सहयोगी दलों से बढ़ता संकट

उत्तर प्रदेश में अब सहयोगी दलों में अब ‘भरोसे’ का संकट गहराता जा रहा है। सपा प्रमुख को जब यह बात समझ आई तो वे सहयोगी दलों से अपना कोटा कम करने की बात कहने लगे। दूसरी तरफ, भाजपा के सहयोगी ‘अपना दल’ की अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के संजय निषाद भी अपने कोटे की सीटों को बढ़वाने के लिए दिल्ली पहुंच गए। यहां पर भाजपा, इन दोनों दलों से अपना कोटा घटाने की बात कह रही है। भाजपा और सपा, आज इन दोनों दलों की हालत यह है कि वे बग़ावत को रोकने के लिए अपने सहयोगियों के कोटे वाली सीट पर खुद का प्रत्याशी उतारने का प्रयास कर रहे हैं।अखिलेश यादव, पूरी तरह से भाजपा की रणनीति को नहीं समझ पाए। उन्होंने योगी के खिलाफ कई मुद्दों को लेकर प्रदेश में बना माहौल तो कैश कर लिया, मगर असल खेल से वे चूक गए। यूं कह सकते हैं कि वे भाजपा के जाल में फंस गए हैं। वह जाल,जो योगी ने नहीं बुना है, बल्कि उसे खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तैयार किया है। भले ही शाह, पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी को वैसी सफलता नहीं दिला पाए, जैसा सोचा गया था। उन्होंने वहां का एक मंत्र उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस्तेमाल कर दिया। उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार एवं प्रसिद्ध चिंतक और लेखक डॉ. राघव शरण शर्मा ने बताया, पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा ने टीएमसी नेताओं में जबरदस्त सेंध लगाई थी। उस वक्त लग रहा था कि जैसे भाजपा ही खेल की मुख्य सूत्रधार है। बाद में जब वही नेता दोबारा से टीएमसी में जाने लगे तो भाजपा को ‘भरोसे’ की थ्योरी समझ आई। अब भाजपा ने वही थ्योरी अखिलेश पर इस्तेमाल की है। जो नेता आज भाजपा छोड़ रहे हैं, उनका क्या भरोसा कि वे चुनाव के बाद दोबारा से पाला बदल लें। हो सकता है कि ये अदला-बदली, भाजपा द्वारा तैयार की गई एक रणनीति का हिस्सा हो।


उत्तर प्रदेश चुनाव में राजनीतिक पार्टियां रोजाना नए दांव चल रही हैं। जब से टिकट वितरण शुरू हुआ है, सभी दलों में भगदड़ मची है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा प्रमुख अखिलेश यादव, सबसे ज्यादा खुश नजर आ रहे थे। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले दिनों जब भाजपा के मंत्रियों और विधायकों की टोली सपा में आई, तो अखिलेश यादव का उत्साह देखने लायक था। भाजपा से आए नेताओं और खुद के सहयोगी दलों के भरोसे को लेकर एकाएक अखिलेश यादव आशंकित हो उठे हैं। कहीं वे भाजपा के ‘ममता बनर्जी कार्ड’ में तो नहीं फंस गए हैं।सपा के सहयोगी एवं रालोद प्रमुख जयंत चौधरी से कहा गया है कि वे अपने कोटे की सीटों पर सपा उम्मीदवार को चुनाव लड़ने दें। इस नफे नुकसान को चुनाव बाद पूरा कर दिया जाएगा। सपा एवं दूसरे क्षेत्रीय दलों को यह डर सताने लगा है कि भाजपा से जो नेता अब उनकी पार्टी में आए हैं, वे चुनाव के बाद वापस भी जा सकते हैं। इससे सपा को दोहरा नुकसान होगा। एक तो उनके अपने कैडर नेता नाराज हो रहे हैं और दूसरा चुनाव के नतीजे अगर बराबर आते हैं तो उस स्थिति में दूसरी पार्टियों के नेता, जिन्होंने सपा टिकट पर चुनाव जीता है, वे वापस जाने में देर नहीं लगाएंगे। अखिलेश को शहरी क्षेत्रों की करीब सौ सीटों पर ऐसी ही परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सपा के सहयोगी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और रालोद के जयंत चौधरी की रणनीति को समझना सपा प्रमुख के लिए आसान नहीं है।

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह से टीएमसी नेताओं की टोली भाजपा में आई थी और बनर्जी की भारी जीत के बाद उसी टोली के नेता बारी-बारी से वापस टीएमसी में लौटने लगे थे। क्या वही कार्ड अब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में तो नहीं खेला है, सपा नेता अब इसी उधेड़बुन में लगे हैं। सपा खेमे में ऐसी चर्चा हो रही है कि जिसमें सहयोगी दलों से कहा जा रहा है कि वे अपने कोटे की कुछ सीटों पर सपा के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने दें। सहयोगी दलों का कोटा घटाने के लिए मंथन हो रहा है।पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह से टीएमसी नेताओं की टोली भाजपा में आई थी और बनर्जी की भारी जीत के बाद उसी टोली के नेता बारी-बारी से वापस टीएमसी में लौटने लगे थे। क्या वही कार्ड अब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में तो नहीं खेला है, सपा नेता अब इसी उधेड़बुन में लगे हैं।भाजपा ने अपने नेताओँ के जानें की भर पायी नेता जी बहू अपर्णा के आने पूरी कर ली है वहीं नेता जी का साढ़ू व अपर्णा के मौसा भी भाजपा में शामिल हो गये उन्हें भाजपा ने टिकट भी दे दिया है

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