादा नजर आते हैं।
एडमिशन का खेल: भारी-भरकम ‘डोनेशन’ और ‘डेवलपमेंट फीस’ के नाम पर अभिभावकों की जेबों पर डाका डाला जा रहा है।
यूनिफॉर्म और किताबों का एकाधिकार: अधिकांश स्कूलों ने अब अपनी चौखट के भीतर ही दुकानें खोल ली हैं। जूते, मोजे, टाई से लेकर कॉपियों तक, सब कुछ स्कूल द्वारा निर्धारित दुकान से ही लेना अनिवार्य है, जो बाजार भाव से कहीं अधिक महंगी होती हैं।
ईवेंट्स और दिखावा:’एनुअल फंक्शन’ और ‘स्पोर्ट्स डे’ अब प्रतिभा निखारने के बजाय स्कूल की भव्यता दिखाने के विज्ञापन बन गए हैं।
भीतर सिमटती शिक्षा जैसे-जैसे बाजार का प्रभाव बढ़ा है, शिक्षा का मूल स्वरूप संकुचित होता गया है।
1.ज्ञान बनाम ग्रेड्स: आज की शिक्षा का पैमाना ‘बच्चे ने क्या सीखा’ से बदलकर ‘बच्चे ने कितने प्रतिशत अंक पाए’ पर टिक गया है। शिक्षा अब चहुंमुखी विकास के बजाय एक **रैंक-बनाने वाली मशीन** बनकर रह गई है।
2. शिक्षकों की स्थिति: एक शिक्षक, जिसका कार्य अध्यापन था, अब वह मार्केटिंग, डेटा एंट्री और फीस कलेक्शन जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझा दिया गया है। जब शिक्षक ही बोझ तले दबा होगा, तो शिक्षा की गुणवत्ता का गिरना स्वाभाविक है।
3. कोचिंग कल्चर का उदय: विडंबना देखिए कि स्कूल की भारी फीस भरने के बाद भी बच्चा ‘कोचिंग’ जाने को मजबूर है। यह इस बात का प्रमाण है कि स्कूल के भीतर की शिक्षा छात्र की जरूरतों को पूरा करने में अक्षम साबित हो रही है।
इसका समाज पर प्रभाव यह ‘बाजारीकरण’ समाज में एक गहरी खाई पैदा कर रहा है। शिक्षा अब अधिकार नहीं, बल्कि एक विलासिता बनती जा रही है। जब शिक्षा एक उत्पाद बन जाती है, तो छात्र एक ग्राहक बन जाता है। और ग्राहक को संतुष्ट करना तो आसान है, लेकिन एक नागरिक को शिक्षित करना कठिन।
पैसे के दम पर खरीदी गई डिग्रियां डिब्बों में बंद कागज के टुकड़ों जैसी हैं। इनसे कौशल और नैतिकता गायब हैं। यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल पैसा कमाना रह गया, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो आर्थिक रूप से समृद्ध तो हो सकती है, लेकिन मानसिक और चारित्रिक रूप से दरिद्र होगी।
अंततः समय आ गया है कि हम रुककर सोचें। क्या हम अपने बच्चों को केवल एक ‘उपभोक्ता’ बनाना चाहते हैं या एक सजग इंसान? सरकार, समाज और अभिभावकों को मिलकर इस बाजारीकरण के खिलाफ आवाज उठानी होगी। स्कूल की चौखट से बाजार को बाहर धकेलना जरूरी है ताकि भीतर की शिक्षा को फिर से फैलने और पनपने का अवसर मिल सके। शिक्षा का उद्देश्य ‘करियर’ बनाना जरूर हो, लेकिन इसका आधार ‘चरित्र’ होना चाहिए।
यह निर्णय हमें लेना है कि हम अपने स्कूलों को बाजार का विस्तार बनने देंगे या ज्ञान का केंद्र बनाए रखेंगे। यदि शिक्षा भीतर से सिमटती रही और बाजार बाहर से बढ़ता गया, तो हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ेंगे जहाँ डिग्रियाँ तो होंगी, पर ज्ञान का अभाव होगा। समय की मांग है कि हम इस प्रवृत्ति को पहचानें और शिक्षा को उसके असली स्वरूप—मानव विकास और सामाजिक उत्थान—की ओर वापस ले जाएँ।
























