धरती माता सह रही…

धरती माता सह रही, मानव अत्याचार।

पेड़ कटे तो घट रहा, जीवन का आधार।।

बादल गरजे दूर से, बरसे मीठी धार।

सूखी धरती पा गई, फिर से नई बहार।।

हार नहीं स्वीकार हो, कोशिश कर हर बार।

गिरकर ही इंसान चुने, कैसे पाना पार।।

कदम कदम ही आज का, बनता कल का राज।

धीरे-धीरे ही मिले, ऊँचाई का ताज।।

भाई-भाई दूर हों, बढ़ता जब अभिमान।

टूटे रिश्ते जोड़ दे, प्रेम और सम्मान।।

धन से बड़ा धर्म है, सेवा और व्यवहार।

जिस घर में ये बस गया, वही सुखी संसार।।

सच की राह कठिन सही, पर देती है मान।

झूठे पथ पर चलन से, खो जाता सम्मान।।

मन निर्मल हो जिस घड़ी, मिटे सभी विकार।

भीतर जब उजियारा हो, चमके ये संसार।।

—–डॉ.सत्यवान सौरभ

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