खुदगर्जी थोड़ा हुआ,मचने लगा बवाल

जब तक था रस बाँटता, होते रहे निहाल,

खुदगर्जी थोड़ा हुआ, मचने लगा बवाल।।

जब तक थाली भर मिली, करते रहे सलाम,

ना कहने की देर थी, बदल गए सब नाम।

रिश्तों की इस भीड़ में, स्वार्थ बड़ा विकराल—

जब तक था रस बाँटता, होते रहे निहाल।।

सुख में सबके होंठ पर, रहते मीठे बोल,

धूप चढ़ी ज्यों दुख भरी, खुलने लगती पोल।

अपनों की पहचान का, यही कठिन सवाल—

खुदगर्जी थोड़ा हुआ, मचने लगा बवाल।।

जिनको सिर पर दे बिठा, दिया खूब सम्मान,

वही काटने लग गए, आज मेरी जुबान।

मतलब की दुनिया हुई, भावों का अकाल—

जब तक था रस बाँटता, होते रहे निहाल।।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

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