पिछड़ों के लिए घनी छांव लेकर आया मंडल कमीशन का छाता….!

चौ.लौटनराम निषाद

मानता केवल समान लोगों के बीच होती है।असमान को समान के बराबर रखना असमानता को मजबूती प्रदान करना है। 1990 में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने की घटना ने आजादी के बाद की राजनीति को दो हिस्सों में बांट दिया। एक मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने से पहले की राजनीति और दूसरी उसके बाद की। इसे भारतीय सामाजिक इतिहास में ‘वाटरशेड मोमेंट’ भी कह सकते हैं।अंग्रेज़ी के इस मुहावरे का मतलब है- वह क्षण जहां से कोई बड़ा परिवर्तन शुरू होता है। 1989 के आम चुनावों के परिणामों के बाद जनता दल के गठबंधन की सरकार के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जी बने।यह दूसरा मौका था जब भारत में ग़ैर कांग्रेसी दल या गठबंधन सत्ता के केंद्र में आया था। वीपी सिंह ने सबको चौंकाते हुए सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) को 27 फीसदी आरक्षण की मंडल आयोग की सिफ़ारिश को 7 अगस्त,1990 को लागू कर दिए।। यह बोतल से एक जिन्न के बाहर आने के जैसा था। आखिर ऐसा क्या था मंडल कमीशन में जिसे बनने के बरसों बाद तक लागू न किया जा सका और लागू होने के बाद ऐसा भूचाल आया जिसके झटके अब तक महसूस हो रहे हैं।जनता दल ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में सरकार बनने पर मण्डल कमीशन की सिफारिश को लागू करने का वादा किया। दिसम्बर,1989 में वाममोर्चा व भाजपा के बाहरी समर्थन से विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन गए।उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 26 जनवरी,1990 को साफतौर पर अपने सम्बोधन में कहा कि-हमारी सरकार मण्डल कमीशन की सिफारिश को लागू कर अन्य पिछड़ावर्ग को नौकरियों में आरक्षण देगी।वीपी सिंह इब्सा को आरक्षण देने के लिए संकल्पित थे,जबकि इन्ही के दल के चंद्रशेखर इसके कट्टर विरोधी थे।चंद्रशेखर को धुर समाजवादी कहा जाता है,पर यह बिल्कुल उलट है।चंद्रशेखर समाजवाद की आड़ में बहुत बड़े जातिवादी व सामंतवादी भावना के थे।वीपी सिंह की एक आदत थी कि वे जो कह दिए,उस पर अडिग रहते थे। उन्होंने तमाम विरोधों को झेलते हुए भी सरकार रहेगी कि चली जायेगी,13 अगस्त,1990 को मण्डल कमीशन की सिफारिश सम्बंधित अधिसूचना जारी करा दिए।

मंडल कमीशन की कहानी

इंदिरा गांधी की लगाई इमरजेंसी के 21 महीने झेलने के बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी के टिकट पर पिछड़े वर्ग के कई नेता चुनाव जीतकर संसद में पहुँचे। गुजराती ब्राह्मण मोरार जी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी।फिर देसाई सरकार ने कांग्रेसी सरकारों को भंग कर विधानसभाओं के चुनाव करवाए।इसमें भी जनता पार्टी जीती।बिहार में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में सरकार बनी और कर्पूरी ने अगले ही बरस बिहार की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 20 फीसदी आरक्षण का कानून बना दिया।इसके बाद केन्द्रीय सेवाओं में भी पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के प्रावधान की मांग उठने लगी।

मोराजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व काल में मंडल कमीशन की रखी गई नींव

पिछड़े वर्ग के आरक्षण का मामला प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय भी आया था।1953 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए काका कालेलकर आयोग बनाया था।लेकिन इसकी सिफारिशें लागू नहीं की गई थीं।कालेलकर आयोग की रिपोर्ट में एक खामी यह थी कि उसमें सिर्फ हिन्दुओं में ही पिछड़ेपन की पहचान की गई थी, बाकी धर्म छूट गए थे।इन्हीं सब परिस्थितियों को देखते हुए 20 दिसंबर 1978 को मोरारजी देसाई की सरकार ने बिहार के मधेपुरा से सांसद बीपी मंडल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की,जिसे इनके नाम के आधार पर मंडल आयोग कहा गया।जनवरी 1979 में मंडल आयोग ने अपना काम शुरू किया।कुछ ही महीनों के बाद जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार गिरा दी गई। इसके बाद जनता पार्टी टूट गई।नई बनी जनता पार्टी (सेक्युलर) ने सत्ता संभाली, पीएम बने चौधरी चरण सिंह।लेकिन कुछ ही महीनों में यह सरकार भी चली गयी। फिर मध्यावधि चुनाव हुए। इस मध्यावधि चुनाव में बीपी मंडल एक बार फिर जनता पार्टी (चरण सिंह-राजनारायण गुट वाली नहीं बल्कि चंद्रशेखर और जगजीवन राम वाली) के उम्मीदवार बने। लेकिन इस बार वे तीसरे स्थान पर खिसक गए। उन्हें हराया कांग्रेस (उर्स) के राजेन्द्र प्रसाद यादव ने।वही राजेन्द्र प्रसाद यादव जिन्होंने उन्हें 1971 में भी हराया था।


वीपी सिंह और ‘सामाजिक न्याय’ की रपट

साल 1980 के चुनाव में इन्दिरा गांधी की सत्ता में वापसी हो गई थी।दिसंबर 1980 में मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को सौंपी। इस रिपोर्ट में सभी धर्मों के पिछड़े वर्ग की साढ़े तीन हजार से भी ज्यादा जातियों की पहचान की गई।कमीशन ने 52 फीसदी ओबीसी को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की।मंडल की रिपोर्ट इंदिरा और राजीव गांधी के राज में धूल फांकती रही। 2 दिसंबर 1989 को वीपी सिंह का राज शुरू हुआ। 1990 में वीपी सिंह ने मंडल आयोग की फाइल की धूल झाड़ कर उसे निकाला। अब वक्त आ गया था भारत की राजनीति में एक नए सामाजिक न्याय के मसीहा के उदय का। 7 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा के साथ ही पूरे देश में आरक्षण के विरोध की आग भड़क उठी।विश्वनाथ प्रताप सिंह वह प्रधानमंत्री थे जिन्होंने सन 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किया।

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