यूपी में संदेह नहीं और उत्तराखंड भी गया हाथ से…!

डॉoअम्बरीष राय

“यूपी में संदेह नहीं और उत्तराखंड भी गया हाथ से” एमपी के भाजपाई चीफ मिनिस्टर शिवराज सिंह चौहान जब चुनावी मौसम में ये कहते दिखते हैं तो समझने के लिए कोई रॉकेट साइंस बचती नहीं है. हिन्दी पट्टी में मजबूत होकर रायसीना हिल्स की ऊंचाइयों पर स्थापित भगवा ब्रिगेड के पैर अब डगमगाने लगे हैं. पांच राज्यों के हो रहे विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश सबसे हॉट स्टेट बना हुआ है.

भगवा ब्रिगेड के मौजूदा राजा नरेंद्र मोदी यहीं से चुनकर आते हैं. भगवा ब्रिगेड की अगली पीढ़ी के नायक महंत योगी आदित्यनाथ भी यहीं से चुनकर आते हैं. लिहाज़ा पीढ़ियों के अंतराल के साथ संघर्ष भी है. और ये संघर्ष पार्टी में भी है और पार्टी के बाहर भी. बहरहाल विषय मोदी योगी के वर्चस्व की लड़ाई का नहीं है. भगवा संघर्ष में अंतिम बाजी किसके हाथ लगी, वो तो इन चुनावों के परिणाम ही तय कर देंगे. और तय होने में महज़ 21 दिनों की दूरी है.

और ये 21 दिन भाजपा के लिए कितने भारी हैं, क्या ही कहें. भगवा कुनबे के कथित चाणक्य और प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह चलते रोड शो को बीच में खत्म करने की बात कहते नज़र आते हैं. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत आईबी की रिपोर्ट्स के हवाले से चिंतित हैं. इन रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यूपी विधानसभा चुनाव के जिन दो चरणों में वोटिंग हुई है, उसमें भाजपा बुरी तरह से पिछड़ गई है. लिहाज़ा उन्होंने स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को अगले चरण में जोर शोर से हिन्दुओं को एकजुट करने और वोट कराने में जुटने को कहा है.

अब मोहन भागवत को आईबी किस प्रोटोकॉल के तहत रिपोर्ट कर रही है, या उनको आईबी की रिपोर्ट कैसे मिली, या ये बात कैसे सार्वजनिक हुई, इसमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. मुझे दिलचस्पी इसमें है कि वोट लेने के लिए लोगों को हिन्दू बनाने और हिन्दू को खतरे में बताने वाली भगवा ब्रिगेड जब सत्ता में आ जाती है तो फिर हिन्दू जातियों में क्यों बांट दिए जाते है. फिर वो गरीब अमीर में क्यों बांट दिए जाते हैं. जाति देखकर योजनाएं क्यों बनती हैं. आय वर्ग देखकर योजना क्यों बनने लगती है. मुझे एक और बात में दिलचस्पी है. ये कौन लोग है जो भाजपा के शीर्ष लोगों के कमज़ोर पलों को मोबाईल के कैमरों में कैद कर ले रहे हैं. और जब इन पलों की रिहाई होती है तो भगवा उम्मीदें घायल होने लगती हैं. बेचारे यत्र तत्र फैले समर्थक झेंप मिटाते रह जाते हैं.

लड़ाई के बीच हारने की ख़बरों का लीक होना या लीक करना भगवा कुनबे के गिरते आत्मविश्वास को दर्शाता है. त्रासद आर्थिक नीतियों के निर्माताओं ने एक बड़ी आबादी के सामने से खुशियों की थाली छीन ली है. एक बड़ी आबादी के सामने से आत्मसम्मान वाली थाली छीन ली है. आंखें फोड़कर ईलाज कराने का पाखंड रचती ताक़तें चुनाव तक राशन बांट रही हैं. नमक बांट रही हैं. पैसे बांट रही हैं. चुनाव आयोग ने पैसे बांटने को अपराध घोषित कर रखा है. लिहाज़ा रिश्वत को सांस्थानिक और संवैधानिक जामा पहना दिया गया है. अब लोगों के अकाउंट में सीधे पैसे डाले जा रहे हैं.

लेकिन ये लोग भूल जा रहे हैं कि आत्मसम्मान की थाली ख़ैरात की थाली पर हमेशा भारी पड़ी है. और ये भारीपन ख़ैरात बांटने वालों पर भारी पड़ता है, भारी पड़ भी रहा है. इटावा से सरिता सिंह भदौरिया भाजपा की विधायक हैं. विधायकी जाने का ख़तरा आफ़त में डाले हुए है. जनता को कोसे जा रही हैं कि राशन लिया, सिलेंडर लिया, पैसा लिया, राशन लिया, आवास लिया और राम राम (नमस्कार) भी नहीं कर रहे. तीसरे चरण में इटावा में भी वोट पड़ने हैं. जाटलैंड की तर्ज़ पर कुछ लोग इसे यादव लैंड भी कहते है. पिछले विधानसभा चुनावों में चाचा भतीजा लड़ रहे थे. घर वाले लड़ रहे थे. यादव आपस में लड़ रहे थे. अबकी ऐसा नहीं है.

लड़ने वाले एक हो गए हैं. और जनता इनके पीछे लामबंद. नतीज़तन सत्ता बौखला उठी है तो चुनाव में जाने वाले घबराए हुए हैं. भदौरिया महज़ एक उदाहरण हैं, जो कलप रही हैं. गंगा में बह रही लाशों के बाद कितने लोग कलपें हैं, इस निज़ाम को एहसास ही नहीं है. रोज़ी रोज़गार खोए लोग अब कितनों को बेरोज़गार करेंगे, लाज़िम है हम देखेंगे.

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