
रील-शोहरत का लगा, अब तो ऐसा रोग।
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।
लाइक-शेयर की भूख में, बेच रहे संस्कार,
प्रसिद्धि की चाह ने, तोड़े सब व्यवहार।
पाने सस्ती तालियाँ, करते गलत प्रयोग—
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।
ज्ञान नहीं, बस शोर है, दिखता चारों ओर,
भीतर खालीपन लिए, बाहर मचता शोर।
सच की कीमत घट गई, झूठ हुआ उद्योग—
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।
कपड़ों से पहचान का, करने लगे बयान,
चरित्रों की धूल पर, लिखते झूठा मान।
नंगेपन तक आ गए, ये कैसा दुर्योग—
























