Thursday, May 28, 2026
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दो कौड़ी के लोग…

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दो कौड़ी के लोग...
दो कौड़ी के लोग...

रील-शोहरत का लगा, अब तो ऐसा रोग।

लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

लाइक-शेयर की भूख में, बेच रहे संस्कार, 

प्रसिद्धि की चाह ने, तोड़े सब व्यवहार। 

पाने सस्ती तालियाँ, करते गलत प्रयोग— 

लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

ज्ञान नहीं, बस शोर है, दिखता चारों ओर, 

भीतर खालीपन लिए, बाहर मचता शोर। 

सच की कीमत घट गई, झूठ हुआ उद्योग—

 लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

कपड़ों से पहचान का, करने लगे बयान, 

चरित्रों की धूल पर, लिखते झूठा मान। 

नंगेपन तक आ गए, ये कैसा दुर्योग—