Wednesday, May 6, 2026
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‘बड़ा मंगल’ के भंडारों की गैस किल्लत ने फीकी की रौनक

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‘बड़ा मंगल’ के भंडारों की गैस किल्लत ने फीकी की रौनक
‘बड़ा मंगल’ के भंडारों की गैस किल्लत ने फीकी की रौनक
अजय कुमार
अजय कुमार

लखनऊ में आस्था और सेवा का प्रतीक ‘बड़ा मंगल’ इस बार गैस की किल्लत के चलते कुछ फीका नजर आ रहा है। बड़ा मंगल के अवसर पर हर साल लगने वाले भंडारों में इस बार रौनक तो है, लेकिन रसोई की रफ्तार धीमी पड़ गई है। एलपीजी सिलेंडरों की कमी के कारण कई स्थानों पर प्रसाद और भोजन बनाने में दिक्कतें सामने आ रही हैं, जिससे श्रद्धालुओं की सेवा व्यवस्था प्रभावित हो रही है। बावजूद इसके, आस्था का जोश बरकरार है, और लोग हर संभव प्रयास कर इस महापर्व की परंपरा को निभाने में जुटे हैं।

लखनऊ एक ऐसा शहर है जो अपनी तहजीब, नवाबी विरासत और धार्मिक सौहार्द के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहाँ की गंगा-जमुनी तहजीब में जहाँ ईद की सेवइयाँ गली-मोहल्लों में बँटती हैं, वहीं जेठ के महीने में बड़े मंगल का उत्सव पूरे शहर को एक अलग ही रंग में रंग देता है। जेठ माह के पहले मंगल पर आज भंडारों का नजारा काफी बदला-बदला नजर आया।लखनऊ में बड़ा मंगल केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, यह लखनऊ की सामूहिक आत्मा का उत्सव है, जिसमें जाति, धर्म और वर्ग का कोई भेद नहीं रहता। हर गली, हर चैराहे पर भंडारे लगते हैं और हर आने-जाने वाले को प्रसाद मिलता है। जेठ माह के प्रत्येक मंगलवार को बड़ा मंगल कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार जेठ का महीना भगवान हनुमान को विशेष रूप से प्रिय माना गया है और मंगलवार का दिन तो वैसे भी बजरंगबली का दिन होता है। इसलिए जेठ के मंगलवार को हनुमान जी की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन हनुमान जी की आराधना करने से मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं और भक्तों के संकट दूर होते हैं।

बड़े मंगल की परंपरा की शुरुआत के बारे में लखनऊ में एक बड़ी रोचक ऐतिहासिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि यह परंपरा नवाबी काल में शुरू हुई। अवध के नवाब नासिर-उद-दीन हैदर के शासनकाल में एक बार लखनऊ में भीषण गर्मी और अकाल जैसे हालात पैदा हो गए थे। उस समय अलीगंज स्थित हनुमान मंदिर के महंत ने भगवान हनुमान से प्रार्थना की और जेठ के मंगलवारों को विशेष भंडारे आयोजित करने का संकल्प लिया। कहते हैं कि नवाब स्वयं इस आयोजन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने न केवल इसमें सहयोग दिया बल्कि इसे प्रोत्साहित भी किया। तभी से अलीगंज का पुराना हनुमान मंदिर बड़े मंगल का केंद्र बन गया और धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे लखनऊ में फैल गई। आज भी अलीगंज मंदिर में बड़े मंगल पर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और वहाँ का भंडारा सबसे भव्य माना जाता है। बड़े मंगल की खासियत यह है कि यह केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहता। पूरा शहर इसमें शामिल हो जाता है। व्यापारी, उद्योगपति, राजनेता, समाजसेवी संस्थाएँ और आम नागरिक कृ सभी अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार भंडारे लगाते हैं। गली-गली में पंडाल सजते हैं, भजन-कीर्तन की धुनें वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं और पूड़ी-सब्जी, कढ़ी, छोले-चावल, लस्सी, आइसक्रीम जैसे पकवानों की सुगंध हर तरफ फैली रहती है। प्रसाद पाने के लिए किसी की जाति नहीं पूछी जाती, किसी का धर्म नहीं देखा जाता। यह सामूहिकता और समभाव ही बड़े मंगल को लखनऊ का सबसे लोकप्रिय लोकपर्व बनाती है।

लेकिन इस बार जेठ के पहले बड़े मंगल पर वह चिर-परिचित रौनक कुछ फीकी नजर आई। इसकी एक बड़ी वजह है रसोई गैस की किल्लत और बढ़ती कीमतें। भंडारे लगाने वाले आयोजकों का कहना है कि पूड़ी-सब्जी बनाने में गैस की खपत सबसे अधिक होती है। कड़ाही में लगातार तेल गर्म करके पूड़ियाँ तलना और सब्जी पकाना एक लंबी और गैस-गहन प्रक्रिया है। इस बार गैस सिलेंडर की कीमतें और उपलब्धता दोनों ने आयोजकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नतीजा यह हुआ कि जो भंडारे लगे, उनमें से अधिकतर में पूड़ी-सब्जी की जगह कढ़ी-चावल और छोले-चावल ने ले ली। ये व्यंजन एक बार बनने के बाद गर्म रखने में कम ऊर्जा लगती है और स्वाद में भी श्रद्धालुओं को संतुष्ट करते हैं, लेकिन बड़े मंगल की पारंपरिक थाली जिसमें गरमागरम पूड़ी और आलू की सब्जी का जो आनंद था, वह इस बार कम दिखा। भंडारों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी देखी गई। जो मोहल्ले हर साल दर्जनों भंडारे लगाने के लिए जाने जाते थे, वहाँ इस बार दो-चार ही आयोजन हो पाए। कुछ आयोजकों ने बताया कि गैस की व्यवस्था न होने पर वे लकड़ी या कोयले का उपयोग करने में असमर्थ थे क्योंकि शहरी इलाकों में यह व्यावहारिक नहीं है।

इस बार एक और कारण भी है जिसने पहले बड़े मंगल की भव्यता को कुछ विभाजित किया। इस वर्ष जेठ माह के साथ-साथ अधिकमास यानी लौंज का महीना भी पड़ रहा है। इस कारण इस बार जेठ में चार की बजाय आठ बड़े मंगल पड़ेंगे। श्रद्धालुओं और आयोजकों का उत्साह आठ मंगलों में बँट गया है। पहले जब चार ही मंगल होते थे तो हर एक पर पूरी ताकत और उत्साह लगाया जाता था, अब आठ मंगलों की श्रृंखला को देखते हुए लोगों ने शायद बाद के मंगलों के लिए अपनी तैयारी सुरक्षित रखी है। हालाँकि उत्सव का भाव पूरी तरह मंद नहीं पड़ा। शहर में जगह-जगह हनुमान जी के जयकारे गूँजते रहे और भक्तों की आस्था में कोई कमी नहीं दिखी। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय के बाहर पश्चिम बंगाल में पार्टी की जीत के जश्न के रूप में एक भव्य भंडारा आयोजित किया गया जो शहर में चर्चा का विषय रहा। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बड़े मंगल का भंडारा अब केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक उपलब्धियों के उत्सव का माध्यम भी बन गया है। बड़ा मंगल लखनऊ की उस विशिष्ट पहचान का हिस्सा है जो इसे देश के अन्य शहरों से अलग करती है। गैस की किल्लत और बदलती परिस्थितियाँ भले ही इस बार कुछ रुकावट बनी हों, लेकिन जिस शहर की आत्मा में यह पर्व सदियों से बसा हो, वहाँ आस्था की लौ बुझने वाली नहीं है। आने वाले मंगलों पर लखनऊवासी फिर उसी जोश और उल्लास के साथ बजरंगबली के जयकारे लगाएँगे और भंडारों की रौनक शहर की फिजाँ में घुल जाएगी।