राजनीति से जाति जाती नहीं…!

सदियों से राजनीति में जाति का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है।भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो राजनीतिक पार्टियों ने जाति को एक मुद्दा बनाकर अपने-अपने हित साधे हैं। देश में 1931 जनगणना से सम्बन्धित अँग्रेज कमिश्नर मिस्टर हट्ट्न ने लिखा है, सही –सही जाति आधारित जनगणना असम्भव है। हमारे विशाल देश मे लगभग छ हजार जातियां होगीं उनकी भी उप जातियां होगीं जिनकी संख्या हजारों में होगी। अत; उनकी वैज्ञानिक जन गणना सम्भव नही है।वर्तमान चुनाव 2012 में भी जाति एक अहम मुद्दा बनकर उभरा है, जिसे सभी राजनैतिक पार्टियों ने अपने दलों में टिकट बाँटते समय प्रत्याशी तय करने में ध्यान रक्खा है। क्षेत्रवाद ने जातिवाद को बढाने में अहम भूमिका निभाई , जिसके आधार पर विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों का प्रादुर्भाव हुआ और विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों ने जातीय समीकरण के आधार पर जाति विशेष की हितैषी बनकर भारतीय राजनीति मे अपनी पहचान बनाने मे न केवल कामयाब हुई वरन सत्ता भी प्राप्त करके राष्ट्रीय पार्टियों को भी जाति वाद के फार्मूले पर राजनीति करने के लिये आकर्षित किया। राजनीति के तहत देश में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के कद्दावर नेता तक देश मे जातीय जनगणना को अपना समर्थन दे रहे थे। शायद उन्हे पता नही है कि ऐसा कर वह देश में जातिवाद की अमरबेल बना देना चाहते हैं ।

देश के 58% से अधिक OBC समाज के लोग….!

बजरंग दल में,विश्व हिंदू परिषद में,शिव सेना में,गौरक्षा दल में,RSS में ;हिन्दू युवा वाहिनी में,श्री राम सेना में,गायत्री परिवार में,आर्य समाज में,स्वाध्याय परिवार में;करणी सेना में है और जितने भी देश मे धार्मिक संगठन है सभी में है।

सिर्फ यहाँ नहीं है ओबीसी के लोग

न्यायालयों में जज नहीं है,सरकारी वकील नहीं है,यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर लेक्चरर नहीं है।शासन में सचिव नहीं है,आईएएस आईपीएस ऑफिसर नहीं है।डिप्टी कलेक्टर डीएसपी नहीं है।बड़ी बड़ी कंपनियों में CMD डायरेक्टर नहीं है।जनसंख्या के अनुपात में मंत्री, विधायक ,सांसद नहीं है।मीडिया में मालिक, संपादक, ब्यूरोचीफ नहीं है।भारत मे एक भी बड़ा बिजनेस मैन ओबीसी का नहीं है।फिर भी ओबीसी समाज की आंखें नहीं खुल रही है । जज कॉलेजियम से बनेंगे।आईएएस लेट्रल एंट्री से बनेंगे।बाकी नौकरियां ठेके या संविदा पर होंगी।बेहतर शिक्षा इतनी महंगी कि कोई ईमानदार व्यक्ति वहां अपने बच्चे नहीं पढ़ा पायेगा और सरकारी शिक्षा को साजिश के तहत बर्बाद किया जा रहा है।सरकारी क्षेत्र को धीरे धीरे खत्म किया जा रहा है, जहाँ आरक्षण का लाभ मिलता है, आरक्षण तो रहेगा पर सरकारी क्षेत्र ही नहीं रहेगा तो आरक्षण अपने आप ही ख़त्म हो जायेगा और उसे ख़त्म करने का दोषी भी कोई नही होगा।SC, ST, OBC को प्रतिनिधित्वविहीन किया जाएगा और उन्हें जातिगत पेशों में लौटने के लिए मज़बूर किया जाएगा। और यह नौबत इसलिए आई क्योंकि SC ST OBC ने महज़ पेट भरने के लिए नौकरियां की। अब भी अंतिम अवसर है कि इन सबकी ज़िम्मेदार रही मनुवादियों की पार्टियों को सबक सिखाने के लिए एकजुट होकर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक क्रांति के लिए कमर कस लो और आंदोलन का रास्ता अपनाओ….. तभी सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था से निजात मिलेगी।

देश की राष्ट्रीय एकता को खन्डित करने के लिए अंग्रेजों ने 1871 में जो जातीय जनगणना का विष रूपी अंकुर हमारी राजनैतिक धरा पर बोया था । उसे हमारी राजनैतिक पार्टियां अपने वोट बैंक के लिये राजनैतिक तुष्टीकरण के खाद पानी से सिंचित करती आ रही है। यही कारण है जब एक आम मतदाता चुनाव मे मत डालने निकलता है तो उसके मन मस्तिष्क पर उस प्रत्याशी की छवि और चरित्र से ज्यादा उसकी जाति भारी पड़ जाती है। हमारे संविधान निर्माताओं ने एक विशाल संविधान की रचना की है, जिसमें अनुच्छेद 16 (4) में पिछड़ें ‘वर्गों’ के ‘नागरिकों’ को विशेष सुविधा देने की बात कही है । न कि जाति के आधार पर संविधान भी मजहबी आधार पर आरक्षण की मनाही करता है । इसका मतलब यह है हमारे संविधान के रचनाकारों की भी ऐसी कोई मंशा नही थी। बाबा साहिब भीमराव अम्बेडकर जी ने ‘जाति का समूल नाश’ नामक पुस्तक लिखकर जातिवाद पर अपने विचारधारा को प्रस्तुत किया। समाजवाद के जनक ‘लोहिया’ जी ने भी ‘जाति तोड़ो’ का नारा दिया ।

भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण और निर्णायक तत्व रही है और आज भी है। आज़ादी से पहले भी जाति ने राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता के बाद से, जाति का प्रभाव कम होने के बजाय बढ़ा है, जो राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है।सांप्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग को स्वीकार कर ब्रिटिश शासन में नस्लवाद और सांप्रदायिकता के बीज बोए गए थे। 1909 के अधिनियम ने ब्रिटिश सरकार को मुसलमानों से अलग अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने का अधिकार दिया और फिर भारत में कई जातियों ने इसी तरह अलग प्रतिनिधित्व की मांग की।जब महात्मा गांधी द्वितीय गोलमेज़ सम्मेलन में भाग ले रहे थे, तो उन्होंने देखा कि भारत के विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि अपनी जातियों के लिए सुविधाएँ माँग रहे थे और कोई भी राष्ट्रहित में नहीं बोल रहा था।इस निराशा में वे वापस लौट आए। अंग्रेजों ने खुले तौर पर नस्लवाद को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, कांग्रेस सरकार ने ब्रिटिश नीति का पालन किया और जातिवाद की भावना को बढ़ावा दिया।पिछड़े वर्गों को विशेष सुविधाएँ देकर कांग्रेस सरकार ने उन्हें एक अलग वर्ग बना दिया है। न केवल राजनीति में बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और अन्य क्षेत्रों में भी नस्लवाद का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

इन महापुरुषों के आदर्शों के सहारे राजनीति चमकाने वाले हमारे नेता जातिवाद की राजनीति करके जहाँ एक ओर भारत मे अनेकता में एकता की अन्तर्राष्ट्रीय पहचान को क्षति पहुँचा रहे हैं वहीँ दूसरी ओर इन महान विचारकों के महान आर्दशों का भी माखौल उड़ा रहे हैं। हम इक्कीसवीं सदी के भारत में रह रहे है। पहले की तुलना मे समाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो जाति का महत्व थोड़ा कम अवश्य हुआ है। परन्तु राजनीति के धरातल में इसकी सत्यता आंकी जाय तो यह देश का हर नागरिक स्वीकार करेगा, कि जातिवाद का मुद्दा सभी राजनैतिक पार्टियां सुलगाये रखना चाहती हैं क्यों कि इसे समय –समय पर थोड़ी सी राजनैतिक हवा देकर आग लगायी जा सकती है और अपना राज नैतिक उल्लू साधा जा सकता है। आज हमारा भारत विकासशील देशों मे सर्वोच्चता के स्थान पर पहुंच कर विकसित राष्ट्र बनने की देहलीज पर खड़ा है। ऐसे में भारतीय राजिनीति में इस प्रकार जातिवाद की जो अवधारणा अपनी जड़ें जमा रही है उसके दूरगामी परिणाम स्वरूप कहीं ऐसा न हो, कि भारतीय समाज जातीय संघर्ष में जूझने लगे और भारत की एकता व अखन्डता के समक्ष सकंट उत्पन्न हो जाय्।

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